जब पहली बार जोधपुर आए नेताजी सुभाषचन्द्र बोस
23 जनवरी 1938 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस पहली बार जोधपुर आए और गिरदीकोट मैदान में विशाल जनसभा को संबोधित किया। यह प्रसंग मख्तूमल सिंघवी के संस्मरण से प्रेरित है, जिसमें उन्होंने अपने अनुभव साझा किए...

स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पहली बार 23 जनवरी 1938 को जोधपुर आए। यह जानकारी मख्तूमल सिंघवी जी के संस्मरण में पढ़ने को मिलती है। तब वे मात्र 17 वर्ष के थे— किशोर उम्र, लेकिन आज़ादी का जज़्बा दिल में गहराई तक बसा हुआ था।
बोस जी के जोधपुर आने की खबर ने पूरे शहर में हलचल मचा दी। जैसे रेगिस्तान में अचानक बहार आ गई हो। गिरदीकोट का मैदान जनसैलाब से भर गया।
लोग अपने प्रिय नेता की एक झलक पाने को बेताब थे। और जब बोस मंच पर आए, तो ऐसा लगा जैसे लावा फूट पड़ा हो — जोश, उत्साह और दृढ़ संकल्प का।
मंच से उनकी आवाज़ गूंजी— “आज़ादी बिना बलिदान नहीं मिलती!” हर शब्द लोगों के दिल में उतरता गया। मख्तूमल सिंघवी जी लिखते हैं, “उस दिन मैंने पहली बार जोधपुरवासियों की आंखों में आज़ादी के लिए चमक देखी।” वह भाषण सिर्फ़ शब्द नहीं थे— वह आग थी, जो लोगों के मन में लगी रही।
सभा के अंत में खादी उद्योग मंदिर द्वारा तैयार खादी का एक थान नीलाम हुआ। नेताजी ने खुद उसकी बोली शुरू करवाई।
सिंघवी जी के पिता श्री माधोमल साहब ने 501 रुपये की बोली लगाई। नेताजी ने उन्हें अपने हाथों से थान भेंट किया। वह क्षण सिंघवी परिवार के लिए नहीं, पूरे जोधपुर के लिए गर्व का बन गया।
नेताजी का यह पहला जोधपुर प्रवास केवल एक यात्रा नहीं थी। यह एक विचार था — जो जनमानस में पैठ गया। उस दिन से जोधपुर की हवाओं में भी आज़ादी की सुगंध घुल गई।






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