वैश्विक व्यापार और भारत: टैरिफ की नई चुनौतियां
ताजा टैरिफ प्रकरण में ये जानना जरूरी है कि भारत जहां अमेरिकी वस्तुओं पर 9.5 प्रतिशत टैरिफ लगाता है, वहीं भारतीय आयात पर अमेरिकी शुल्क केवल 3 प्रतिशत ही है। ट्रम्प रैसिप्रोकल नीति (जैसे को तैसा) के...

अपना घाटा पाटने की जुगत में अमेरिका
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विशाल उपभोक्ता बाजार और मध्यमवर्गीय जनता की ब्रांडेड उत्पादों की बढ़ती मांग भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बना रही है। अमेरिका और चीन जैसे प्रमुख विकसित देश भारतीय बाजार पर अपनी पकड़ मजबूत बनाना चाहते हैं। भारत भी औद्योगिक विकास की राह पर तेजी से बढ़ रहा है, पर विकसित देशों की श्रेणी में शामिल होने में अभी समय लगेगा। हाल ही में ट्रम्प प्रशासन की टैरिफ नीतियों के चलते भारत वैश्विक व्यापारिक चर्चाओं के केंद्र में है। वहीं मोदी प्रशासन की प्रतिक्रिया पर दुनिया की नज़रें टिकी हुई हैं। अब तक तो भारत ने लचीला रुख अपनाया है, लेकिन यदि उसे अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित रखते हुए स्वदेशी उत्पादों के महत्व को बनाए रखना है तो कुछ सख्त कदम उठाने होंगे। वर्तमान परिदृश्य में अमेरिका व चीन चाहते हैं कि भारत उनके साथ खड़ा रहे। ऐसे में यदि भारत अपनी निर्माण क्षमता में गुणात्मक सुधार व आपूर्ति शृंखला को मजबूत करता है तो ये देश के लिए फायदेमंद साबित होगा। ताजा टैरिफ प्रकरण में ये जानना जरूरी है कि भारत जहां अमेरिकी वस्तुओं पर 9.5 प्रतिशत टैरिफ लगाता है, वहीं भारतीय आयात पर अमेरिकी शुल्क केवल 3 प्रतिशत ही है। ट्रम्प रैसिप्रोकल नीति (जैसे को तैसा) के जरिए सभी देशों से इसी असंतुलन को खत्म करना चाहते हैं।
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विकसित देशों की भारत में रुचि
भारत की बड़ी आबादी, बढ़ती क्रय शक्ति और उपभोक्ता बाजार के चलते अमेरिका और चीन की बड़ी कंपनियां यहां निवेश बढ़ा रही हैं। टेस्ला, एप्पल, विमानन कंपनी बोइंग, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, फेसबुक, अमेज़न, नेटफ्लिक्स जैसी कंपनियां भारतीय बाजार को नहीं खोना चाहतीं। ये कंपनियां भारत में निर्माण हब बनाने की जुगत में हैं। चीन की शाओमी, विवो, ओप्पो जैसी कंपनियों ने भी यहां मजबूत उपस्थिति बनाई है। साथ ही, भारत आईटी सेवाओं, बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग और फार्मा सेक्टर में एक प्रमुख केंद्र बन चुका है। सस्ती भारतीय दवाओं व वैक्सिन के लिए अमेरिका की भारत पर काफी निर्भरता है। चीन की भी दवाओं के कच्चे माल (एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंडीग्रेण्ट्स), कपास, लोहा, स्टील, टैक्सटाइल्स, आटोमोबाइल्स व कैमिकल्स आदि के लिए भारत पर निर्भरता बढ़ती जा रही है।
अमेरिका ने टैरिफ वार क्यों छेड़ा?
अमेरिका चीन, यूरोप और अन्य देशों के साथ अपने व्यापार घाटे को कम करना चाहता है। ट्रम्प अपने पहले कार्यकाल में इस समस्या को पहचान चुके थे। ये ही कारण रहा कि दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही उन्होंने इस असंतुलन को ठीक करने के लिए टैरिफ शुल्क बढ़ाए। अमेरिका की बेहतरी के लिए ट्रम्प वहां की घरेलू औद्योगिक इकाइयों को नुकसान से उबारने व उन्हें सुरक्षा देने के लिहाज से भी सक्रिय हैं। ट्रम्प ने जैसे ही टैरिफ बढ़ाए, चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी टैरिफ लगा दिए। ट्रम्प प्रशासन ने इसे ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत प्रचारित किया। ये अलग बात है कि अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस की निदेशक तुलसी गबार्ड ने गत माह भारत दौरे के दौरान कहा कि ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘इंडिया फर्स्ट’ प्रतिबद्धता के समान है।
भारत को क्या लाभ?
