करीब दो सौ साल पहले जोधपुर में एक ब्रिटिश आया—नाम था कर्नल जेम्स टॉड। पर वो आम अंग्रेज नहीं था, जो सिर्फ हुकूमत के लिए आया हो। वो आया था इतिहास की पदचाप सुनने, वीरता की कहानियां पढ़ने, और रेत में दबी संस्कृति को जीवित करने।
जब पहली बार जोधपुर आए नेताजी सुभाषचन्द्र बोस – राजस्थान टुडे
1819 में जब वह जोधपुर पहुंचा, तब शहर में इतिहास मौन था, पर टॉड के लिए हर पत्थर, हर शिलालेख एक जीवित कथावाचक था। उसने मुद्राओं और अभिलेखों का संग्रह किया, पुरानी हवेलियों और मंदिरों की छायाओं में इतिहास के धागे बुनने शुरू किए। जोधपुर के महाराजा ने भी इस आगंतुक की लगन को समझा और उसे दुर्लभ ग्रंथ और ज्ञान के द्वार सौंप दिए। ये वही सूत्र बने, जिनसे टॉड ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “Annals and Antiquities of Rajasthan” का ताना-बाना बुना। टॉड ने न केवल जोधपुर, बल्कि सम्पूर्ण राजस्थान के इतिहास को एक वैज्ञानिक, क्रमबद्ध और संवेदनशील दृष्टि से दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। वह पहला इतिहासकार था जिसने राजपूताना की वीरता, परंपरा और संस्कृति को पश्चिम की आंखों से नहीं, आत्मीय दृष्टि से देखा।
उनका संजोया इतिहास आज भी गौरवगाथा का आधार
कर्नल जेम्स टॉड का जन्म 1782 में इंग्लैंड में हुआ। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में सेवा की और 1818 में मेवाड़ और हाड़ौती के रेजिडेंट नियुक्त होकर उदयपुर पहुंचे। राजस्थान के विभिन्न राज्यों का भ्रमण कर उन्होंने ऐतिहासिक सामग्री एकत्र की और उसे 1822 में इंग्लैंड ले गए। उनकी मुख्य कृति “Annals and Antiquities of Rajasthan” है, जिसका पहला भाग 1829 में प्रकाशित हुआ। उनका निधन 17 नवम्बर 1835 को हुआ, पर उनके द्वारा संजोया गया इतिहास आज भी राजस्थान की गौरवगाथा का आधार है। (काल्पनिक चित्र)







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