मेहरानगढ़ : इंजीनियरिंग का वो चमत्कार, जिसे समय भी नहीं झुका सका
मेहरानगढ़ के निर्माण के समय न तो सीमेंट का नाम सुना गया था, न ही कोई भारी मशीनें थीं। फिर भी इसकी दीवारें इतनी मजबूत हैं कि सैकड़ों सालों की धूप, बारिश और आँधियाँ इसे हिला तक नहीं...

राजस्थान की तपती रेत पर जोधपुर का मेहरानगढ़ किला ऐसे खड़ा है मानो समय के समंदर में एक अडिग दीपस्तंभ हो। यह केवल एक किला नहीं, बल्कि स्थापत्य, विज्ञान, संस्कृति और श्रम की चार दिशाओं का ऐसा संगम है, जो आज भी आधुनिक इंजीनियरों को हैरान कर देता है।आधुनिक दुनिया जब आज सीमेंट, स्टील और टाइल्स की ताकत से ऊँची इमारतें खड़ी कर रही है, तब यह जानना चौंकाता है कि मेहरानगढ़ के निर्माण के समय न तो सीमेंट का नाम सुना गया था, न ही कोई भारी मशीनें थीं। फिर भी इसकी दीवारें इतनी मजबूत हैं कि सैकड़ों सालों की धूप, बारिश और आँधियाँ इसे हिला तक नहीं पाईं। न दरारें पड़ीं, न सीलन आई।इतिहास गवाह है कि इस किले पर कई बार आक्रमण हुए, तोपें दागी गईं, मगर यह किला कभी झुका नहीं। इसकी दीवारें आज भी गर्व से खड़ी हैं, जैसे वीरता की कहानी खुद पत्थरों में उकेरी गई हो। इसके द्वार, बुर्ज और परकोटे आज भी उस दौर की युद्धनीति और रक्षण कला की गवाही देते हैं।मेहरानगढ़ के कक्षों में प्रवेश करते ही एहसास होता है कि यह सिर्फ सुंदरता नहीं, समझदारी का भी प्रतीक है। इसकी दीवारें और छतें इस तरह बनाई गई हैं कि गर्मियों में भीतर ठंडक बनी रहती है और सर्दियों में गुनगुनी गर्माहट मिलती है। बिना किसी बिजली के, बिना किसी पंखे या एसी के — एक प्राकृतिक स्मार्ट होम।किले के गलियारे, खिड़कियाँ, झरोखे और छज्जे — सभी इस तरह डिज़ाइन किए गए हैं कि हर कमरे में भरपूर रोशनी और ताजगी बनी रहती है। सूर्य के साथ बदलते हुए इसके आंगनों में छाया और रोशनी का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह वास्तुकला नहीं, एक ध्यान है — प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन का ध्यान।इस किले के निर्माण में जोड़ा गया चूना, गुड़ और मैथी — ये कोई साधारण सामग्री नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों की वैज्ञानिक सोच और अनुभव का निचोड़ थे। इनसे बना प्लास्टर वर्षों तक वैसा ही चमकता रहा, जैसे अभी कल लगाया गया हो। चिकनाई ऐसी कि आज की मशीनें भी मात खा जाएँ।सीमेंट कंपनियाँ चाहे जितने भी नए फॉर्मूले बना लें, मेहरानगढ़ को देखकर आज भी यही कहना पड़ता है — कि असली टेक्नोलॉजी न मशीन में होती है, न कोड में। वो तो कारीगर के हाथ, उसकी नज़र और आत्मा से निकलती है।हर दीवार, हर झरोखा, हर बुर्ज इस बात की गवाही देता है कि जब इंसान सिर्फ इमारत नहीं, बल्कि इतिहास बनाना चाहे, तो वो समय को भी थाम लेता है। मेहरानगढ़ सिर्फ किला नहीं, एक जीवित गाथा है — जो सदियों से खड़ी है और शायद सदियों तक यूं ही अमर रहेगी।






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