भूगोल ने बाँधी कविता की चोटी : शैक्षणिक प्रयोग
"पद्य–भूगोल" उस युग की मिसाल है, जब रटने की रस्सी को पद्य के फुंदनों से सजाया गया। वह एक ऐसा शैक्षणिक प्रयोग था, जो आज भी बताता है — जब ज्ञान गीत बन जाए, तो यादों की वीणा खुद बज उठती...

सन 1925। वक्त था जब क्लासरूम की खिड़कियों से न ज्ञान उड़ता था, न नवाचार की हवा बहती थी। किताबें भारी थीं, पाठ बोझिल और भूगोल – वो तो जैसे मानचित्रों में उलझा हुआ कोई भूल-भुलैया! ऐसे ही समय में एक विद्यार्थी श्याम बिहारी लाल श्रीवास्तव ने शिक्षा के आकाश में जुगाड़ की पतंग उड़ाई — और वह पतंग थी “पद्य–भूगोल”।
यह कोई साधारण प्रयोग नहीं था। यह था – भारत के भूगोल को पद्यबद्ध कर उसे यादगार और रुचिकर बनाने का प्रयास। जहाँ नदियाँ छंदों में बहती थीं, पर्वत यमक बनकर ऊँचाई पाते थे और मैदान अनुप्रास के विस्तार में समा जाते थे। यह काव्य-भूगोल ज्ञान की बर्फी थी, जिसे बच्चे स्वाद से खाते और स्मृति में रख लेते।
श्याम बिहारी का यह प्रयोग शिक्षक बाबूसिंह को ऐसा भाया कि उन्होंने इस छात्र की लेखनी को “पद्य–भूगोल” पुस्तक के रूप में मुंबई के श्रीवेंकटेश्वर स्टीम प्रेस से छपवा डाला। 1000 प्रतियों का प्रकाशन – मानो शिक्षा की धारा में एक मीठा झरना बहा दिया गया हो।
पुस्तक की भूमिका में श्रीवास्तव ने विनम्रता से मर्मज्ञों से क्षमा मांगते हुए लिखा – “यह केवल विद्यार्थियों के हित के लिए है, न कि साहित्यिक चमत्कार के लिए।” उनके शब्दों में सच्चाई और साधना दोनों झलकती थी।
“पद्य–भूगोल” उस युग की मिसाल है, जब रटने की रस्सी को पद्य के फुंदनों से सजाया गया। वह एक ऐसा शैक्षणिक प्रयोग था, जो आज भी बताता है — जब ज्ञान गीत बन जाए, तो यादों की वीणा खुद बज उठती है।यह किताब सिर्फ भूगोल नहीं पढ़ाती थी, यह बताती थी – कैसे कविता के कंधों पर बैठकर ज्ञान दूर-दूर तक पहुँच सकता है।






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