शीन काफ निज़ाम : उर्दू शायरी के सौंधे बादल, जिन्होंने जोधपुर का मान बढ़ाया
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा घोषित पद्मश्री सम्मान, शीन काफ निजाम की दशकों की साहित्य सेवा का सम्मान है। यह सम्मान न केवल निज़ाम का, बल्कि पूरे मारवाड़ और भारत की गंगा-जमनी तहज़ीब का गौरव...

जोधपुर की तंग गलियों से उठकर शीन काफ निज़ाम ने उर्दू अदब की बुलंदियों को छू लिया। जन्म से शिव किशन बिस्सा, लेकिन साहित्यिक दुनिया में उन्होंने अपने कलम नाम से एक ऐसा मकाम हासिल किया, जिसे आज देश ही नहीं, दुनिया भी सलाम कर रही है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा घोषित पद्मश्री सम्मान, उनकी दशकों की साहित्य सेवा का सम्मान है। यह सम्मान न केवल निज़ाम का, बल्कि पूरे मारवाड़ और भारत की गंगा-जमनी तहज़ीब का गौरव है।
उनकी शायरी महज़ अल्फाज़ नहीं, बल्कि रूह से निकली हुई पुकार है। निज़ाम ने सिद्ध किया कि भाषा किसी मज़हब की बंधक नहीं होती। संस्कृत में शिक्षित होकर उर्दू और फारसी में महारत हासिल करना यही दर्शाता है कि सृजन और संवेदना की कोई दीवार नहीं होती। उनकी ग़ज़लों में हिन्दुस्तानी मिट्टी की ख़ुशबू है, और उनकी सोच में हर दिल को जोड़ने की ताक़त।
वे उस शायर की मिसाल हैं, जो शब्दों से नहीं, आत्मा से लिखता है। उनकी लेखनी में मौसम बदलते हैं, रूह भीगती है और तअल्लुक़ गहराते हैं। साहित्य अकादमी, मेहमूद शीरानी अवॉर्ड, इक़बाल सम्मान जैसे कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजे गए शीन काफ निज़ाम अब पद्मश्री की पंक्ति में खड़े हैं — विनम्र, विचारशील और विवेकवान।
उनका कहना है, “जुबान मज़हब की नहीं होती,” और यही बात उन्हें इस दौर का एक जरूरी आवाज़ बनाती है। शीन काफ निज़ाम केवल एक नाम नहीं, एक सोच हैं — जो प्रेम, साहित्य और सौहार्द की जुबान बोलती है। जोधपुर का यह सपूत अब देश की साहित्यिक धरोहर बन चुका है।






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