किंकर्तव्यविमूढ़ कांग्रेस
कांग्रेस के लिए मुफीद रहे राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी उसके हाथ से निकल गए और हार का असर यह हुआ कि इन प्रदेशों में भी कांग्रेस अब तक 'कोमा' से निकल नहीं पा...

देश में मोदी राज के उदय के बाद से कांग्रेस की हालत पतली होती जा रही है। कभी पूरे देश में राज करने वाली कांग्रेस आज दक्षिण भारत तक सिमट पर रह गई है। उत्तर, पश्चिम व पूर्वोत्तर राज्यों में एक- एक कर कांग्रेस के किले ऐसे ढहे कि आज खण्डहर के रूप में भी पहचानने में नहीं आ रहे। कांग्रेस के लिए मुफीद रहे राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी उसके हाथ से निकल गए और हार का असर यह हुआ कि इन प्रदेशों में भी कांग्रेस अब तक ‘कोमा’ से निकल नहीं पा रही।
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जिस तरह के चुनावी नतीजे आ रहे हैं, इन्हें देखकर कांग्रेस फिलहाल तो अपने पैरों पर दुबारा खड़े होने की स्थिति में नजर नहीं आ रही। उसे अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए भी खुद उससे टूटकर अलग हुए दलों और क्षेत्रीय पार्टियों की बैसाखी की जरूरत पड़ रही है और मौका मिलने पर ये क्षेत्रीय पार्टियां भी कांग्रेस को आंख दिखाने में शर्म नहीं कर रही। ऐसे में सवाल खड़ा हो रहा है कि क्या कांग्रेस मुक्त भारत का भाजपा का सपना कांग्रेस खुद ही पूरा कर लेगी, या उसे नई दिशा देने के लिए कोई चमत्कारिक नेतृत्व सामने आएगा।
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ग्रांड ओल्ड पार्टी पशोपेश में
अपना खोया अस्तित्व हासिल करने के लिए देश की ‘ग्रांड ओल्ड पार्टी’ कांग्रेस खुद पशोपेश में है। वह भाजपा को हराने के लिए क्षेत्रीय या कभी सहयोगी रही पार्टियों से किनारा करने का आत्मघाती कदम उठाती है तो कभी क्षेत्रीय दलों को नागवार फैसले कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेती है। रही सही कसर पार्टी के नेताओं के बयान पूरी कर देते हैं। हालांकि पिछले साल हुए आम चुनाव में कांग्रेस ने इंडिया गठबंधन के सहारे कुछ मजबूती का अहसास करवाया। लोकसभा में 2009 के बाद पहली बार 99 के आंकड़े तक पहुंचने के बाद लगा कि कांग्रेस के ‘अच्छे दिन’ आने वाले हैं, लेकिन थोड़े अरसे बाद ही कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फिरता नजर आया। हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस और उसके समर्थकों को ऐसा झकझोरा कि अब तक न नेता और न ही पार्टी संगठन इस झटके से उबर पाया है। इधर, लोकसभा चुनाव के बाद समर्थकों की नजर में हीरो बनकर उभरे राहुल गांधी की छवि फिर कमजोर हुई और एक बार फिर उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं।
दरअसल, लोकसभा के बाद राज्यों में मिली हार का कारण भी कांग्रेस का नीति बदलना रहा है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में वह खुद को कमजोर मानकर एनसीपी-शिवसेना (उद्धव) नीत महाअघाड़ी गठबंधन पर निर्भर हो गई। इसके पीछे उसका एक मात्र लक्ष्य भाजपा को हराना था। ऐसे में क्षेत्रीय दलों को भाजपा के मुकाबले खड़ा होने का मौका मिल गया और इनकी आमने- सामने की लड़ाई में भाजपा बाजी मार ले गई। इस कारण बंगाल, दिल्ली, यूपी, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में पार्टी के कार्यकर्ता और वोटर कांग्रेस से छिटकते गए।
अपनी गलतियों से झेला नुकसान
हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे राज्यों के नतीजे तो यही बताते हैं कि खुद अपनी गलतियों की वजह से ‘एंटी इनकमबेंसी’ के बावजूद फायदा नहीं उठा पाई और हरियाणा जैसे राज्य में भाजपा को सीधा फायदा मिल गया। उदाहरण के तौर पर कांग्रेस हरियाणा में आम आदमी पार्टी (आप) को नहीं साध सकी और दोनों पार्टियों के वोट बंटने के कारण भाजपा सत्ता बरकरार रखने में कामयाब हो गई। फिर दिल्ली में कांग्रेस ने आप से दूरी बनाई और भाजपा का 27 साल पुराना सत्ता का वनवास खत्म हो गया, जबकि आप इंडिया गठबंधन का हिस्सा रही है। इससे पहले पश्चिम बंगाल में भी तृणमूल कांग्रेस के सामने वामदलों से समझौता करने से कांग्रेस जीरो में सिमट गई और भाजपा का वोट शेयर अचानक बढ़ने से उसे कभी घोर दक्षिणपंथ विरोधी राज्य रहे बंगाल में अब तक की सबसे ज्यादा 70 सीटें मिल गई और 2021 के विधानसभा चुनाव में वामदलों के साथ चुनाव लड़ी कांग्रेस को तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी की सीधी लड़ाई में शून्य पर सिमटना पड़ा। वोट शेयर भी 12.2 फीसदी घटकर 2.93 फीसदी हो गया, जबकि 2016 के चुनाव में उसे 44 सीटें मिली थी। इस हार का असर लोकसभा चुनाव पर भी पड़ा और कांग्रेस सिर्फ एक सीट ही हासिल कर सकी। ऐसी ही स्थिति और समीकरणों के कारण यूपी, बिहार, दिल्ली और झारखंड जैसे राज्यों में भी कांग्रेस का जनाधार खिसकता जा रहा है।
ऐसे में कांग्रेस को अपने संगठनात्मक ढांचे और कार्यशैली पर नए सिरे से सोचना पड़ रहा है, मगर वह तय नहीं कर पा रही कि उसे किस रास्ते पर जाना है। कांग्रेस को यह पता है कि साल 2029 में होने वाले आम चुनाव से पहले वह राज्यों में मजबूत नहीं हुई तो उसे फिर केंद्र की सत्ता से दूर रहना पड़ सकता है, ऐसे में वह अभी से राज्यों में जनाधार बढ़ाने के लिए हाथ पैर मार रही है।
नजर राज्यों में मजबूती पर
आने वाले दिनों में पहले बिहार और फिर असम और गुजरात में चुनाव होने हैं। इसके बाद उत्तरप्रदेश में चुनाव होंगे। वैसे तो कांग्रेस ने अभी से इसके लिए तैयारी शुरू कर दी है। बिहार में प्रदेश प्रभारी के बाद प्रदेश अध्यक्ष भी बदल दिया गया है, लेकिन इस फैसले के बाद भी साफ नहीं है कि कांग्रेस अपने बूते पर खड़ा होने की कोशिश करेगी या फिर गठबंधन के चलते फिर कोई सियासी समझौता करना पड़ता है। फैसलों से तो कांग्रेस आक्रामक होने के संकेत दे रही है, लेकिन राज्यों में ग्राउंड लेवल पर इसके दूरगामी परिणाम पार्टी के पक्ष में आने पर फिलहाल तो संदेह ही किया जा सकता है। बिहार का उदाहरण लें तो अल्लावरू कृष्णा को नया प्रभारी बना दिया, जबकि बिहार में गठबंधन की धुरी माने जाने वाले लालूप्रसाद यादव के नजदीकी माने जाने वाले प्रदेशाध्यक्ष अखिलेश सिंह इसके पक्ष में नहीं थे। इसके बाद अल्लावरू ने राहुल के इशारे पर फायर ब्रांड छात्र नेता रहे कन्हैया कुमार को आगे बढ़ा दिया और उनकी ‘पलायन रोको, रोजगार दो’ यात्रा को हरी झंडी दे दी। इसके लिए बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस से दूर रहकर अखिलेश ने अपनी नाराजगी जाहिर कर दी। इतना ही नहीं, नाराजगी के बीच ही राहुल के कहने पर कांग्रेस ने अखिलेश को बदलकर उनकी जगह दलित चेहरे के रूप में विधायक व पूर्व मंत्री राजेश कुमार को कमान सौंप दी गई। सियासी पंडित हालांकि इसे कांग्रेस की बिहार में ‘बैक-टू द रूट्स’ के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि दलित चेहरा ऐसे वक्त में सामने लाया गया है जब भाजपा, जदयू और राजद जैसे बड़े दलों ने भी प्रदेश पार्टी की कमान दलित को सौंपने से परहेज कर रखा है।
जनाधार वापस हासिल करने की कोशिश
