जोधपुर स्थापना दिवस विशेष – जायकों की जमीन जोधपुर
मारवाड़ की भूमि पर जब सूरज की तपिश रेत से टकराती है, तो वहां के लोग भोजन में छांव ढूंढ लेते हैं— स्वाद की, सादगी की और संस्कारों की। भोजन यहां पेट भरने का मात्र माध्यम नहीं, यह एक सांस्कृतिक आयोजन...

थाली में तहज़ीब: मारवाड़ का स्वाद, सदियों की साधना
मधु मेहता,
लेखिका
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जोधपुर सिर्फ सूर्यनगरी नहीं, स्वादनगरी भी है — जहां मसालों की भाप में इतिहास पकता है और हर रसोई एक प्रयोगशाला होती है। यह वह धरती है जहां स्वाद केवल जीभ का सुख नहीं, एक सांस्कृतिक संवाद है। इस स्थापना दिवस पर आइए, जोधपुर की थाली में परोसे उन चटपटे, तीखे और नवाचार से लबरेज़ व्यंजनों की कहानी सुनें, जो स्वाद और इतिहास दोनों को सहेजते हैं।
मारवाड़ की भूमि पर जब सूरज की तपिश रेत से टकराती है, तो वहां के लोग भोजन में छांव ढूंढ लेते हैं— स्वाद की, सादगी की और संस्कारों की। भोजन यहां पेट भरने का मात्र माध्यम नहीं, यह एक सांस्कृतिक आयोजन होता है, जिसमें हर निवाला केवल शरीर को नहीं, आत्मा को भी तृप्त करता है।
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मारवाड़ के भोजन की परम्परा केवल स्वाद तक सीमित नहीं है; यह उस संतुलन की खोज है, जिसमें ऋतुओं के स्वभाव, शरीर की प्रकृति और धर्मशास्त्रों की मर्यादा सबका ध्यान रखा गया है। लगभग 108 वर्ष पूर्व ‘मारवाड़ व ओसवाल’ पत्रिका में प्रकाशित एक ऐतिहासिक आलेख में यह स्पष्ट झलकता है कि मारवाड़ी आहार-परम्परा शुद्ध वैदिक चिंतन और आयुर्वेदिक संतुलन की देन है। इस आलेख में उल्लेख मिलता है कि कैसे अलग-अलग ऋतुओं में विशेष प्रकार का भोजन करने की परम्परा रही है। जैसे गर्मी में शरीर को ठंडक देने वाले हल्के मिष्ठान्न — कलाकंद और कीटी (फीका मावा)— को प्राथमिकता दी जाती थी। बरसात के मौसम में खजूर और मालपुए जैसे पोषक और रुचिकर व्यंजन बनाए जाते, वहीं शरद ऋतु में कचोरी जैसी गरिष्ठ चीजें खाई जातीं। सर्दियों की ठिठुरन में जलेबी और शीरा जैसे ऊर्जावान व्यंजन शरीर को ऊष्णता प्रदान करते थे।
मारवाड़ी रसोई की शाकाहारी कारीगरी
मारवाड़ी रसोई की शाकाहारी कारीगरी में भी गज़ब की विविधता और गहराई है। ‘चक्की’ नामक एक अद्वितीय व्यंजन, जो गेहूं के आटे से तैयार होता है, अपने स्वाद में इतना समृद्ध होता है कि मांसाहारी व्यंजन भी उसके आगे फीके लगते हैं। यह शुद्ध शाकाहारी भोजन होते हुए भी उसकी बनावट, बनावट का ढंग और स्वाद ऐसा कि स्वीडन के एक खाद्य विशेषज्ञ ने भी इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। इसके साथ बनने वाला ‘सलेवाड़ा’ नामक व्यंजन, स्वाद और पौष्टिकता में किसी भी आधुनिक बिस्कुट या स्नैक को पीछे छोड़ देता है।
मारवाड़ के भोजन में केवल व्यंजन ही नहीं, भोजन करने का अनुशासन भी विशिष्ट होता है। भोजन के क्रम को भी विशिष्ट और वैदिक परम्परा के अनुरूप रखा जाता है— पहले मीठा, फिर रोटी और सब्ज़ी, उसके बाद खिचड़ी और नमकीन, फिर कांजी और चटनी, और अंत में पापड़। यह क्रम केवल स्वाद की दृष्टि से नहीं, बल्कि पाचन-तंत्र की गति और शरीर की आवश्यकता के अनुरूप रचा गया है। यह बताता है कि भोजन का हर चरण, एक संतुलित प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें स्वाद, स्वास्थ्य और संतुलन तीनों साथ चलते हैं।
मिर्च का प्रयोग घी के साथ
मारवाड़ी भोजन को लेकर प्रचलित एक आम भ्रांति है कि यह अधिक तीखा और मसालेदार होता है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। आलेख बताता है कि मारवाड़ी लोग मिर्च का प्रयोग घी के साथ करते हैं, जिससे उसका तीखापन संतुलित हो जाता है और वह पाचक, कृमिनाशक और रुचिकर बन जाती है। मसालों का प्रयोग यहां केवल स्वाद बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि उनके औषधीय गुणों के कारण किया जाता है। हल्दी, धनिया, मिर्च — ये सभी तत्व पित्तनाशक और रोगनिवारक होते हैं। जहां विश्व के अन्य हिस्सों में मसाले केवल स्वाद का माध्यम होते हैं, वहीं मारवाड़ में ये शरीर के संतुलन का हिस्सा हैं।
