अब धर्म नहीं, जाति की गिनती होगी
सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि वर्ष 2026 में होने वाली जनगणना में पहली बार सभी जातियों की गिनती की जाएगी। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि देश में नीतियों और राजनीति की दिशा अब केवल धर्म नहीं, बल्कि...

भारतीय राजनीति में बदलाव का संकेत
हाल ही में भारत सरकार द्वारा जातिगत जनगणना कराने की घोषणा ने देश की राजनीति में एक नए मोड़ की शुरुआत कर दी है। अब तक की जनगणनाओं में धर्म, भाषा, लिंग, और क्षेत्र पर ध्यान दिया जाता रहा है, लेकिन जातिगत आंकड़ों को शामिल करने से परहेज किया जाता था। अब यह रुख बदलता दिख रहा है। सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि वर्ष 2026 में होने वाली जनगणना में पहली बार सभी जातियों की गिनती की जाएगी। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि देश में नीतियों और राजनीति की दिशा अब केवल धर्म नहीं, बल्कि जाति के आधार पर भी तय होगी।
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जातिगत जनगणना की मांग वर्षों से की जाती रही है, खासकर सामाजिक न्याय की पैरवी करने वाले दलों और संगठनों द्वारा। उनका तर्क है कि जब तक समाज में किस जाति की कितनी संख्या है, यह स्पष्ट नहीं होगा, तब तक आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं का उचित वितरण नहीं हो सकता। पिछली बार 1931 में जातिगत जनगणना की गई थी, जिसके बाद से यह प्रक्रिया ठप्प पड़ी रही। हालांकि 2011 में सामाजिक-आर्थिक जनगणना के दौरान कुछ आंकड़े एकत्र किए गए थे, लेकिन उन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया। अब जब केंद्र सरकार ने औपचारिक रूप से जातिगत जनगणना कराने का निर्णय किया है, तो यह न केवल एक सांख्यिकीय कवायद है, बल्कि सामाजिक समीकरणों और सियासी रणनीतियों को नया रूप देने वाला कदम भी है।
राजनीतिक दलों ने बताई अपनी- अपनी जीत
जातिगत जनगणना पर सत्तारूढ़ दल और विपक्षी पार्टियों ने इसे अपनी- अपनी जीत बताया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे ‘न्याय यात्रा’ का परिणाम बताया, जबकि भाजपा ने इसे “सभी के लिए न्याय” की दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम करार दिया। गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस प्रक्रिया को 2025 तक पूरा कराने का भरोसा दिलाया है। यह भी उल्लेखनीय है कि बिहार में नीतीश कुमार की सरकार पहले ही जातिगत सर्वेक्षण कर चुकी है और उसके आंकड़े सार्वजनिक हो चुके हैं। इससे कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को केंद्र पर दबाव बनाने का अवसर मिला था। हाल ही में अमेरिका यात्रा पर गए राहुल गांधी ने भी जातिगत जनगणना को सही बताया था। चिराग पासवान ने इसे देशहित में लिया गया एक अहम फैसला बताया, वहीं तेजस्वी यादव ने कहा कि ये उनकी जीत है व सरकार को उनकी बात माननी पड़ी। कांग्रेस नेता उदित राज ने भी इसे कांग्रेस की जीत बताया। वहीं केन्द्रीय मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि जति जनगणना के फैसले से साबित होता है कि सरकार देश व समाज के विकास के लिए प्रतिबद्ध है।
राजनीतिक लाभ के लिए न भुनाए तो ही बेहतर
भारत एक विविधता भरा देश है, जहां जाति, धर्म, भाषा और संस्कृति की अनेक परतें हैं। जातिगत जनगणना से यह उम्मीद की जा रही है कि सरकारी योजनाओं का लाभ बेहतर तरीके से वंचित वर्गों तक पहुंचाया जा सकेगा। हालांकि इसके विरोध में यह तर्क भी दिया जा रहा है कि इससे समाज में जातिवाद को और बढ़ावा मिल सकता है और सामाजिक समरसता को खतरा हो सकता है। यह सही है कि जातिगत पहचान अभी भी हमारे समाज की सच्चाई है और उसे अनदेखा कर नीति नहीं बनाई जा सकती। लेकिन यह भी जरूरी है कि आंकड़े सिर्फ आंकड़े रहें— उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए भुनाया न जाए।
प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता जरूरी
जनगणना आंकड़ों पर देश की योजनाएं, बजट और नीतियां आधारित होती हैं। यदि किसी समूह की जनसंख्या कम आंक ली जाए या उसे उचित प्रतिनिधित्व न मिले, तो उससे जुड़े लोगों को योजनाओं में नुकसान हो सकता है। वहीं, जातिगत आंकड़ों का राजनीतिक इस्तेमाल समाज में ध्रुवीकरण को भी बढ़ावा दे सकता है। इसलिए यह आवश्यक होगा कि सरकार इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ अंजाम दे।
असामानताओं को पहचानने का अवसर
जातिगत जनगणना की शुरुआत भारत के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श में एक निर्णायक मोड़ है। यह न केवल ऐतिहासिक असमानताओं को पहचानने और सुधारने का अवसर है, बल्कि नीति निर्धारण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का भी संकेत है। हालांकि इसके साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि इस प्रक्रिया को केवल चुनावी गणित तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे सामाजिक न्याय, समानता और समरसता की दिशा में एक ठोस कदम के रूप में देखा जाए। आने वाले समय में यह देखा जाना बाकी है कि यह निर्णय किस तरह लागू होता है और इसके क्या सामाजिक व राजनीतिक परिणाम सामने आते हैं। लेकिन इतना तय है कि भारत में अब राजनीति का केंद्रबिंदु ‘धर्म’ से हटकर ‘जाति’ की ओर बढ़ रहा है— और यह बदलाव एक बड़े सामाजिक विमर्श की मांग करता है।






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