वरिष्ठ पत्रकार मनोज कुमार सिंह की राय में कांग्रेस का यह फैसला सतही तौर पर तो अच्छा लगता है, क्योंकि इसके जरिए वह एक बार फिर अपना जनाधार वापस हासिल करने की कोशिश करती हुई नजर आ रही है, लेकिन परिणाम नए प्रदेशाध्यक्ष की न सिर्फ कांग्रेस संगठन, बल्कि अन्य सहयोगी दलों में स्वीकार्यता पर निर्भर करेंगे। वे बताते हैं कि साल 1990 तक बिहार में सवर्ण, दलित और मुस्लिम मतों की बदौलत एक छत्र राज किया, लेकिन धीरे- धीरे ये वोट बैंक कांग्रेस के हाथ से खिसकता गया। यूं देखा जाए तो कांग्रेस आज बिहार में लालू यादव की पार्टी राजद की मेहरबानी पर चुनावी राजनीति में खड़ी नजर आती है। अब कांग्रेस को फैसला करना है कि वह अकेले खुद का खोया वजूद हासिल करेगी या लालू और गठबंधन के हाथों में खेलेगी। कारण मौजूदा दौर में कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं है।
जानकारों का कहना है कि अभी बिहार में चुनाव छह-सात माह बाद होंगे और इस दौरान परिस्थितियां कितनी बदलेगी, सबकुछ उसी पर निर्भर करेगा। फिलहाल कांग्रेस अपने पत्ते खोलने से बच रही है, लेकिन लालू ने पहले ही सीएम फेस सामने कर दिया है। कांग्रेस ने पिछली बार 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन केवल 19 सीटें ही जीत पाई थी। कहा जा रहा है कि इस बार लालू यादव कांग्रेस को इतनी सीटें देने के लिए भी तैयार नहीं हैं, इसलिए कांग्रेस को अपनी जमीन तैयार करनी होगी और लोगों तक पहुंचना होगा। प्रदेशाध्यक्ष की कमान दलित को सौंपने के पीछे यही बड़ा राज है। पार्टी का मानना है कि वह राजेश कुमार के जरिए जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के कब्जे वाले दलित वोट बैंक में सेंध लगा सकती है। बिहार में लगभग बीस प्रतिशत दलित हैं, जो परम्परागत रूप से सत्ता के साथ ही रहना पसंद करते हैं। भाजपा और जदयू के पास भी कोई बड़ा दलित चेहरा नहीं है। ऐसे में शायद यह बदलाव बदलाव कुछ काम कर जाए।
दिल्ली नहीं, जिलों से चले कांग्रेस
खोई हुई जमीन हासिल करने के लिए कांग्रेस ब्लॉक से जिला संगठनों को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है। दिल्ली में बुलाई गई 700 जिलाध्यक्षों की बैठक इसी का संकेत है। पार्टी के एक नेता ने कहा कि इसके पीछे पार्टी की सोच है कि कांग्रेस दिल्ली से नहीं, जिलों से चले। यानी पार्टी जिला कांग्रेस कमेटियों को केंद्रीय भूमिका देने का इरादा रखती है। नीति यह है कि पार्टी में जिला कांग्रेस कमेटियों का महत्व बढ़ेगा और वे उम्मीदवार चुनने और जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने में मदद करेंगे।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश के अनुसार बेलगावी के ‘नव सत्याग्रह बैठक’ में एक प्रस्ताव पारित कर साल 2025 संगठन का वर्ष घोषित कर ‘संगठन सृजन कार्यक्रम’ की घोषणा की गई थी। उसी संदर्भ में जिला कांग्रेस अध्यक्षों की बैठक बुलाई गई है। इस योजना के लिए गुजरात और मध्यप्रदेश को मॉडल स्टेट के रूप में चुना गया है। इसका क्रियान्वयन दो साल बाद चुनाव में जाने वाले गुजरात से शुरू होगा। दोनों राज्यों में संगठनात्मक सुधार के लिए एक खाका तैयार किया जा रहा है, जिसे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के 8 और 9 अप्रैल को अहमदाबाद में होने वाले अधिवेशन में पेश किया जा सकता है। इसके अनुरूप विधानसभावार पर्यवेक्षक तैनात होंगे, जो ब्लॉक और पंचायत स्तर के प्रमुखों के नाम बताएंगे। साथ ही पार्टी में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने की रणनीति भी बनाई जाएगी। इसी आधार पर पार्टी विधानसभा चुनावों की तैयारी भी शुरू कर देगी।
