कविता कंठस्थ नहीं, हृदयस्थ करें..
बहुत कम कवि ऐसे होते हैं, जो अच्छा लिखते भी है व उसका पाठ भी अच्छा करते हैं। कविता पढ़ने व सुनते वक्त हमारी ज्ञानेंद्रियां सक्रिय होनी...

– दिनेश सिंदल,
कवि एवं लेखक
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कई बार यह देखा गया है कि बहुत से कवि अच्छी कविताएं लिखते हैं, लेकिन उनका पाठ अच्छा नहीं कर पाते। कुछ कवि पाठ तो अच्छा करते हैं, लेकिन कविता अच्छी नहीं लिख पाते। बहुत कम कवि ऐसे होते हैं, जो अच्छा लिखते भी है व उसका पाठ भी अच्छा करते हैं। कविता पढ़ने व सुनते वक्त हमारी ज्ञानेंद्रियां सक्रिय होनी चाहिए।
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कविता लिखते समय कवि भाव के जिस तल पर विचरण कर रहा होता है, कविता के पाठ के समय भी अगर वह उस तल को छू ले तो वह पाठ ‘श्रेष्ठ’ होगा। कवि श्रोताओं से और श्रोता कवि से जुड़ पाएंगे। श्रोताओं से जुड़ने की पहली शर्त है कवि स्वयं का उस कविता से जुड़ाव। अगर कोई कविता मस्तिष्क से लिखी गई है और कवि उसका होंठो से पाठ कर रहा है तो श्रोता उस कविता से नहीं जुड़ पाएंगे। हृदय से लिखी गई कविता हृदय से ही पढ़ी जाए तो वह श्रोता के हृदय में उतर जाती है। लेकिन विचार का आग्रह कविता को हृदय तक जाने नहीं देता। कुछ कहने की जल्दी की वजह से कवि विषय के भीतर नहीं उतर पाता। वह जीवनानुभव को काव्यानुभव बनाने तक का अवकाश नहीं देता। फिर खिचड़ी पकती नहीं और परोस दी जाती है।
दो बातों पर विचार हो
खिचड़ी को पक जाने देने के लिए दो बातों पर विचार होना चाहिए। एक तकनीकी, यानि विषयगत योग्यता और दूसरा है सामाजिक योग्यता। मंच पर सफलतापूर्वक काव्य- पाठ करने वाले कई कवि तकनीकी अयोग्य हो सकते है, लेकिन उनके पास सामाजिक योग्यता होती है। उन्हें जनभाषा, जनता का भाषाई मुहावरा, उनकी सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक समझ, उनके दैनिक क्रियाकलाप, लोक व्यवहार की समझ होती है।
दूसरी तरफ कोई बड़ा रचनाकार जो तकनीकी योग्य है, वह कविता की परिभाषा कर सकता है। काव्य सिद्धांतों को जानता है। पाश्चात्य और भारतीय काव्य सिद्धांतों पर बड़े- बड़े लेख लिख सकता है, व्याख्यान दे सकता है। कविता की आलोचना पद्धति तैयार कर सकता है, लेकिन वह सामाजिक अयोग्य हो सकता है। उसके विचार बहुत ऊंचे व मानव कल्याण के हो सकते हैं। बहुत प्रबल हो सकते हैं, लेकिन वे इतने प्रबल होते हैं कि कोई श्रोता या पाठक उसकी परवाह नहीं करता। उसके मित्र भी उसके साथ रहने में खुशी महसूस नहीं करते। उन्हें भी लगता है कि जब वह आसपास नहीं होता, तब वे ज्यादा खुश रहते हैं। उसकी उपस्थिति में वे असंयत महसूस करते हैं।
विचार के आग्रह से कमजोर हुआ कला का पक्ष
कविता कला है। कविता में जबसे विचार का आग्रह हुआ है कला का पक्ष कमजोर होता गया है। कोई भी अच्छी चीज गलत लोगों के हाथ में पड़ जाती है तो बात बनती नहीं, बिगड़ी है। विचार के आग्रह ने इसी तरह से कविता को कमतर कर दिया है। कविता में विचार इस तरह से आना चाहिए, जैसे पेड़ की छाया जमीन को बुहारे और धूल का एक कण तक न उड़े।