भोजन की परम्परा में शुद्धता और गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यहां भोजन पत्तल या थाली में नहीं फेंका जाता, बल्कि क्रमबद्ध, स्नेह और सम्मान से परोसा जाता है। भोजन करने वाला व्यक्ति पाटे पर बैठता है, और हर व्यंजन को उचित क्रम और मर्यादा में परोसा जाता है। ऐसा नहीं होता कि मिठाई और नमकीन, कचोरी और पापड़ एक साथ रख दिए जाएं, जिससे भोजनकर्ता भ्रमित हो जाए। यहां की थाली में संगीत का एक राग बसता है — मिठाई उसका आलाप है, रोटी उसका स्थायी, खिचड़ी और कांजी उसकी अंतरा, और पापड़ उसका मृदंग।
जोधपुर स्थापना दिवस के अवसर पर यह स्मरण आवश्यक है कि मारवाड़ की थाली मात्र रोटियों और सब्ज़ियों का संकलन नहीं है, यह एक जीवंत संस्कृति का दर्पण है। यह स्वाद से सजी साधना है, जिसमें पीढ़ियों ने केवल स्वाद नहीं बांटा, बल्कि संस्कार भी बांटे हैं। यह परम्परा पीढ़ियों को जोड़ती है, और हर निवाले के साथ यह सिखाती है — “जहां भोजन भी संयम से हो, वहीं संस्कृति सांस लेती है।”
चक्की की सब्ज़ी:
जब महाराजा उम्मेद सिंह के दरबार में भोज की घण्टी बजी, तब रसोइयों के सामने एक चुनौती थी— मांस के बिना भी दावत में धूम मचानी थी। और वहीं जन्म हुआ चक्की की सब्ज़ी का। गेहूं के आटे को मसलकर, उबालकर और मसालों में पकाकर एक ऐसी डिश बनाई गई जो शाकाहार का शाही उत्तर बन गई। यह कोई साधारण सब्ज़ी नहीं, बल्कि शाकाहारी नवाचार की तलवार थी— बिना खून बहाए स्वाद की जंग जीतने वाली। चांदी की छड़ पर लिपटी चक्की, तीखी तरी में नहाकर जब थालियों में उतरी, तो इतिहास ने लिखा— यह जोधपुर है, यहां भोजन भी आत्मा से रचा जाता है।
गुलाब जामुन की सब्ज़ी:
रसोई की गलतियों में कभी-कभी चमत्कार भी छिपे होते हैं। गुलाब जामुन की सब्ज़ी इसका जीता-जागता उदाहरण है। एक दिन जब मिठाई मसालों में गिर पड़ी, तो लगा सब बर्बाद हो गया… लेकिन जोधपुरी रसोइयों ने उसमें संभावना देखी— और जन्म हुआ इस अद्भुत डिश का। यह कोई मज़ाक नहीं, बल्कि राजस्थान की रसोई की रचनात्मकता का प्रतीक है, जहां मिठाई भी मसालेदार बन जाती है। आज गुलाब जामुन की सब्ज़ी हर उत्सव में यह कहती है— “जोधपुर वो जगह है, जहां परम्परा में प्रयोग की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।”
जोधपुरी कबुली:
अगर स्वाद को विरासत मानें, तो जोधपुरी कबुली उसकी सुनहरी मुहर है। मुगल प्रभाव, अफगानी खुशबू और मारवाड़ की आत्मा जब बासमती चावल में समाती है, तो पैदा होती है एक दास्तान— मिठास, गरम मसालों और सूखे मेवों की गाथा। यह केवल पुलाव नहीं, बल्कि दो संस्कृतियों का स्नेहिल आलिंगन है— जहां हर चम्मच में रेगिस्तान की तपन और इतिहास की ठंडक मिलती है। यह धीमी आंच पर पका हुआ संवाद है— एक सूफियाना सुर, जिसमें जोधपुर का दिल धड़कता है।
मिर्ची बड़ा:
मिर्ची बड़े को अगर महज़ नाश्ता समझा जाए, तो जैसे सूर्यनगरी को रेत का शहर कह दिया जाए। यह एक चटपटा तख़्तनशीन है जो सड़क किनारे ठेले से लेकर राजसी भोज तक सब पर राज करता है। किसी गृहिणी की रसोई से निकली यह क्रांति, जो आज हर चाय के प्याले के संग अमर हो चुकी है। मिर्च, आलू, बेसन और तेज़ कड़ाही— इन चार शब्दों में जोधपुरी आत्मा की परतें सजी हैं। यह व्यंजन इतिहास में आमजन के स्वाद की स्वतंत्रता की घोषणा था।
प्याज की कचौरी:
अगर जोधपुर की सुबह को स्वाद का चेहरा देना हो, तो वह निस्संदेह प्याज कचौरी होगी— खस्ता परतों में लिपटी तीखी कविता। यह सिर्फ एक नाश्ता नहीं, बल्कि धूप की पहली किरण पर सवार एक लोकगीत है। सूखे, खारे रेगिस्तान में जहां भंडारण और टिकाऊपन ज़रूरी था, वहीं कचौरी ने आकार लिया— प्याज, आलू और मसालों की संगति से बना यह व्यंजन स्वाद के साथ बुद्धिमत्ता का भी प्रतीक बना। हर परत में इतिहास है, हर बाइट में संस्कृति— और यही तो जोधपुर है, जहां खाना भी किस्सा बन जाता है। जोधपुर के ये व्यंजन सिर्फ स्वाद नहीं, लोकस्मृति के दस्तावेज़ हैं। हर एक डिश, इतिहास की किसी गलती, चुनौती या जिज्ञासा से जन्मी— और आज हमारी थाली में आदर के साथ बैठी है। इस स्थापना दिवस पर जब आप इन व्यंजनों का आनंद लें, तो याद रखिए — आप सिर्फ कुछ खा नहीं रहे, बल्कि जोधपुर की स्वाद-परम्परा का हिस्सा बन रहे हैं।






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