मध्यप्रदेश व गुजरात में खराब प्रदर्शन
जानकारों के अनुसार मध्यप्रदेश और गुजरात में कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा है। कांग्रेस गुजरात में 2022 के विधानसभा चुनाव में 182 सीटों में से केवल 17 और साल 2024 के लोकसभा चुनाव में 26 में से केवल एक सीट जीत सकी है। मध्यप्रदेश में 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 230 में से 66 सीटें मिली थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे 29 में से सिर्फ एक सीट मिल सकी। दोनों नतीजों के लिए कमजोर संगठन को बड़ी वजह माना गया। इसी वजह से इन दोनों राज्यों को मॉडल स्टेट मानकर काम शुरू किया जा रहा है। वैसे औपचारिक तौर पर कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश व छत्तीसगढ़ में भी संगठन को तरजीह देने के कदम उठाए हैं। मिशन-2027 की तैयारी को ध्यान में रखते हुए यूपी में बनाए गए 75 नए जिलाध्यक्षों में 64 फीसदी हिस्सा अनुसूचित जाति-जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं को देकर इन वर्गों में वापस पैठ जमाने का संकेत दिया गया है। छत्तीसगढ़ में भी नए बनाए गए जिलाध्यक्षों में इन वर्गों की पूरी भागीदारी है।
गुटबाजी का कोई पार नहीं
कांग्रेस की लगातार चुनावी पराजयों के पीछे नेताओं की आपसी गुटबाजी और खींचतान को भी अहम कारण माना जाता है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव इसके बड़े उदाहरण के रूप में आज भी इसकी गवाही दे रहे हैं। और तो और, चुनावों में हार के बाद कांग्रेस ने न तो उबरने की नए सिरे से कोई कोशिश की और न ही गुटबाजी व आपसी खींचतान को खत्म करने के ठोस प्रयास सामने आए।
सियासी पंडितों का कहना है कि राजस्थान में जब से कांग्रेस की सरकार गई, आम कार्यकर्त्ता बाहर ही नहीं निकल रहा। न ही संगठन स्तर पर कोई प्रभावी गतिविधि नजर आती है। हालांकि लोकसभा चुनाव के नतीजों से कुछ हलचल जरूर मची थी, लेकिन विधानसभा उप चुनाव के नतीजों के बाद तो बड़े से बड़े नेता बंगलों में कैद होकर रह गए हैं। राज्य में बहुमत के बूते भाजपा का राज जरूर है, लेकिन सदन के अंदर और बाहर उसे विरोध भी झेलना पड़ रहा है। खुद भाजपा के कई नेता, सरकार के कई मंत्री और विधायक भी सरकार से खफा हैं। ऐसे में कांग्रेस के पास विपक्ष की भूमिका में जान डालने का मौका है, लेकिन वह तो खुद अपने ही बोझ तले दबी जा रही है। प्रदेश की कांग्रेसी राजनीति के पावर सेंटर रहे अशोक गहलोत और सचिन पायलट भी सीन से नदारद हैं। प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा जैसे कुछ नेता ताकतवर दिखाई तो देते है, लेकिन पिक्चर अब भी बड़े नामों से ही चल रही है और बड़े नाम भी अपने तरीके से कार्यकर्ताओं को हांकते हैं, जिसमें पार्टी कम और व्यक्ति ज्यादा मजबूत होता है। इस पर केंद्रीय नेतृत्व भी आंखें मूंदकर ही बैठा है, शायद उसे भी 2028 के विधानसभा चुनावों का इन्तजार हो। यही हाल छत्तीसगढ़ का भी है, जहां सत्ता जाने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ईडी-सीबीआई के जाल से ही बाहर नहीं आ पा रहे और उनके प्रतिद्वन्द्वी टीएस सिंह देव फ्रेम से ही बाहर है।
नब्ज और नेतृत्व पर भी सवाल
