“शुद्ध के लिए युद्ध”: क्या यह अब केवल खानापूर्ति बन गया है?
2019 में जब बड़े स्तर पर दूध और मावा व्यापारियों पर कार्रवाई हुई, तब भी कानूनी प्रक्रियाएं इतनी धीमी थीं कि मिलावटखोर आसानी से बच...

राजस्थान में मिलावटखोरी के विरुद्ध सरकारी मुहिम का असल स्वरूप क्या है?
राजस्थान सरकार वर्षों से ‘शुद्ध के लिए युद्ध’ अभियान चलाती रही है, जिसका उद्देश्य खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकना और जनता को सुरक्षित उत्पाद उपलब्ध कराना है। लेकिन अब यह अभियान एक मौसमी रस्म बनकर रह गया है— कुछ हफ्तों की छापेमारी, सैंपलिंग, प्रेस नोट्स और फिर सामान्य स्थिति।
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हाल ही में कोटपूतली-बहरोड़ के बानसूर कस्बे में हुई छापेमारी इसका ताजा उदाहरण है। दो प्रतिष्ठानों से लिए गए सैंपल जांच के लिए भेजे गए— पर आगे क्या हुआ, यह जानकारी आमजन को नहीं मिलती। यही कहानी जयपुर, जोधपुर, अजमेर या कोटा की भी है। नमूने फेल होते हैं, पर दोषियों पर कार्रवाई ना के बराबर होती है।
आसानी से बच निकलते हैं मिलावटखोर
2019 में जब बड़े स्तर पर दूध और मावा व्यापारियों पर कार्रवाई हुई, तब भी कानूनी प्रक्रियाएं इतनी धीमी थीं कि मिलावटखोर आसानी से बच निकले। लचर न्याय प्रक्रिया और अपारदर्शी सूचना प्रणाली इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी कमजोरी है। यह अभियान तब तक प्रभावी नहीं हो सकता जब तक इसे सालभर चलने वाली निगरानी प्रणाली में न बदला जाए। साथ ही, दोषियों के नाम सार्वजनिक करना, फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई और उपभोक्ता जागरूकता— ये सभी अनिवार्य कदम हैं। ‘शुद्ध के लिए युद्ध’ को सफल बनाना केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं है, यह एक सामाजिक आंदोलन होना चाहिए। मीडिया, स्कूल, पंचायतें और स्वयंसेवी संस्थाएं इसमें भागीदार बनें, तभी मिलावट के खिलाफ लड़ाई सही मायनों में लड़ी जा सकेगी।
आज जरूरत है इच्छाशक्ति की—राजनीतिक भी और प्रशासनिक भी। वरना यह अभियान केवल अखबारों की सुर्खियों और विभागीय तस्वीरों तक सीमित रह जाएगा, और आमजन के हिस्से में आती रहेगी मिलावट से भरी थाली।






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