कंधों का युद्ध और बंदूक की भाषा
मेहरानगढ़ की तोड़ेदार बंदूक सहयोग और सहारे से लड़े गए युद्धों की प्रतीक है। "दूसरे के कंधे पर बंदूक चलाना" कहावत की जड़ें शायद इसी ऐतिहासिक हकीकत में छिपी...

जोधपुर के मेहरानगढ़ क़िले की ऊंचाइयों पर आज भी इतिहास सांसें लेता है। उन पत्थरों के बीच, एक भारी तोड़ेदार बंदूक रखी है — शांत, लेकिन गवाही देती हुई बीते युग के तूफ़ानों की। यह कोई साधारण हथियार नहीं, बल्कि ऐसा औज़ार था, जिसे चलाने के लिए एक नहीं, दो कंधों की दरकार होती थी। एक योद्धा बंदूक थामता, दूसरा उसे अपने कंधे पर टिकाकर लक्ष्य साधने में मदद करता।
कहते हैं — “दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर चलाना” — आज यह कहावत किसी परायी ज़िम्मेदारी को अपने हित में मोड़ने के लिए कही जाती है, पर इस ऐतिहासिक बंदूक की कहानी कुछ और बयां करती है। यह तो साझे संघर्ष की मिसाल थी। यह बताती है कि युद्ध सिर्फ तलवार से नहीं, सहयोग से भी जीता जाता है।
इस तोड़ेदार बंदूक का हर दाग़ मानो दीवारों को नहीं, आत्मबल और विश्वास को भेदता था। यह हथियार नहीं, रिश्तों की आग़ोश में जंग का पाठ था — जहां बिना सहारे कोई लक्ष्य भेदा ही नहीं जा सकता।
आज भले ही बंदूकें बदल गई हों, कहावतों का मतलब भी बदल गया हो, मगर मेहरानगढ़ की इस तोड़ेदार बंदूक में आज भी वह पुरानी गूंज छिपी है — कि कभी-कभी, जीत के लिए किसी और के कंधे पर टिकना भी उतना ही वीरता भरा होता है, जितना खुद गोली चलाना।






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