इतिहास बताता है कि नेहरू-गांधी परिवार ही कांग्रेस का एक तरह से पर्याय रहा है। कोई भी नेता इस परिवार को चुनौती नहीं दे पाया। ये चीज आज के दौर में भी दोहराई जा रही है। कहने को तो कांग्रेस के निर्वाचित अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे हैं, लेकिन कांग्रेस के फैसलों पर छाप आज भी सोनिया और राहुल गांधी की ही नजर आती है। अब तीसरा पावर सेंटर प्रियंका गांधी भी है। खड़गे का नम्बर इनके बाद आता है। खरगे कुछ करना चाहे तो भी सहमति इन तीनों की जरूरी है। एआईसीसी के महासचिवों के चयन और काम बांटने से लेकर कांग्रेस की नई आने वाली संगठनात्मक रणनीति में भी यह परिलक्षित हो चुका। ऐसे में आम कार्यकर्ता भी गांधी-नेहरू परिवार को ही कांग्रेस मानने को मजबूर है और जनता के सामने मोदी- शाह की जोड़ी ने इस नरेटिव का इतना मजबूत कर दिया है कि वह भी कांग्रेस की किसी गारंटी पर मुश्किल से भरोसा करती है। कांग्रेस को लम्बे समय से कवर कर रही एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि कांग्रेस को तो राहुल ने हाइजैक कर रखा है। वे कांग्रेस के घोड़े को कभी बारात का तो कभी रेस का घोड़ा बता देते हैं, लेकिन ये नहीं सोचते कि कार्यकर्ता या आम जनता पर इसका क्या इम्पैक्ट पड़ेगा।
गुजरात के पत्रकार आशुतोष कहते हैं कि राहुल की बात सुनने में तो सही लगती है कि कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं को जनता से जुड़ना पड़ेगा, तभी जनता उन पर भरोसा करेगी, लेकिन वे ये भूल जाते हैं कि जनता के कांग्रेस पर भरोसा नहीं करने का एक कारण सत्ता-संगठन में गांधी परिवार की पंसद-नापसंद को मिलने वाली तवज्जो भी है। सही नेताओं को काम नहीं करने देने के कारण ही गुजरात में कांग्रेस तीन दशक से सत्ता में नहीं आ पा रही, बाकी गुजरात के लोग तो अच्छे विकल्प का इंतजार कर रहे हैं। पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिला समर्थन इसका उदाहरण है।
लोगों की नब्ज पकड़ना मुश्किल हुआ
इसके अलावा कांग्रेस चुनाव के दौरान लोगों की नब्ज भी नहीं पकड़ पा रही। आज सोशल मीडिया के दौर में मिनटों में माहौल बनता और बिगड़ता है। बंद कमरे की बातें तक बाहर आ जाती है, लेकिन कांग्रेस नब्ज पकड़ने में हर बार नाकाम हो जाती है। कभी वह अल्पसंख्यक हितैषी बनकर बहुसंख्यक वर्ग का कोपभाजन बन जाती है तो कभी उदार हिन्दुत्व की राह पकड़ कर पारम्परिक वोट बैंक भी गंवा बैठती है। चुनावों के वक्त में कांग्रेस नेताओं के बयान मुंह में आया निवाला छिन जाने का कारण बन जाते हैं। उदाहरण के लिए हाल ही प्रयागराज में सम्पन्न महाकुम्भ के मौके पर ‘गंगा में डुबकी से क्या गरीबी मिट जाएगी’, ‘क्या इससे लोगों का पेट भर जाएगा’, जैसे खरगे के बयान क्या कांग्रेस को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे? राम मंदिर के मौके कांग्रेस का बेरुखी क्या उसे फायदा दे सकती है? वैसे इस तरह के बयानों से कांग्रेस ने भले ही किनारा किया हो, लेकिन इसमें दो राय नहीं कि कांग्रेस की चुनावी पराजयों में ये बयान भी एक फैक्टर तो बनते ही हैं।
तकलीफ सिर में और इलाज पेट का
कांग्रेस का पुनरुत्थान कैसे हो, इस सवाल पर राजनीतिक विश्लेषक व लेखक सुरेंद्र किशोर कहते हैं कि कांग्रेस स्वयं में सुधार की क्षमता पूरी तरह खो चुकी है। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि तकलीफ सिर में है और इलाज पेट का किया जा रहा है। इतिहास गवाह है कि जीत का श्रेय गांधी परिवार को और हार का ठीकरा किसी और पर फोड़ने की कांग्रेस की आदत रही है। उसे खुद अपने बारे में आत्मावलोकन करना पड़ेगा, बाकी संगठन और कार्यकर्ताओं को सम्मान की बातें कागजों में ही अच्छी लगती है।






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