पहलगाम के बहाने आतंक पर निर्णायक रुख जरूरी
पहलगाम की आतंकी घटना न केवल भारत की सुरक्षा नीति पर सवाल उठाती है, बल्कि भारत-पाकिस्तान संबंधों को भी एक संवेदनशील मोड़ पर ला खड़ा करती...

भारत-पाक संबंध संवेदनशील मोड़ पर
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ आतंकी हमला एक बार फिर यह याद दिलाता है कि आतंकवाद आज भी भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है। इस हमले में निर्दोष लोगों की जान गई, और इसके पीछे की कड़ियाँ एक बार फिर सीमापार की ओर इशारा करती हैं। यह घटना न केवल भारत की सुरक्षा नीति पर सवाल उठाती है, बल्कि भारत-पाकिस्तान संबंधों को भी एक संवेदनशील मोड़ पर ला खड़ा करती है।
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बीते वर्षों में उरी, पठानकोट और पुलवामा जैसे हमलों ने दोनों देशों के बीच संवाद की प्रक्रिया को बार-बार बाधित किया है। हर बार अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने पाकिस्तान से अपेक्षा की है कि वह अपने यहां सक्रिय आतंकी संगठनों पर सख्त कार्रवाई करे। अब जब पहलगाम की घटना सामने है, तो पाकिस्तान के पास एक अवसर है—वह न केवल दोषियों की पहचान करे, बल्कि भारत के साथ सहयोग करते हुए उन्हें न्याय के कटघरे में लाने का प्रयास भी करे।
पाकिस्तान क्षेत्रीय शांति के लिए गंभीर भूमिका निभाए
अमेरिका समेत अन्य वैश्विक शक्तियों ने भी पाकिस्तान से यह अपेक्षा जताई है कि वह क्षेत्रीय शांति के लिए गंभीर भूमिका निभाए। यदि पाकिस्तान अपने व्यवहार में बदलाव लाता है और आतंक के विरुद्ध ठोस कदम उठाता है, तो इससे दोनों देशों के बीच विश्वास की पुनर्स्थापना हो सकती है। यह भी समझना होगा कि आज पाकिस्तान स्वयं एक गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। बढ़ती महंगाई, विदेशी कर्ज़ और डांवाडोल राजनीतिक हालात ने उसकी अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। वहीं भारत आत्मनिर्भरता, डिजिटल प्रगति, वैश्विक निवेश और अंतरिक्ष-तकनीक के क्षेत्र में बड़ी सफलताएँ अर्जित कर चुका है और अब विकसित देशों की कतार में शामिल होने को तत्पर है। ऐसे में युद्ध पाकिस्तान को और पीछे धकेल देगा, जबकि भारत की विकास यात्रा भी बाधित होगी।
युद्ध से केवल विनाश व जनहानि
युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। वह केवल और अधिक विनाश, जनहानि और अस्थिरता को जन्म देता है। ऐसे में वर्तमान समय दोनों देशों के लिए आत्मचिंतन का है। भारत ने हमेशा शांति और विकास को प्राथमिकता दी है, अब यह जिम्मेदारी पाकिस्तान की है कि वह अपने कदमों से यह सिद्ध करे कि वह भी इसी राह पर चलना चाहता है। पहलगाम की त्रासदी को केवल एक दुःखद घटना मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह समय है कि इसे एक चेतावनी की तरह लेते हुए आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट होकर निर्णायक नीति बनाई जाए—जिसमें सहयोग, पारदर्शिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रमुख हों। यदि दोनों देशों के बीच युद्ध की स्थिति बनती है, तो उसका प्रभाव केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा। दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं, जनसंख्या घनी है और संसाधनों की पहले से ही कमी है। ऐसे में एक पूर्ण युद्ध से होने वाला जान-माल का नुकसान और सामाजिक-विकासात्मक पिछड़ाव इतना भीषण हो सकता है जिसकी कल्पना मात्र ही भयावह है। इतिहास और भूगोल दोनों गवाही देते हैं कि युद्ध का कोई विजेता नहीं होता—हारती है तो केवल मानवता।






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