वो दीया जो आँधियों में भी जला रहा…
मथुरादास माथुर 'भा' जी वो दीया थे जो आँधियों में भी जला और आज भी जनसेवा के उजाले में जलता...

कुछ लोग इतिहास के पन्नों में दर्ज होते हैं,
और कुछ… दिलों के पन्नों में जलते दीपक बन जाते हैं।
स्वतंत्रता सेनानी, दूरदर्शी राजनेता और समाजसेवी मथुरादास माथुर ‘भा’ जी ऐसा ही एक दीप थे,
जो संघर्ष की आँधियों में भी बुझा नहीं—बल्कि और प्रखर होकर चमका।
6 सितंबर 1918 को जोधपुर में जन्मे भा जी ने लखनऊ विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की।
उनके भीतर बचपन से ही स्वतंत्रता की लौ जल रही थी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़कर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी निभाई और जेल भी गए।
1948 में जब मारवाड़ राज्य की पहली सरकार बनी, तो वे स्वास्थ्य और शिक्षा मंत्री बने—राज्य निर्माण की नींव के पत्थर।
उनकी कार्यकुशलता और नेतृत्व क्षमता ने उन्हें जनप्रिय बना दिया।
1952 से 1957 तक वे राजस्थान विधानसभा में पहले मुख्य सचेतक रहे।
1957 में नागौर से दूसरी लोकसभा के लिए चुने गए।
1962 से 1967 तक वे राजस्थान सरकार में गृह मंत्री रहे।
उनका व्यक्तित्व किसी घने बरगद जैसा था—जिसकी छाया में हर वर्ग ने सुकून पाया।
वे रूढ़ियों और आडंबरों के खिलाफ एक सतत आवाज़ थे,
जो शिक्षा, व्यावसायिक जागरूकता और सामाजिक समरसता को जीवन-मंत्र मानते थे।
उनकी सोच किसी शिलालेख की तरह स्थायी थी—जिस पर सेवा, सादगी और संकल्प के अक्षर खुदे थे।
आज जब उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि दी जाती है,
तो लगता है जैसे वे कोई बीती स्मृति नहीं,
बल्कि हर उस युवा की प्रेरणा हैं जो समाज के लिए कुछ करना चाहता है।
भा जी चले गए… पर जैसे कोई सच्चा सूरज अस्त नहीं होता,
वैसे ही वे आज भी हर उस उजाले में जीवित हैं जो जनकल्याण से जुड़ा है।
वो दीया जो आँधियों में भी जला रहा… आज भी उजियारा दे रहा है।






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