मौन में राजनीति
राजनीति में मौन भी कभी-कभी मुखर विरोध बन जाता है, और शायद समरजीत सिंह का यह मौन भी आने वाले समय में बड़ा संदेश दे जाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या पार्टी इस 'मौन' को सुनने को तैयार है या अब उसकी साफ-साफ...

भीनमाल से विधायक डॉ. समरजीत सिंह की राजनीति इन दिनों “मौन और मौजूदगी की अनुपस्थिति” से जानी जाने लगी है। कांग्रेस का बड़ा आयोजन हो, कार्यकर्ताओं का सैलाब हो, और स्थानीय विधायक मंच से गायब हों— यह न केवल सवाल खड़े करता है, बल्कि पार्टी नेतृत्व के प्रति उदासीनता और असंतोष को भी उजागर करता है। जालोर में कांग्रेस भवन के लोकार्पण और कार्यकर्ता सम्मेलन जैसे महत्त्वपूर्ण मौके पर उनकी गैरमौजूदगी ने न सिर्फ कार्यकर्ताओं को निराश किया, बल्कि प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को भी यह कहने पर मजबूर कर दिया कि पार्टी के भीतर ‘स्लीपर सेल’ नहीं चाहिए। डॉ. समरजीत सिंह की यह चुप्पी और दूरी दर्शाती है कि या तो वे पार्टी के हालिया दिशा-निर्देशों से असहमत हैं, या फिर राजनीतिक मंच पर उनकी रुचि अब महज़ नाममात्र की रह गई है। जिन जनप्रतिनिधियों को जनता की आवाज़ बनना था, वे खुद ही मंच की रोशनी से दूर भाग रहे हैं। राजनीति में मौन भी कभी-कभी मुखर विरोध बन जाता है, और शायद समरजीत सिंह का यह मौन भी आने वाले समय में बड़ा संदेश दे जाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या पार्टी इस ‘मौन’ को सुनने को तैयार है या अब उसकी साफ-साफ जवाबदेही लेगी?
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दिलावर का शिक्षा दर्शन
शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने शिक्षा व्यवस्था को एक नया “मूलमंत्र” दिया है– बिना ठहरे सुधार नहीं! अब हर अधिकारी को माह में चार बार ग्राम पंचायतों में ठहरना होगा, जैसे शिक्षा की देवी वहीं डेरा डाले बैठी हों। दिलावर के तेवर देखकर लगता है कि वे शिक्षा मंत्रालय नहीं, कोई युद्ध मोर्चा संभाल रहे हैं। उन्होंने साफ कहा – “बिना फील्ड विजिट नहीं चलेगा काम!” मतलब अब अधिकारी कागज़ों में योजना नहीं बनाएंगे, बल्कि कीचड़ में उतरकर स्कूली हकीकत से साक्षात्कार करेंगे। कहना पड़ेगा, मंत्री जी ने ‘ठहरने’ को इतना महत्त्वपूर्ण बना दिया कि अब शिक्षा से ज़्यादा चर्चा ठहराव की होने लगी है। कुछ अधिकारियों ने तो गांवों में चार दिन ठहरने के लिए होटल बुकिंग की सोची, लेकिन वहां “शौचालय निर्माण योजना” अधूरी निकली! घटिया निर्माण पर कार्रवाई की चेतावनी भी मिली— यानी जो स्कूल की दीवार गिरने से बच गए हैं, अब वे रिपोर्ट की स्याही से ढह सकते हैं। मंत्रीजी का शिक्षा सुधार फार्मूला सीधा है– जहां ठहरोगे, वहीं समझोगे! अब देखना यह है कि शिक्षा सुधरती है या अधिकारी “ठहरने की विवशता” में छुट्टियों का गणित बनाते हैं!
सुधांश पंत की ‘जनता दर्शन’ यात्रा”
मुख्य सचिव सुधांश पंत जब कोटपूतली पहुंचे तो शायद उन्होंने सोचा था कि गार्ड ऑफ ऑनर, बैठकें और कैमरे ही उनके स्वागत को काफी होंगे। मगर जनता ने उन्हें एक अलग ही ‘ऑनर’ दिया– कलक्ट्रेट के गेट पर ताला जड़कर! कहते हैं, अधिकारी का कद बहुत बड़ा होता है, लेकिन गांव वालों ने साबित कर दिया कि ताले की चाबी उस कद से भी बड़ी हो सकती है। पंत जहां निर्देश दे रहे थे, वहीं बाहर जनता गेट बंद कर ‘प्रशासनिक उपवास’ पर बैठ गई। अब पंत साहब को पिछले गेट से निकाला गया– वो भी गुपचुप तरीके से, जैसे कोई फिल्म का सस्पेंस सीन हो। शायद पहली बार हुआ होगा कि एक मुख्य सचिव को “सहमे कदमों से” पीछे के दरवाज़े से बाहर जाना पड़ा हो। अधिकारियों की बैठकें, योजनाओं की समीक्षा, नीतियों का अमल– सब ठीक, लेकिन जब जनता अपनी बात न सुने जाने पर ताले से संवाद करे, तो समझिए कि ‘फील्ड विजिट’ से ज्यादा ज़रूरी है ‘फील्ड रियलिटी’। पंत साहब, अगली बार जब फील्ड पर आएं तो ताले नहीं, दिल खोलने वाले अधिकारी लेकर आइए। वरना जनता गेट बंद करने में देर नहीं करती– और अफसर पीछे से निकल जाते हैं!
खाचरियावास की कुंडली में ईडी योग
राजस्थान की राजनीति में जब भी कोई नेता खुद को राहुल गांधी का सच्चा अनुयायी घोषित करता है, तो लगता है जैसे ईडी के रडार पर अपने आप एक बत्ती जल उठती है। इस बार बारी आई प्रतापसिंह खाचरियावास की। वही तेज़-तर्रार नेता जो जुबान से जलेबी घुमा देते हैं और बयानों में मिर्च झोंकना उन्हें बचपन से आता है। सुबह-सुबह 7 बजे जब जयपुर की गलियों में दूधवाले भी ऊंघ रहे थे, ईडी ने दरवाज़ा खटखटाया– और राजनीतिक हलचल की चाय चढ़ गई। खाचरियावास जी ने तुरंत बयान ठोका, “राहुल गांधी सत्ता में आएंगे तो बीजेपी का क्या होगा?” अब भाई, जनता को तो यह जानना है कि आपके घर में क्या मिला, आप बार-बार राहुल गांधी का सपना 2047 क्यों दिखा रहे हैं? वैसे कांग्रेस की चुप्पी देख लगता है कि पार्टी कह रही है– “खुद बोया है, खुद ही भोगो।” खाचरियावास जी के तेवर देख लगता है जैसे उन्होंने ईडी को चाय पानी भी ऑफर किया होगा– “घबराओ मत, यहां डरने का सामान नहीं मिलता!” पर अब देखना ये है कि जांच क्या बताती है– वाणी वीर थे या वाकई जमीन-जायदाद में भी पराक्रमी निकले?






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