सरदार क्लॉक टावर: समय के सिरमौर की बदलती पहचान
जोधपुर के दिल में धड़कता एक ऐसा धरोहर स्थल, जिसकी पहचान कभी सिर्फ “घंटाघर” नहीं थी। वह था—‘सरदार क्लॉक...

जोधपुर के दिल में धड़कता एक ऐसा धरोहर स्थल, जिसकी पहचान कभी सिर्फ “घंटाघर” नहीं थी। वह था—‘सरदार क्लॉक टावर’, जो महाराजा सरदारसिंहजी की दृष्टि और जोधपुर के गौरव का प्रतीक था। 11 मार्च 1910 को रखी गई इसकी नींव, केवल पत्थर नहीं, समय के स्वाभिमान की नींव थी।
100 फीट ऊँचा यह टावर जब 1912 में लंदन से लाई गई भारी-भरकम घड़ी के साथ पूरा हुआ, तो उसने जोधपुर को एक नई ध्वनि दी—टिक-टिक नहीं, टंकार! शहर की सड़कों, बाजारों और घरों में समय का ऐलान करता यह टावर अपनी ऊँचाई से नहीं, बल्कि अपनी ‘सरदार’ पहचान से पहचाना जाता था।
लेकिन जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, ‘सरदार क्लॉक टावर’ बस ‘घंटाघर’ बनकर रह गया। नाम छोटा हुआ, पहचान भी फीकी सी होने लगी। अब लोग उसकी विशाल घड़ी की कहानी नहीं जानते, ना ही यह कि उसे दुरुस्त रखने वाले पारंपरिक घड़ीसाज़ लगभग लुप्त हो गए हैं।
सरदार क्लॉक टावर की पहचान को आज फिर से उभारने की ज़रूरत है। क्योंकि यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि इतिहास की वह मीनार है जिसने जोधपुर को समय पर चलना सिखाया।
फोटो साभार अविनाश मेहता, जोधपुर






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