एक भारत, एक स्वर: आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक संदेश
भारत सरकार ने आठ बहुपक्षीय संसदीय प्रतिनिधिमंडलों का गठन किया है, जो अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राष्ट्र जैसे देशों में भारत की आतंकवाद-विरोधी नीति और ऑपरेशन...

राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की इस कायराना हरकत के बाद भारत ने निर्णायक सैन्य कार्रवाई करते हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत नियंत्रण रेखा पार कर नौ आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। यह भारत की “शून्य सहिष्णुता” की नीति का स्पष्ट संकेत था। लेकिन इस बार भारत ने सिर्फ सैन्य मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीतिक मंचों पर भी उतनी ही मजबूती से मोर्चा संभाला। भारत सरकार ने आठ बहुपक्षीय संसदीय प्रतिनिधिमंडलों का गठन किया है, जो अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त राष्ट्र जैसे देशों में भारत की आतंकवाद-विरोधी नीति और ऑपरेशन सिंदूर की नैतिकता को प्रस्तुत करेंगे।
बहुपक्षीय प्रतिनिधिमंडल विदेश भेजेगा भारत
इन प्रतिनिधिमंडलों में विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल किए गए हैं। यह इस बात का संकेत है कि भारत की लोकतांत्रिक राजनीति, मतभेदों के बावजूद, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर एकजुट हो सकती है। रविशंकर प्रसाद (भाजपा) अमेरिका में, शशि थरूर (कांग्रेस) ब्रिटेन और यूरोपीय संघ से, सुप्रिया सुले (एनसीपी) फ्रांस में, कनिमोझी (डीएमके) जापान में, जबकि बैजयंत जय पांडा और सस्मित पात्रा संयुक्त राष्ट्र और रूस में भारत का पक्ष रखेंगे।
आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक माहौल बनाने की तैयारी
यह रणनीति दर्शाती है कि भारत अब केवल सैन्य ताकत से ही नहीं, बल्कि तथ्यों, संवाद और जनमत के माध्यम से भी आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक माहौल तैयार करना चाहता है। आज की वैश्विक राजनीति में सिर्फ हथियार नहीं, विचार, नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी उतने ही जरूरी हैं। यह पहल भारत को एक ज़िम्मेदार, परिपक्व और आत्मनिर्भर लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करती है। इस कूटनीतिक प्रयास का एक और अहम पहलू है प्रवासी भारतीयों से संवाद। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बसे करोड़ों भारतीय स्थानीय मीडिया, थिंक टैंकों और राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इनसे सक्रिय जुड़ाव भारत की स्थिति को और सशक्त बना सकता है।
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कुल मिलाकर, भारत की यह दोहरी रणनीति —सीमा पर सर्जिकल स्ट्राइक और विदेशों में संसदीय संवाद— एक नए युग की शुरुआत है। यह बताता है कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि नीति, नैतिकता और नेतृत्व के साथ आगे बढ़ता है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ अब सिर्फ सैन्य अभियान नहीं, बल्कि भारत की समग्र आतंकवाद-विरोधी नीति का प्रतीक बन चुका है।






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