
कल्पना कीजिए, जोधपुर की एक ऐतिहासिक सांझ— 15 जनवरी 1917।
सूर्य ढलने को था, पर उस दिन जोधपुर की किस्मत के क्षितिज पर एक नई रौशनी उगने जा रही थी। महाराजा सर उम्मेद सिंह जी की दूरदृष्टि और आधुनिक सोच ने वह कर दिखाया, जो उस समय केवल बड़े शहरों में संभव था। रेलवे स्टेशन के पास जोधपुर का पहला बिजलीघर स्थापित किया गया— एक ऐसी पहल जिसने अंधेरे से जूझते मरुस्थल को उजाले की राह दिखाई।
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यह महज कोई तकनीकी प्रोजेक्ट नहीं था, बल्कि आधुनिक जोधपुर की नींव रखने वाली एक ऐतिहासिक घटना थी। उस शाम पहली बार शहर की रात ने अंधकार की चादर उतारी और बिजली के उजाले की ओढ़नी ओढ़ी। दो विशाल डीज़ल इंजन, जिनकी धड़कनें दूर तक सुनाई देती थीं, बारी-बारी से चलते और शहर को रौशन करते।
कहते हैं कि जब दोनों इंजन सक्रिय होते, तो उनकी शक्ति से छह मील दूर तक उजाला फैल जाता था।बिजलीघर के इस चमत्कारिक प्रभाव ने केवल दीवारों और गलियों को ही नहीं, बल्कि सोच और व्यवस्था को भी जगाया।
सरकारी आइस फैक्ट्री, रेलवे वर्कशॉप, फ्लोर मिल्स और जनता की 13 चक्की मिलें अब बिजली से चलने लगीं। यही नहीं, उस समय टेलीफोन सेवा का संचालन भी यहीं से सम्भाला जाने लगा। जोधपुर का यह बिजलीघर अब केवल एक भवन नहीं, बल्कि आधुनिकता का प्रवेशद्वार बन चुका था। उस युग में इस परियोजना पर लगभग तीन से चार लाख रुपये खर्च हुए— जो आज के हिसाब से करोड़ों में गिने जाएंगे। लेकिन यह रकम एक दूरदर्शी निवेश साबित हुई, जिसने जोधपुर को राजस्थान के आधुनिक शहरों की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया।
यह पहल उम्मेद सिंह जी के राज में हुए उन कई नवाचारों में से एक थी, जो बताते हैं कि मरुस्थल की यह धरती न केवल इतिहास और परंपरा में समृद्ध है, बल्कि जब समय आता है तो वह भविष्य की दिशा भी तय कर सकती है।






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