जातिवाद की चुप्पी: सत्ता की छाया में पनपता सामाजिक विभाजन
विडंबना यह है कि यह सब एक ऐसे युग में हो रहा है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा देते हैं और देश डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत जैसी अवधारणाओं की ओर बढ़ रहा...

विवेक श्रीवास्तव
Twitter X – @viveksbarmeri
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भारत, जिसकी आत्मा विविधता में बसती है, आज फिर एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां सामाजिक संरचना जाति के नाम पर गहराई से बंटी हुई नज़र आती है। राजनीतिक गलियारों से लेकर नौकरशाही, शिक्षा संस्थानों से लेकर न्यायपालिका तक— जाति का जहर धीरे- धीरे हर कोने में घुलता जा रहा है। विडंबना यह है कि यह सब एक ऐसे युग में हो रहा है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा देते हैं और देश डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत जैसी अवधारणाओं की ओर बढ़ रहा है।
सत्ता और जाति का गठबंधन
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह देखा गया है कि नेता, विधायक, मंत्री और अन्य प्रभावशाली पदों पर बैठे लोग अपने चारों ओर उन्हीं जातियों के लोगों को इकट्ठा करते हैं, जिनसे वे स्वयं ताल्लुक रखते हैं। चाहे बात हो व्यक्तिगत स्टाफ (PA, PS, PSO) की नियुक्ति की, या फिर विभिन्न विभागों, बोर्डों और निगमों में नियुक्तियों की— जातीय समीकरण प्राथमिक मानदंड बनता जा रहा है। यह चलन केवल सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह अब राजनीतिक आचरण का अभिन्न हिस्सा बन गया है।
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सत्ताधारी नेता जब किसी क्षेत्र में विकास कार्य कराते हैं, तो प्राथमिकता उसी जाति के इलाकों को दी जाती है, जिससे वे जुड़ते हैं। नतीजतन, दूसरी जातियों के लोग खुद को उपेक्षित और हाशिए पर धकेला हुआ महसूस करते हैं।
जातिगत कार्यक्रमों की प्राथमिकता
यह आम प्रथा बन गई है कि कोई भी नेता अपनी जाति के सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों में बढ़- चढ़कर भाग लेते हैं, जबकि अन्य जातियों के कार्यक्रमों में केवल औपचारिकता निभाई जाती है या फिर पूरी तरह से दूरी बना ली जाती है। इससे सामाजिक एकता की भावना खंडित होती है और जातियों के बीच एक गहरी खाई निर्मित होती है। ऐसे आयोजन केवल सांस्कृतिक नहीं रह जाते, वे शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जाते हैं— “हमारी जाति की ताकत इतनी है” का यह संदेश न केवल अन्य जातियों को डराता है, बल्कि एक असमान सामाजिक वातावरण को भी जन्म देता है।
मीडिया की भूमिका और आवाज़ का फर्क
वर्तमान समय में यह भी देखने को मिला है कि किसी जाति विशेष से जुड़ी घटना, खासकर अगर वह राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हो, तो मीडिया में अधिक प्रमुखता से जगह बनाती है। वहीं यदि वही घटना किसी ऐसी जाति के साथ घटे जो सामाजिक और राजनीतिक रूप से हाशिए पर है, तो उस पर न तो मीडिया ध्यान देती है और न ही कोई जनप्रतिनिधि आवाज़ उठाता है। यह प्रवृत्ति एक खतरनाक संकेत है— यह दर्शाता है कि सामाजिक न्याय और मानवाधिकार की संवेदनाएं भी अब जाति के चश्मे से देखी जा रही हैं।
जातिगत संगठनों का राजनीतिक दबाव
2023 के राजस्थान विधानसभा चुनाव ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब जातियां केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि राजनीतिक ब्लॉक बन चुकी हैं। जातिगत संगठन अब केवल सामाजिक चेतना तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सत्ता और प्रशासन पर दबाव बनाने लगे हैं। मंत्री और विधायक इन संगठनों की सिफारिशों पर अपने स्टाफ की नियुक्तियां करने लगे हैं, और कई बार तो उन स्टाफ को सीधा ‘जातीय आदेश’ पालन करना होता है।
यह परिदृश्य प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता को खतरे में डाल रहा है। लोकतंत्र की आत्मा – “सबके लिए समान अवसर” – इस जातिवादी व्यवहार से गहरी चोट खा रही है।
महापुरुषों का सम्मान
