जब जोधपुरी कढ़ी ने इतिहास को स्वाद चखा दिया
पंडित जवाहरलाल नेहरू पहली बार जोधपुर आए थे। उनके साथ थीं युवा इंदिरा गांधी। और इंतज़ार कर रहा था उम्मेद भवन पैलेस—राजसी आतिथ्य, शाही परंपरा और जोधपुरी व्यंजनों की पराकाष्ठा के...

लेकिन उस रात, सब स्वादों को पीछे छोड़, एक व्यंजन ने पंडित नेहरू को मोह लिया—जोधपुरी कढ़ी।
वह कोई साधारण कढ़ी नहीं थी; वह पीली नहीं, मानो क्रांति के रंग में रंगी हो। बेसन और दही से बनी, लेकिन उसमें घुला था मारवाड़ी अपनापन, और पके थे आत्मीयता के अदृश्य मसाले। हर चम्मच में उन्हें जैसे भारत की मिट्टी की सोंधी महक मिल रही थी।
नेहरू ने मुस्कुराकर बार-बार परोसी जा रही कढ़ी को स्वीकारा, और कहा भी कि “इस स्वाद में कुछ है, जो आत्मा तक उतरता है।” इंदिरा गांधी उन्हें देखकर मुस्काईं, जैसे सोच रही हों—इतिहास कभी-कभी कढ़ी की कटोरी में भी पकता है।
भोजन से पहले, पंडित नेहरू खुले वाहन में शहर भ्रमण पर निकले। रेलवे स्टेशन से लेकर रणछोड़ मंदिर, सोजती गेट, कटला बाजार, खांडा फलसा होते हुए जालोरी गेट तक, पूरा शहर जैसे एक उत्सव में बदल गया था। फूलों की वर्षा, जयघोष और आमजन का उमड़ा सागर—मानो जोधपुर, अपने भविष्य को हाथों से छू रहा हो।
उस रात उम्मेद भवन के राजसी कक्ष में परोसी गई वो थाली इतिहास बन गई। उसमें केवल व्यंजन नहीं थे, उसमें एक शहर का आत्माभाव, उसका गौरव और उसका प्रेम परोसा गया था।
और जोधपुरी कढ़ी?
वह तो जैसे एक ‘गुप्त दूत’ बन गई—जो स्वाद की जुबान में पंडित नेहरू के हृदय में उतर गई, और जोधपुर की आत्मा को आज़ाद भारत की स्मृति में सदा के लिए बसा गई।






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