हमे इस पर विचार करना चाहिए कि कविता के नाम पर कहीं हम अपनी कुंठाएं तो नहीं परोस रहे? एक बार रुक कर हमें जरूर सोचना चाहिए कि हमारे निहार्थ क्या है? कविता, या कविता के बहाने और कुछ? आपकी कविता आप स्वयं को कितना सुख देती है? क्या वह आपको तभी सुख देती है जब कोई उस पर ताली बजाता है, कोई उसे छापता है, कोई उसे पुरस्कृत करता है? अगर आप ये सोचते हैं तो फिर आप उस ‘कोई’ के इशारों पर चलने लगेंगे। कोई और की तृप्ति, आपकी तृप्ति। इस समय आप एक वस्तु हो गए हैं, जिसका ‘कोई और’ उपयोग कर रहा है। अब आप आत्मवान नहीं हैं। आपकी आत्मा पुरस्कार, पद, पैसे के कूड़े करकट के नीचे दबी पड़ी है।
कभी अपने लिए भी ताली बजाओ
आपने कभी अपनी आत्मा के लिए तो गाया ही नहीं। कभी किसी एकांत में अपना गीत स्वयं को तो सुनाया ही नहीं। कभी क्या आपने अपनी कविता पर स्वयं ने ताली बजाई? अपनी कविता पर अपने स्वयं को कोई पुरस्कार दिया? अगर अपनी कविता पर खुश होकर आपने स्वयं अपने लिए ताली बजा दी होती तो भीड़ की तालियों की चाहत नहीं रहती। अपनी ही किसी बात पर रात के एकान्त में जब कोई कविता आपके भीतर उतरी, तब शाबाशी में अपनी ही पीठ थपथपा दी होती तो किसी दूसरे पुरस्कार की चाह नहीं रहती। कविता साध्य है, साधन नहीं। कविता जब कवि के भीतर उतरती है तभी कवि को उसका पुरस्कार मिल चुका होता है।
अध्ययन व पाठ के अंतर को समझना जरूरी
एक शब्द है अध्ययन (study), दूसरा है पाठ। हमें इनके अंतर को भी समझना चाहिए। अध्ययन का संबंधन मस्तिष्क से है। किसी ग्रन्थ का हम अध्ययन करते हैं, उसे समझते हैं या कोई अन्य हमें उसके अर्थ समझाता है। जब हमने उसको समझ लिया, तब उस समझाने वाले की आवश्यकता हमें नहीं रही। अब हम उसकी सहायता के बिना किसी अन्य को उसके अर्थ समझा सकते हैं। लेकिन पाठ का संबंधन हृदय से है। रस से है। उसे बार- बार पढ़ने से जो रसानुभूति होती है, वह पाठक का अपना आनंद है। उसे वह किसी दूसरे के साथ बांट नहीं सकता। उसका अनुभव किसी दूसरे को नहीं करा सकता। कोई अन्य भी उस रचना का पाठ करके रस ले सकता है, लेकिन ये उसका अपना रस है।
कविता और विज्ञान में फर्क
कविता और विज्ञान में फर्क है। विज्ञान में तत्वों की चर्चा होती है, कविता में अनुभूतियों की। अनुभूतियां हाथों में पकड़ी नहीं जा सकती, तराजू में तोली नहीं जा सकती। जब तक आपको अनुभव न हो, तब तक बात हवा में ही रहेगी। स्वाद मिले तो ही बात बने और स्वाद केवल बुद्धि की बात नहीं है। वह तो हृदय से ही मिलता है। अनुभव ऐसा जहां अनुभवकर्ता खो जाता हो। गीत सुनते- सुनते वह स्वयं गीत ही बन जाए। गीत को एक दुश्मन की तरह नहीं, एक प्रेमी की तरह समझाना होता है तो ही रहस्य खुलता है। उसे कंठस्थ नहीं, हृदयस्थ करना पड़ता है। कंठ तो शरीर का हिस्सा है। गीत हृदय में जन्म लेता है।
गीत का जब भी कभी अंतरण होगा
तब बगावत कर रहा सा व्याकरण होगा
स्वर्ण – मृग की लालसा मन में रही तो
दोस्तों तय बात है सीता हरण होगा






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