जब दिमाग व अनुभव भी ट्रांसफर होने लगेंगे
दुनिया भर के शोधकर्ता उस तकनीक पर काम कर रहे हैं जो एक व्यक्ति के मस्तिष्क में मौजूद अनुभव, ज्ञान और विचारों को दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क में ट्रांसफर कर सके। अगर ऐसा संभव हो जाता है, तो यह मानव...

ब्रेन-टू-ब्रेन इंटरफेस की बदलती दुनिया
कई बार नए- नए शोधकार्यों को देखते हुए व सुनते हुए मन में ख्याल आता है कि क्या इंसान अपने अनुभव को किसी दूसरे इंसान के दिमाग या शरीर में मात्र एक इंजेक्शन या किसी तकनीक के जरिए ट्रांसफर करा सकेगा? ऐसा ख्याल इसलिए भी आता है, क्योंकि हमारे पूर्वजों ने कभी आकाश में उड़न खटोले के माध्यम से उड़ने की कल्पना की थी और आज हम विमानों में आसानी से उड़ रहे हैं। कभी चांद- सितारों तक पहुंचने का मन बनाया था, आज पहुंच भी रहे हैं। कभी किसी जानलेवा बीमारी का नामो-निशां मिटाने की ठानी थी, इसमें भी सफलता हासिल कर ली। इतना सबकुछ देखकर दिमाग या अनुभव ट्रांसफर की कल्पना बेमानी नहीं लगती। निकट भविष्य में लगता है इंसान इसमें सफलता जरूर हासिल कर लेगा।
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एक समय था जब ‘टेलीपैथी’, यानी मन की बात बिना कहे समझना, केवल विज्ञान की कहानी का हिस्सा हुआ करता था। लेकिन आज की वैज्ञानिक प्रगति इस धारणा को वास्तविकता की दिशा में ले जा रही है। दुनिया भर के शोधकर्ता उस तकनीक पर काम कर रहे हैं जो एक व्यक्ति के मस्तिष्क में मौजूद अनुभव, ज्ञान और विचारों को दूसरे व्यक्ति के मस्तिष्क में ट्रांसफर कर सके। अगर ऐसा संभव हो जाता है, तो यह मानव इतिहास की सबसे क्रांतिकारी उपलब्धियों में से एक होगी।
विद्युत संकेतकों व रसायनों के जरिए काम करता है दिमाग
वैज्ञानिक बताते हैं कि हमारा दिमाग बिजली व रसायनों के जरिए अपना काम करता है। जब हम कुछ सोचते हैं, निर्णय लेते हैं, या कुछ महसूस करते हैं तो हमारे न्यूरॉन्स के बीच विद्युत संकेत चलते हैं। वैज्ञानिकों को अब इन्हीं संकेतों को पढ़ने और संप्रेषित करने में सफलता मिल रही है। ब्रेन-टू-ब्रेन इंटरफेस एक ऐसी तकनीक है जो दो लोगों (या प्राणियों) के दिमागों को कम्प्यूटर या अन्य डिवाइस के माध्यम से जोड़ती है। इसका उद्देश्य यह है कि एक व्यक्ति का मस्तिष्क, दूसरे के मस्तिष्क को सीधे सूचना भेज सके, वो भी बिना किसी भाषा, हावभाव या स्क्रीन के। वर्ष 2013 में ड्यूक यूनिवर्सिटी (अमेरिका) के प्रोफेसर मिगुएल निकोलेलिस और उनकी टीम ने दो चूहों के बीच दिमागी संचार का सफल परीक्षण किया। एक चूहा ‘प्रेषक’ था, जो एक बटन दबाकर इनाम प्राप्त करता था। उसके मस्तिष्क से निकाले गए सिग्नल को वायरलेस तरीके से दूसरे चूहे को भेजा गया, जिसे ‘रिसीवर’ चूहा कहा गया। रिसीवर चूहा बिना देखे और सिखाए, वही बटन दबाने लगा।
इंसानों के बीच ‘हां’ और ‘ना’ का ट्रांसफर
