पहलगाम त्रासदी में झांकता आइना
पहलगाम की वादियों में बर्फ़ की सर्द हवाओं के बीच, एक ख़ून की गर्म बूंद ने गवाही दी कि दुश्मन अब सिर्फ़ सरहद पार से नहीं आता, वह हमारे पूर्वग्रहों, हमारी चुप्पियों और हमारे भेदभाव में भी...

विवेक श्रीवास्तव
लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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“तेरा मज़हब है क्या, तेरा नाम क्या है,
किसी ने पूछा और तू क़त्ल हो गया।
इंसानियत बस देखती रह गई,
किसी गली के मोड़ पर, कहीं मर गई।”
भारत, जिसकी रूह उसकी विविधता में बसती है, आज फिर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ धर्म, जाति और क्षेत्र की पहचान, इंसानियत की जगह लेने लगी है। पहलगाम की वादियों में बर्फ़ की सर्द हवाओं के बीच, एक ख़ून की गर्म बूंद ने गवाही दी कि दुश्मन अब सिर्फ़ सरहद पार से नहीं आता, वह हमारे पूर्वग्रहों, हमारी चुप्पियों और हमारे भेदभाव में भी है।
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कश्मीर, जिसे मुग़ल बादशाह जहाँगीर ने ‘जन्नत’ कहा था, एक बार फिर दहशतगर्दी की साज़िश का शिकार बना। पहलगाम में पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले में केवल गोलियाँ नहीं चलीं, एक समाज के रूप में हमारी सोच भी तार-तार हुई। आतंकियों ने कथित तौर पर धर्म पूछकर निर्ममता से लोगों की जान ले ली। वहीं, एक कश्मीरी नौजवान आदिल ने अपनी जान की परवाह किए बिना पर्यटकों को बचाने की कोशिश की और वह शहीद हो गया।
आदिल की कुर्बानी ने न केवल एक बहादुर कश्मीरी की तस्वीर पेश की, बल्कि यह भी साबित किया कि घाटी का दिल अब भी भारत के साथ धड़कता है। पहली बार स्थानीय जनता खुलकर आतंक के ख़िलाफ़ खड़ी नज़र आई। यह बदलाव की आहट है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आहट गूंज में बदलेगी या सत्ता की राजनीति इसे दबा देगी?
धर्म की सियासत: आस्था या आग?
धर्म आज सियासत का हथियार बन गया है। पहलगाम की घटना इसका सबसे दुःखद उदाहरण है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या हमारी राजनीति इससे अलग है? चुनावों में मुस्लिम-महिलाओं का ‘हिजाब’, दलितों के ‘मंदिर प्रवेश’ या किसी संप्रदाय का ‘राष्ट्रभक्ति प्रमाणपत्र’ क्या यह सब धर्म का उपयोग नहीं है? राजनीति ने धर्म को अब ‘जनसंख्या संतुलन’, ‘मजहबी कट्टरता’ और ‘वोट बैंक’ की श्रेणी में बांट दिया है। नतीजा यह है कि समाज में विश्वास की जगह संदेह, और भाईचारे की जगह भय ने ले ली है।
विभाजन के साये में राष्ट्रीय एकता
पहलगाम की घटना से एक ओर जहां राष्ट्रीय एकता की नई मिसाल पेश हुई, वहीं यह भी उजागर हुआ कि भारत में आंतरिक विभाजन कितना गहरा है। यह विडंबना है कि आतंकवाद से लड़ने का सपना लिए हम एकजुट होते हैं, लेकिन रोज़मर्रा के जीवन में धर्म के आधार पर एक-दूसरे से कटते जाते हैं।
लोकतंत्र की रगों में जातिवाद का ज़हर
भारत में जाति एक ऐसी परछाईं है जो हर सामाजिक और राजनीतिक निर्णय पर गिरती है। संविधान के मूल्यों की कसौटी पर जब हम समाज को परखते हैं तो दिखता है कि योग्यता अब केवल एक छलावा है। असली मुद्दा है जातीय पहचान। सरकारी नौकरियों में आरक्षण की बहस हो या विश्वविद्यालयों में दाख़िले की प्रक्रिया, हर जगह पहचान पहले, पात्रता बाद में देखी जाती है। यह सोच केवल नीति-निर्माण तक सीमित नहीं, बल्कि आज सत्ता के गलियारों में नियुक्तियों से लेकर अफ़सरशाही के निर्णयों तक में ‘जातिगत समीकरण’ प्राथमिकता बन चुके हैं।
सत्ता का जातिगत गठबंधन
आज जब आप किसी भी प्रभावशाली मंत्री या सांसद के दफ़्तर में झांकते हैं, तो उनके निजी स्टाफ़ (पीए, पीएस, पीआरओ) से लेकर सचिवालय तक, एक खास जाति का वर्चस्व नज़र आता है। यहां ‘योग्यता’ की जगह ‘अपनापन’ ही कुंजी बन गया है। यह प्रवृत्ति अब केवल अपवाद नहीं रही। यह सत्ता का ढांचा बन चुकी है। चुनावी घोषणापत्रों से लेकर ज़मीनी विकास योजनाओं तक, ‘जातीय लाभ’ सबसे बड़ा निर्णायक बन गया है। गांवों में सड़कों से लेकर शौचालयों तक पहले जाति देखी जाती है, फिर ज़रूरत। यही वजह है कि तमाम योजनाओं के बावजूद, असली ज़रूरतमंद हाशिये पर रह जाते हैं।
मौन की साझेदारी
जिस मीडिया को समाज का आईना कहा जाता है, वह अब एक भ्रमित दर्पण बन चुका है। सत्ता के नज़दीक बैठने की चाह में, मुद्दे को ‘सुनामी’ या ‘ब्रेकिंग’ बनाने के चक्कर में, पत्रकारिता अब पीआर बन चुकी है। आतंकवाद, जातिवाद और सांप्रदायिकता पर गहराई से सवाल उठाने की जगह, मीडिया अब किसी और रूप में ही सामने है। आदिल जैसे नायक का बलिदान कुछ चैनलों पर “ब्रेकिंग” बना, लेकिन अगले दिन ही वह गायब हो गया, क्योंकि वह न तो ‘टीआरपी’ का हीरो था, और न किसी दल का।
रास्ता क्या है?
भारत अगर वाक़ई विश्वगुरु बनना चाहता है, तो उसे पहले अपने अंदर के इन ज़हरों से मुक्त होना होगा। शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ़ डिग्री नहीं, बल्कि दृष्टि बनना चाहिए। धर्म को हथियार नहीं, सेतु बनाना होगा। और सबसे ज़रूरी, जाति को पहचान नहीं, एक इतिहास मानकर आगे बढ़ना होगा। सरकारों को चाहिए कि वे जातिगत गणित से ऊपर उठकर राष्ट्रीय नीति पर काम करें। नौकरियों और शिक्षा में पारदर्शिता सुनिश्चित हो, अफ़सरशाही में प्रतिनिधित्व समान हो, और हर उस संगठन पर नज़र रखी जाए जो जाति या धर्म के नाम पर समाज में जहर घोलता है।
(उक्त आलेख लेखक के निजी विचार हैं।)






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