राजस्थान के महापुरुष, चाहे वे लोकदेवता आराध्य देव तेजाजी हों, बिरसा मुंडा या राणा सांगा — ये केवल किसी एक जाति के नहीं, बल्कि समूचे समाज की सांस्कृतिक विरासत हैं। मगर हाल के घटनाक्रमों में यह देखने को मिला है कि जब भी इन महापुरुषों की प्रतिमाओं का अपमान या उनसे जुड़ी कोई घटना घटती है, तो प्रतिक्रिया केवल संबंधित जाति-समुदाय तक सीमित रह जाती है। तेजाजी की मूर्ति के मुद्दे पर सिर्फ जाट नेता सामने आए। बिरसा मुंडा की प्रतिमा खंडित होने पर केवल मीणा समाज ने विरोध दर्ज कराया, और राणा सांगा के अपमान पर केवल राजपूत समाज मुखर हुआ। यह प्रवृत्ति चिंताजनक है, क्योंकि यह हमारे साझा इतिहास और गौरवशाली विरासत को जातिगत दायरे में सीमित कर रही है। जरूरत इस बात की है कि समाज एकजुट होकर इन महापुरुषों का सम्मान करे, ताकि वे सच्चे मायनों में समस्त राजस्थान और भारत के प्रेरणास्रोत बने रहें।
भविष्य की आशंकाएं
इस जातिगत सोच की जड़ें अगर इसी तरह मजबूत होती रहीं, तो आने वाला समय और अधिक खतरनाक होगा। राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित जातियां खुद को असहाय समझेंगी, और इससे आक्रोश, असंतोष और सामाजिक विद्वेष पैदा होगा।
आज की युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया के माध्यम से राजनीतिक-सामाजिक घटनाओं से जुड़ी है, अब पुलिस भर्ती से लेकर न्यायिक नियुक्तियों तक में जाति ढूंढती है। यह सोच भारत की लोकतांत्रिक संरचना को अंदर से खोखला कर रही है।
प्रधानमंत्री और केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो तीसरी बार देश की बागडोर संभाल चुके हैं, अपने भाषणों में सबके साथ और सबके विकास की बात करते हैं। पर सवाल उठता है — जब मंत्रियों और विधायकों के इर्द-गिर्द केवल उन्हीं की जाति के लोग हैं, जब विकास के संसाधन केवल उन्हीं जातियों तक सीमित हैं जो सत्ता के करीब हैं, तब ‘सबका साथ’ कैसे संभव है?
गृहमंत्री अमित शाह, जिनकी छवि एक चतुर और सबकुछ जानने वाले नेता की है, क्या उन्हें यह जातिगत समीकरण और पक्षपात नहीं दिखता? अगर दिखता है और फिर भी चुप्पी है, तो यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है। क्या यह उनकी मौन सहमति मानी जाए?
संघ की विचारधारा और वास्तविकता
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो ‘एक राष्ट्र, एक समाज’ की अवधारणा को लेकर चलता है, उसकी सोच को भी इन जातिगत प्रवृत्तियों से धक्का लग रहा है। जिन पदों पर संघ के करीबी नेता या स्वयंसेवक नियुक्त हैं, वे भी जब केवल जाति की बात करने लगें तो यह सामाजिक समरसता के लिए खतरे की घंटी है।
महापुरुषों का जातीयकरण
राज्य और देश के महापुरुषों को भी अब जातीय चश्मे से देखा जा रहा है। उन्हें केवल किसी विशेष जाति का प्रतिनिधि बनाकर प्रस्तुत करना, उनकी विचारधारा और योगदान का अपमान है। ये महापुरुष देश की धरोहर हैं — किसी एक जाति की जागीर नहीं।
निष्कर्ष: बदलाव की जरूरत
इस पूरे परिदृश्य का विश्लेषण यही कहता है कि यदि जातिगत आधार पर सत्ता, नीति और प्रशासन चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सामाजिक विभाजन गहरा होगा और भारत की लोकतांत्रिक भावना छिन्न-भिन्न हो जाएगी। राजनीतिक दलों को चाहिए कि वे अपने नेताओं को जातिगत सीमाओं से ऊपर उठने की प्रेरणा दें। नियुक्तियां योग्यता के आधार पर हों, न कि जाति के। सभी समाजों को बराबरी से सम्मान और प्रतिनिधित्व मिले — तभी “सबका साथ, सबका विकास” का नारा जमीन पर साकार हो पाएगा।
राजनीति में जाति नहीं, नीति हो। प्रतिनिधि वह हो जो पूरे क्षेत्र की आवाज़ हो, न कि केवल अपनी जाति का प्रतिनिधि। तभी भारत सामाजिक समरसता और विकास के उस मार्ग पर अग्रसर हो सकेगा, जिसकी कल्पना इसके संविधान निर्माताओं ने की थी।
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(यह लेख जनहित और सामाजिक चेतना को ध्यान में रखते हुए लिखा गया है। उद्देश्य किसी समुदाय या समूह को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि एक समावेशी समाज की ओर चिंतन को प्रेरित करना है।)

विवेक श्रीवास्तव (बाड़मेरी)
राजस्थान की पत्रकारिता का युवा अनुभवी चेहरा है! 13 वर्ष की पत्रकारिता में राजस्थान पत्रिका, हिन्दुस्थान समाचार, ईटीवी, थिंक 360, राजस्थान चौक सहित विभिन्न मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता कर चुके है!! वर्तमान में सच बेधड़क टीवी न्यूज़ चैनल में एसोसिएट एडिटर है! राजस्थान में फोन टेपिंग खुलासे से लेकर कई राजनीतिक बड़ी ख़बर और X पर बेबाक टिप्पणी के लिए मशहूर है





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