वर्ष 2014 में अमेरिका और यूरोप के वैज्ञानिकों की एक टीम ने इलेक्ट्रोएनसेफेलोग्राफी (Electroencephalography) और ट्रांसक्रैनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन (Transcranial Magnetic Stimulation) तकनीक की मदद से दो व्यक्तियों के बीच एक सरल विचार का आदान-प्रदान किया। एक व्यक्ति ने “हां” या “ना” सोचा। यह सूचना दूसरे व्यक्ति के दिमाग में पहुंचाई गई, जो फिर अपने अनुभव के अनुसार प्रतिक्रिया करता। हालांकि यह एक छोटे स्तर का प्रयोग था, लेकिन यह सिद्ध करता है कि इंसानी दिमाग को तकनीकी माध्यमों से जोड़ना संभव है। इलेक्ट्रोएनसेफेलोग्राफी मस्तिष्क की तरंगों को मापने और समझने की वैज्ञानिक विधि है, जबकि ट्रांसक्रैनियल मैग्नेटिक स्टिमुलेशन (टीएमएस) एक ऐसी तकनीक है जिसके जरिए मस्तिष्क की बाहरी सतह पर चुंबकीय तरंगें भेजकर मस्तिष्क की गतिविधियों को उत्तेजित किया जाता है।
मस्तिष्क व कम्प्यूटर के बीच सीधा संवाद
एलन मस्क की कंपनी न्यूरालिंक ने इस क्षेत्र में बड़ी रुचि दिखाई है। यह कंपनी एक ऐसी माइक्रोचिप बना रही है जो इंसान के मस्तिष्क में लगाई जा सकती है। इसके ज़रिए मस्तिष्क और कम्प्यूटर के बीच सीधा संवाद हो सकेगा। इस तकनीक को ब्रेन-कम्प्यूटर इंटरफेस (बीसीआई) कहा जाता है। मस्क ने दावा किया है कि शीघ्र ही यह तकनीक न केवल लकवाग्रस्त मरीजों की मदद कर सकेगी, बल्कि सामान्य लोगों को भी “सुपरह्यूमन” बना सकती है। वे कहते हैं, “एक उच्च गति के ब्रेन-मशीन इंटरफेस के जरिए हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ सहजीविता स्थापित कर सकते हैं।”
क्या अनुभव भी ट्रांसफर हो सकेंगे..?
इस दिशा में काम कर रहे कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि सिर्फ ‘जानकारी’ ही नहीं, बल्कि अनुभव और भावनाएं भी ट्रांसफर की जा सकती हैं। मेमोरी इम्प्लांट क्षेत्र में कुछ प्रयोगों में वैज्ञानिकों ने चूहों के दिमाग में ऐसी यादें “इम्प्लांट” कीं, जो उन्होंने कभी अनुभव ही नहीं की थीं। उदाहरण के लिए, चूहे को यह अहसास दिलाया गया कि एक विशेष गंध से उसे झटका लगेगा, जबकि असल में ऐसा कुछ नहीं हुआ था। यह तकनीक भविष्य में पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर यानि आघातोत्तर तनाव विकार जैसे मानसिक रोगों के इलाज में उपयोगी हो सकती है, जहां नकारात्मक यादों को हटाया या बदला जा सके।
यदि ऐसा संभव हुआ तो
यदि ब्रेन-टू-ब्रेन ट्रांसफर पूरी तरह से संभव हो जाए, तो यह हमारी शिक्षा, चिकित्सा, मनोविज्ञान, रक्षा और संचार प्रणाली को पूरी तरह बदल सकता है। शिक्षक का अनुभव छात्रों में सीधे ट्रांसफर किया जा सकता है। डॉक्टर सर्जरी की ट्रेनिंग को सीधे दिमाग में अपलोड कर सकते हैं। सैनिक बिना बोले रणनीतियां साझा कर सकते हैं। अपंग व्यक्ति रोबोट को अपने दिमाग से नियंत्रित कर सकेगा। हालांकि वैज्ञानिक इस समस्या पर भी जूझ रहे हैं कि क्या ये तकनीक सुरक्षित है? इस तकनीक के साथ कई नैतिक और सामाजिक चिंताएं भी जुड़ी हैं। निजता के हनन की आशंका रहेगी, क्योंकि कोई भी किसी की अनुमति के बिना उसकी सोच को पढ़ पाएगा। मस्तिष्क में डाली गई जानकारी को बदलने की कोशिश की जा सकती है। और यदि किसी की सोच किसी अन्य इंसान के प्रभाव में आ जाए, तो क्या वह इंसान अभी भी ‘वही’ रह पाएगा जो वो पहले था? ब्रेन हैकिंग, मेमोरी मैनिपुलेशन, और सोच की चोरी जैसे मुद्दे विज्ञान के साथ-साथ नीति-निर्माताओं और समाज के लिए बड़ी चुनौतियां हैं।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
