लक्ष्मीमल्ल सिंघवी: जोधपुर के लाल अनेक देशों के संविधान निर्माता
कहें तो, लक्ष्मी मल्ल सिंघवी एक ऐसे वृक्ष थे, जो जोधपुर की सरदार स्कूल की कक्षाओं से उगे, और जिनकी शाखाएँ भारत से लेकर नेपाल, बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीका, फिजी, मॉरीशस और नामीबिया तक संविधान, संस्कृति...

जोधपुर की गर्म हवाओं और सांस्कृतिक रंगों से पले-बढ़े लक्ष्मीमल्ल सिंघवी कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। वे एक साथ कई रूपों में जिए— कवि, लेखक, वकील, राजदूत और संविधान निर्माता। जैसे मरुधरा में कभी-कभी कोई बूंद नहीं, पूरी बारिश गिरती है— वैसे ही सिंघवी जी में ज्ञान, संवेदनशीलता और सेवा की पूरी बारिश समाई थी।
उनका जीवन एक गहरी जड़ वाला वटवृक्ष था, जिसकी जड़ें जोधपुर की धरती से जुड़ी थीं। यहीं के सरदार स्कूल की कक्षाओं में बैठकर उन्होंने ज्ञान के पहले बीज बोए। वही स्कूल जहां धूप में भी शिक्षा की ठंडी छांव मिलती थी, और जहां से निकलकर सिंघवी जी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को दिशा देने की राह पकड़ी।
1950 के दशक में जब भारत आज़ादी के बाद नए संविधान के सहारे खुद को परिभाषित कर रहा था, उसी दौर में सिंघवी जी अपनी शिक्षा को कैम्ब्रिज और हार्वर्ड जैसे विश्वविख्यात संस्थानों में विस्तार देने निकल पड़े। लेकिन विदेश जाकर भी वे भारतीयता से कभी नहीं कटे— बल्कि उन्होंने उसे और ऊंचा उठाया।
वे सिर्फ भारत के संविधान में प्रखर योगदान देने वाले नहीं थे, बल्कि उन्होंने नेपाल, बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीका, फिजी, मॉरीशस और नामीबिया जैसे देशों को भी उनके संविधान के निर्माण में दिशा दी। उनके सुझावों ने इन देशों को न्याय, समानता और मानवाधिकारों की नींव पर खड़ा होने में मदद दी। सिंघवी जी कानून के केवल ज्ञाता नहीं थे, बल्कि उसे आम लोगों की भाषा में समझाने वाले शिक्षक थे। वे मानते थे कि कानून किताबों में नहीं, जिंदगी में होना चाहिए।
उनका जीवन एक पुल की तरह था— जो कानून और कविता, भारत और विदेश, परम्परा और आधुनिकता के बीच जुड़ाव बनाता था। जब वे इंग्लैंड में भारत के उच्चायुक्त बने (1991-97), तो वहां सिर्फ कूटनीति नहीं की, बल्कि हिन्दी और भारतीय संस्कृति का दीप भी जलाया। उनके प्रयासों से ‘प्रवासी भारतीय दिवस’ जैसी ऐतिहासिक पहल जन्मी।
सिंघवी जी की किताबें— जैसे ‘संध्या का सूरज’ और ‘पुनश्च’—सिर्फ पन्ने नहीं, उनके अनुभव और भावना की झलक हैं। ‘भारत हमारा समय’ और ‘जैन मंदिर’ जैसी रचनाओं में उन्होंने देश, धर्म और दर्शन की बातें सहज भाषा में कही हैं।
उन्हें 1998 में ‘पद्म भूषण’ से नवाज़ा गया, लेकिन उनका असली सम्मान तो वह ज्ञान था, जो उन्होंने देश-विदेश के विद्यार्थियों, विधिवेत्ताओं और प्रवासी भारतीयों में बांटा। भारत के लोकपाल और लोकायुक्त संस्थाओं की कल्पना में भी उनका मस्तिष्क काम कर रहा था।






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