जब तपती रेत पर जमी थी बर्फ – सवा सौ साल पहले का जोधपुर
सवा सौ साल पहले जोधपुर की तपती गर्मियों से निपटने के लिए बर्फ के कारखाने स्थापित किए गए थे। इन प्रयासों ने शहर की जीवनशैली और स्वच्छता में ऐतिहासिक बदलाव...

कल्पना कीजिए — एक ऐसा शहर जहाँ सूरज मानो रोज़ युद्ध के लिए निकलता हो, जहाँ रेत की लहरें गर्म हवाओं के साथ थिरकती हों, और जहाँ पसीने से भीगी दोपहरें किसी तपस्या जैसी लगें। यह कोई मिथक नहीं, यह सवा सौ साल पहले का जोधपुर है — रेत का शहर, पर सपनों की ठंडक से भरा।
आज से करीब 125 साल पहले, जब बिजली भी पूरी तरह नहीं पहुँची थी और पंखे केवल अमीरों के ख्वाब में होते थे, तब जोधपुर ने गर्मी से लड़ने का ऐसा जतन किया जिसने इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई — बर्फ का कारखाना!
जी हाँ, सन् 1907 में, इस तपते मरुस्थली नगर में एक आइस फैक्ट्री की स्थापना हुई। सोचिए, उस दौर में बर्फ बनाना… जहाँ खुद पानी भी मोल मिलता हो! यह केवल तकनीक नहीं, एक जिद थी — जोधपुर को तपिश से आज़ादी दिलाने की।
बर्फ उस समय ‘ठंडक’ से कहीं ज़्यादा थी — यह सेहत की रक्षा करती, त्योहारों की शान बढ़ाती और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बनती। जिसकी शादी में बर्फ आई, समझो उसका मान-सम्मान दुगना हो गया।
लेकिन बर्फ ही क्यों? जोधपुर ने और भी कई अनोखे तरीके ईजाद किए गर्मी से लड़ने के लिए — ऊँचे आँगनों वाली हवेलियाँ, रेत से ठंडे पत्थरों के महल, पानी के कुंड और छायादार गलियों वाला बुनियादी स्थापत्य। गर्मी को हराने की जुगत हर कोने में थी — और शायद यही था जो इस शहर को “गर्मी की राजधानी में ठंडक की खोज” बनाता है।
जोधपुर, उस समय, सिर्फ एक शहर नहीं था — वह एक प्रयोग था। एक प्रयोग कि अगर सपने सच्चे हों और इरादे पक्के, तो रेत पर भी बर्फ जमी जा सकती है।






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