स्मार्टफोन की कैद में बचपन: एक विचारणीय सवाल
यह अभियान माता-पिता को प्रेरित कर रहा है कि वे अपने बच्चों को कम से कम 14 वर्ष की उम्र तक स्मार्टफोन से और 16 वर्ष तक सोशल मीडिया से दूर...

– राकेश गांधी –
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आज के दौर में स्मार्टफोन बच्चों की दुनिया का अहम हिस्सा बन गया है। न केवल पढ़ाई, वरन हर चीज़ में स्मार्टफोन का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। अब सवाल ये है कि क्या यह तकनीक वाकई बच्चों के लिए वरदान है या अभिशाप? विकसित देशों में यह चिंता गंभीर रूप ले चुकी है। ब्रिटेन जैसे देशों में बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को सर्वोपरि मानते हुए “स्मार्टफोन-फ्री चाइल्डहुड” जैसी मुहिम ज़ोर पकड़ रही है। यह अभियान माता-पिता को प्रेरित कर रहा है कि वे अपने बच्चों को कम से कम 14 वर्ष की उम्र तक स्मार्टफोन से और 16 वर्ष तक सोशल मीडिया से दूर रखें। तो फिर सवाल उठता है कि अगर दूसरे देश इस दिशा में साहसिक कदम उठा सकते हैं, तो भारत में क्यों नहीं?
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ब्रिटेन की दो सहेलियों डेज़ी ग्रीनवेल और क्लेयर फर्नीहफ ने कुछ समय पहले ही इस मुहिम का आगाज किया था। उन्होंने अभिभावकों को जोड़ने के लिए एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया। इसका उद्देश्य था, बच्चों को कम से कम 14 वर्ष की उम्र तक स्मार्टफोन से दूर रखना, ताकि उनका मानसिक और शारीरिक विकास बाधित न हो। यह अभियान वहां अब एक राष्ट्रीय आंदोलन बन चुका है और 14,000 से अधिक स्कूलों के 1.25 लाख से भी अधिक अभिभावक यह संकल्प ले चुके हैं कि वे अपने बच्चों को 14 वर्ष की आयु तक स्मार्टफोन नहीं देंगे और 16 वर्ष तक सोशल मीडिया से दूर रखेंगे। इस पहल के तहत महज़ छह माह में एक लाख से अधिक ऑनलाइन हस्ताक्षर युक्त संकल्प पत्र जुटाए जा चुके हैं।
बच्चों के लिए घातक होता जा रहा स्मार्टफोन
ये अभिभावक समझ रहे हैं कि स्मार्टफोन के बढ़ते उपयोग से बच्चों में कई गंभीर समस्याएं सामने आ रही हैं। मानसिक तनाव और अवसाद इनमें सबसे प्रमुख हैं। सोशल मीडिया की लत बच्चों के आत्म-सम्मान को प्रभावित कर रही है और उनमें डिप्रेशन बढ़ रहा है। एक अध्ययन की मानें तो लगभग 70 प्रतिशत अभिभावक ये स्वीकार करते हैं कि सोशल मीडिया बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल रहा है। बच्चों का ध्यान भंग होने से वे पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं, जिससे उनकी एकाग्रता और स्मरण शक्ति प्रभावित हो रही है। अत्यधिक स्क्रीन टाइम से आंखों की समस्या बढ़ रही है, नींद की कमी हो रही है, और बच्चों में मोटापे की समस्या भी बढ़ रही है। ये ही नहीं, सबसे खतरनाक पहलू यह है कि स्मार्टफोन के ज़रिए बच्चे साइबर खतरों का शिकार हो रहे हैं। ऑनलाइन बुलिंग, अनुचित सामग्री और धोखाधड़ी जैसी समस्याएं बच्चों को असुरक्षित बना रही हैं। बच्चे परिवार और दोस्तों से दूर होते जा रहे हैं। वे वास्तविक दुनिया के अनुभवों से कट रहे हैं, जिससे उनका सामाजिक और भावनात्मक विकास प्रभावित हो रहा है।
नियंत्रण से बाहर होता जा रहा स्क्रीन टाइम
भारत जैसे देश की स्थिति और भी जटिल है। यहां अधिकांश अभिभावक यह मानते हैं कि स्मार्टफोन ने बच्चों की दिनचर्या को काफी हद तक बदल दिया है। इसके बावजूद, वे चाहकर भी स्क्रीन टाइम नियंत्रित नहीं कर पा रहे। हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा था, “प्रौद्योगिकी का उपयोग शिक्षा और संचार में अब आवश्यक हो गया है, इसलिए स्कूलों में स्मार्टफोन पर पूर्ण प्रतिबंध अव्यावहारिक हो सकता है।” हालांकि कोर्ट ने यह भी स्वीकार किया कि स्मार्टफोन के अनियंत्रित और अनुचित उपयोग के गंभीर दुष्प्रभाव हैं। भारत जैसे विकासशील देश में जहां डिजिटल क्रांति तेज़ी से आगे बढ़ रही है, वहां बच्चों को स्मार्टफोन से पूरी तरह दूर रखना आसान नहीं है। शिक्षा में डिजिटल लर्निंग की भूमिका बढ़ती जा रही है, और स्मार्टफोन कई बार छात्रों के लिए एक उपयोगी साधन बन जाता है। माता-पिता भी मानते हैं कि बच्चों को स्मार्टफोन से पूरी तरह दूर रखना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि इससे वे आधुनिक तकनीक से अंजान रह जाएंगे और उनका विकास बाधित हो सकता है।
स्वास्थ्य पर बुरा असर
हालांकि, यह भी सच है कि स्मार्टफोन के अनियंत्रित उपयोग से बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। इसलिए, इसका हल यह नहीं कि इसे पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए, बल्कि इसका संतुलित और सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित किया जाए। पूरी तरह प्रतिबंध लगाना भले ही संभव न हो, लेकिन बच्चों का स्मार्टफोन उपयोग कुछ घंटों तक सीमित रखने, पैरेंटल कंट्रोल के ज़रिए अनुचित सामग्री से बचाने, खेल, पढ़ाई, कला और पारिवारिक संवाद को बढ़ावा देने जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है।






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