इटली का बेटा, राजस्थान की माटी का अपना – लुइजि पिओ तैस्सितोरी
वर्ष 1914 में, तैस्सितोरी बीकानेर पहुंचे। एक विदेशी, जो उस भाषा के प्रेम में खिंचा आया था, जिसे तब भारत में भी उचित मान्यता नहीं मिली थी। बीकानेर की हवाओं में जैसे कोई पुरानी पहचान थी, यहां की धूल...

दूर इटली की किसी बर्फीली सुबह में जन्मा एक बालक, जिसे तब शायद यह भी नहीं पता था कि उसकी आत्मा किसी रेगिस्तानी धरा में बसने वाली है। 13 दिसंबर 1887 को इटली के उडीन में जन्मे लुइजि पिओ तैस्सितोरी भाषाओं के दीवाने थे। संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश के अध्ययन में रमते-रमते जब उन्होंने राजस्थानी भाषा और उसके अनमोल साहित्य को जाना, तो मानो उनकी आत्मा इस भाषा में बस गई। वे इसे केवल पढ़ना नहीं चाहते थे, वे इसे जीना चाहते थे।
Table Of Content
राजस्थान की ओर खिंचाव: आत्मा का पुनर्जन्म
वर्ष 1914 में, तैस्सितोरी बीकानेर पहुंचे। एक विदेशी, जो उस भाषा के प्रेम में खिंचा आया था, जिसे तब भारत में भी उचित मान्यता नहीं मिली थी। बीकानेर की हवाओं में जैसे कोई पुरानी पहचान थी, यहां की धूल में शायद कोई पुराना रिश्ता। उन्होंने अपनी पूरी साधना इसी भूमि के लिए समर्पित कर दी। वे पुस्तकालयों में दिन-रात पांडुलिपियां टटोलते, डिंगल के कठिन छंदों को समझने की कोशिश करते। चारण कवियों की वीरगाथाएं, भक्ति काव्य, और लोकगीत— सबकुछ जैसे उनकी आत्मा का हिस्सा बन गए। वे आम लोगों के बीच घुल-मिल गए। राजस्थान की बोली और संस्कारों को आत्मसात कर लिया।
https://rajasthantoday.online/april-2025
तैस्सितोरी के अमर शोध और उनकी अनमोल कृतियां
तैस्सितोरी ने राजस्थानी भाषा, साहित्य और इतिहास पर कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे, जो आज भी शोधकर्ताओं के लिए अनमोल धरोहर हैं। उनकी प्रमुख कृतियां हैं:
1. “Notes on the Prakrit of the Jain Texts” – जैन ग्रंथों में प्रयुक्त प्राकृत भाषा पर गहन अध्ययन।
2. “Rajasthani Phonetic and Grammatical Sketch” – राजस्थानी भाषा की ध्वनि और व्याकरणिक संरचना पर विस्तृत शोध।
3. “Bikaner Inscriptions” – बीकानेर के अभिलेखों का विश्लेषण, जिससे राजस्थान के प्राचीन इतिहास की कई नई परतें खुलीं।
4. “Medieval Jainism with Special Reference to Rajasthan” – मध्यकालीन जैन धर्म पर विस्तृत अध्ययन, जिसमें राजस्थान के जैन ग्रंथों की महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाया गया।
तैस्सितोरी ने बीकानेर और मारवाड़ क्षेत्र के शिलालेखों और सिक्कों का गहन अध्ययन किया, जिससे राजस्थान के इतिहास की कई नई परतें खुलीं।
भारत सरकार के लिए भी अनमोल योगदान
वर्ष 1916 में, उन्हें भारत सरकार द्वारा “आरियंटल लिस्ट” की सहायता के लिए नियुक्त किया गया। वे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से भी जुड़े और बीकानेर में कई प्राचीन अभिलेखों, सिक्कों और शिलालेखों का गहन अध्ययन किया। उनकी खोजों ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की सभ्यता की पूर्व धारणाओं को बदलने में अहम भूमिका निभाई।
33 की उम्र और राजस्थान की माटी में विलीन हो गया यह बेटा
नियति को कुछ और ही मंजूर था। 22 नवंबर 1919 को मात्र 33 वर्ष की आयु में, बीकानेर की इसी भूमि पर उन्होंने अंतिम सांस ली। एक ऐसा इंसान, जिसने राजस्थानी भाषा और संस्कृति के लिए अपना सर्वस्व दे दिया, राजस्थान की इसी रेत में हमेशा के लिए समा गया। उनका अंतिम संस्कार यहीं किया गया। इटली के इस ऊर्जावान युवा की राख, राजस्थान की रेत में मिल गई। शायद कोई चारण कवि उनकी आत्मा को पढ़ रहा हो, कोई पुरानी हवेली में उनकी खोजी गई पांडुलिपियां सांस ले रही हों, कोई लोकगीत आज भी उनकी याद में गाया जाता हो।
बीकानेर में स्मारक, लेकिन राजस्थान उन्हें भूलता जा रहा है
उनके सम्मान में बीकानेर में एक स्मारक स्थापित किया गया, जो आज भी इस महान आत्मा की गवाही देता है। पर कितने लोग वहां जाते हैं? कितने लोगों को पता है कि यह राजस्थान का अपना एक बेटा था, जिसने उसकी भाषा को दुनियाभर में सम्मान दिलाने के लिए जीवन समर्पित कर दिया?
राजस्थान का अनजाना नायक
राजस्थानी भाषा, जिसके लिए तैस्सितोरी ने खुद को झोंक दिया, उसे आज भी आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है। राजस्थानी को उसकी पहचान दिलाने वाला व्यक्ति खुद राजस्थान की स्मृतियों से धुंधला होता जा रहा है। अगर तैस्सितोरी को कुछ चाहिए था, तो बस इतना कि उनकी प्रिय भाषा जिंदा रहे, उसका सम्मान हो। पर शायद, हम उन्हें भी भूल चुके हैं और उनकी उस भाषा को भी, जिसे उन्होंने अपना हृदय दे दिया था।
बीकानेर की हवाएं जब थार के रेत पर बहती हैं, तो शायद एक आवाज़ कानों में पड़ती है—
“राजस्थान! क्या तुम मुझे अब भी याद करते हो?”
फोटो साभार- अजीज भुट्टा






No Comment! Be the first one.