अमेरिका की टैरिफ नीति मुख्य रूप से चीन को लक्षित कर रही है, लेकिन इसका फायदा भारत को भी हो सकता है। अमेरिका ने चीन से आयात घटाकर भारत से स्टील, फार्मा, टेक्सटाइल, आईटी उत्पाद और ऑटोमोबाइल पार्ट्स जैसी वस्तुओं का आयात बढ़ा दिया है। इसके अलावा, कृषि उत्पादों के मामले में भी भारत को नए अवसर मिल रहे हैं। अमेरिका- चीन के व्यापारिक तनाव के बीच कई कंपनियां चीन छोड़कर भारत में निर्माण केंद्र स्थापित कर रही हैं। इस तनाव का फायदा उठाते हुए भारत ने भी दुनिया के समक्ष देश को वैकल्पिक निर्माण हब के तौर पर प्रस्तुत किया है, जिस पर एप्पल, सेमसंग जैसी कम्पनियों ने भारत में अपना निवेश भी बढ़ाया है।
संभावित नुकसान
हालांकि यह बदलाव भारत के लिए फायदेमंद है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। वैश्विक व्यापार अस्थिरता के कारण भारतीय निर्यातकों की चिंताएं बढ़ी हैं। चीन, अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए भारत में सस्ते उत्पादों की बाढ़ ला सकता है, जिससे घरेलू उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा।
भारत को क्या करना चाहिए?
भारत को अपनी निर्माण क्षमता में गुणवत्ता पूर्ण और आपूर्ति शृंखला को मजबूत करना होगा। साथ ही सेमीकंडक्टर्स, रक्षा उपकरण, पेट्रोलियम उत्पाद, डिजिटल डेटा स्टोरेज जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी। यूरोप, जापान और रूस के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाना भी एक रणनीतिक कदम होगा। गूगल, फेसबुक और अमेज़न जैसी कंपनियों पर नियंत्रण बढ़ाने से भी भारत को दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है। वैसे व्यापार में संतुलन के लिए रैसिप्रोकल नीति मायने रखती है, लेकिन जब देश की आर्थिक मजबूती की बात होती है तो सभी देशों के नायकों को ट्रम्प की तरह सोचना ही होता है। भारतीय शासकों को भी स्मार्ट रणनीति पर काम करना चाहिए और मौके का फायदा उठाकर स्वदेशी उत्पादों को महत्व बढ़ाना चाहिए।
देशवासियों की भूमिका
भारतीय उपभोक्ताओं को स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देनी होगी। यदि मध्यम वर्ग भारतीय ब्रांड्स को अपनाए, तो स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। टाटा, महिंद्रा, बजाज, डाबर, पतंजलि, एचसीएल, रिलायंस, इंफोसिस, विप्रो जैसी कंपनियों की वृद्धि से देश का व्यापार घाटा कम होगा और डॉलर पर निर्भरता घटेगी। आज भारत चिकित्सा, तकनीक, ऑटोमोबाइल, रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ-साथ सेमीकंडक्टर, माइक्रोचिप, सोलर पैनल और बैटरी टेक्नोलॉजी में भी मजबूत स्थिति में आ रहा है। यदि भारत अपनी रणनीति को स्मार्ट तरीके से लागू करे, तो यह वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।
वर्ष 2030 तक 500 अरब डॉलर का व्यापार लक्ष्य
भारत ने 2023-24 में अमेरिका को 77.51 अरब डॉलर का निर्यात किया, जो वर्ष 2022-23 के 78.40 अरब डॉलर की तुलना में थोड़ा कम रहा। हालांकि, इस वर्ष अकेले जनवरी में निर्यात 39% बढ़कर 8.44 अरब डॉलर तक पहुंच गया। मजबूत संबंधों की बदौलत भारत व अमेरिका ने 2030 तक 500 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य तय किया है।
नीतियां व प्रतिबंध रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा
‘टैरिफ, एक्सपोर्ट कंट्रोल को चाहे हम इसे पसंद करें या नहीं, ये एक सच्चाई हैं। देश इनका इस्तेमाल करते हैं। अगर हम पिछले दस सालों को देखें तो पाएंगे कि देशों ने अपनी आर्थिक ताकत का इस्तेमाल हथियार की तरह किया है। इसमें आर्थिक गतिविधियां, वित्तीय लेन-देन, ऊर्जा सप्लाई या टेक्नोलॉजी सब शामिल हैं। यही आज की दुनिया की सच्चाई है। दुनिया एक नए आर्थिक समीकरण की ओर बढ़ रही है, जहां नीतियां और प्रतिबंध एक नए दौर की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन गए हैं।’
– एस. जयशंकर, विदेश मंत्री
भारत पर असर न के बराबर
अमेरिका के रेसिप्रोकल टैरिफ का भारत पर असर न के बराबर होगा। इसका कारण है कि भारत निर्यात में विविधताएं ला रहा है, साथ ही वैल्यू एडिशन (मूल्य संवर्धन) पर भी जोर दे रहा है। निर्यात के लिए वैकल्पिक रास्तों की तलाश के साथ ही यूरोप से मध्य पूर्व के माध्यम से अमेरिका तक नए रास्ते पर भी काम कर रहा है। नए सप्लाई चेन एल्गोरिदम को भी नए सिरे से तैयार कर रहा है। ऐसे में टैरिफ को लेकर अमेरिका के फैसले का भारत पर असर पड़ने की आशंका न के बराबर है। हालांकि भारत के निर्यात में 3 से 3.5 प्रतिशत तक की गिरावट की भी आशंका जताई गई है। ऐसे में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों ही स्तरों पर सुधार जरूरी है।
– एसबीआई रिसर्च की रिपोर्ट






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