“हमने दो मस्तिष्कों के बीच सीधा संवाद स्थापित किया है। यह ऐसा है जैसे दो दिमाग मिलकर एक की तरह काम कर रहे हों।” – डॉ. मिगुएल निकोलेलिस (न्यूरोसाइंटिस्ट, ड्यूक यूनिवर्सिटी)
“जैसे ही आप सोच को डिकोड कर सकते हैं, आपको उसे सुरक्षित रखने के बारे में भी सोचना चाहिए। मस्तिष्क से जुड़ा डाटा सबसे निजी जानकारी होती है।” – डॉ. राफाएल युस्टे (कोलंबिया यूनिवर्सिटी)
“वह दिन दूर नहीं जब सोच से नियंत्रित कृत्रिम अंग और मस्तिष्क-आधारित सीखना, रोज़मर्रा की हकीकत होंगे।” – डॉ. नितिन शर्मा (पिट्सबर्ग यूनिवर्सिटी)
“हम सिर्फ दिमागी संकेत पढ़ नहीं रहे हैं; हम एक नई संवाद पद्धति बना रहे हैं — दिमाग से दिमाग तक, सीधे।” – डॉ. ऐंड्रू श्वार्ट्ज (प्रोफेसर- न्यूरोबायोलोजी)
पौराणिक दृष्टिकोण — क्या यह विचार नया है?
भारतीय पौराणिक साहित्य और दर्शन में ऐसी कई अवधारणाएं मिलती हैं जो ब्रेन-टू-ब्रेन इंटरफेस या अनुभव ट्रांसफर की कल्पना से मिलती-जुलती हैं: जैसे,
🔹 मन की बात समझना- महाभारत में श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद कई बार मौन, दृष्टि और भावना के माध्यम से होता है। हनुमान जी सीता माता का दुःख मन से जान लेते हैं — यह मानसिक तरंगों के माध्यम से संप्रेषण का सांस्कृतिक संकेत हो सकता है।
🔹 गुरु-शिष्य परम्परा और संस्कारों का स्थानांतरण – गुरु अपने अनुभव और ज्ञान को शिष्य में स्थानांतरित करता है — न केवल शब्दों से, बल्कि ध्यान और अभ्यास के माध्यम से। कुछ ग्रंथों में संकल्प द्वारा ज्ञान देने की बात आती है।
🔹 संजय की दिव्य दृष्टि, रीयल-टाइम न्यूरल लिंक? – संजय कुरुक्षेत्र युद्ध का विवरण धृतराष्ट्र को रीयल टाइम में देते हैं, जैसे आज वीडियो फीड या ब्रेन सिग्नल ट्रांसमिशन होता है।
🔹 वरदान और श्राप के माध्यम से स्मृति या गुणों का ट्रांसफर – कई कथाओं में ऋषि-मुनि स्मृति, शक्ति या चेतना का स्थानांतरण करते हैं, जो अनुभव ट्रांसफर की अवधारणा से मिलता-जुलता है।
इन उदाहरणों से ये तो स्पष्ट है कि आधुनिक विज्ञान जिस दिशा में बढ़ रहा है, उसकी कल्पना भारतीय दर्शन और पुराणों में अमूर्त रूप में पहले ही की जा चुकी थी। हमारे पूर्वज सदियों आगे की सोचने में सक्षम रहे हैं। कुल मिलाकर वर्तमान में यह तकनीक अपने शुरुआती दौर में है। यह सही है कि अभी हम किसी व्यक्ति का सम्पूर्ण अनुभव, भावना या जीवन-ज्ञान दूसरे व्यक्ति में ट्रांसफर नहीं कर सकते, लेकिन दिशा स्पष्ट है। आज जो असंभव लगता है, वह कल सामान्य हो सकता है। ठीक वैसे ही जैसे एक समय मोबाइल फ़ोन असंभव लगते थे, और आज हमारी जेब में कम्प्यूटर है। वैसे ही आने वाले दशक में, हमारी सोच और ज्ञान भी “शेयर” और “डाउनलोड” किया जा सकेगा। यह तकनीक न केवल विज्ञान, बल्कि मानवता की सोच को भी नया आयाम देगी।






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