भारत रत्न लाल कृष्ण आडवाणी की जोधपुर गाथा
जोधपुर लाल कृष्ण आडवाणी के लिए महज एक ठिकाना नहीं, बल्कि वह ‘तपश्चरण भूमि’ बना जहाँ उन्होंने राष्ट्र के प्रति समर्पण का बीज बोया और जीवन को राजनीति, समाज और संस्कृति की त्रिवेणी में प्रवाहित...

वाक्या 1947 का है। जब कराची जल रहा था, तब एक युवा शिक्षक लालकृष्ण आडवाणी ने अपने जीवन की किताब का एक अध्याय वहीं बंद कर दिया और नया अध्याय खोलने भारत की भूमि पर कदम रखा। उनके लिए यह विस्थापन केवल स्थान का नहीं, बल्कि पहचान, सोच और भविष्य की दिशा बदलने वाला अनुभव था। और इस नए अध्याय का पहला पृष्ठ लिखा गया मरुप्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी जोधपुर में।
यह शहर उनके लिए महज एक ठिकाना नहीं, बल्कि वह ‘तपश्चरण भूमि’ बन गया जहाँ उन्होंने अपने विचारों की धार को संजोया, राष्ट्र के प्रति समर्पण का बीज बोया और जीवन को राजनीति, समाज और संस्कृति की त्रिवेणी में प्रवाहित किया। यहीं उनका पुनर्मिलन हुआ कराची के सहकर्मी, संस्कृत मर्मज्ञ और राष्ट्रभक्त पंडित श्रीराम दवे से। दोनों ने कभी कराची में शिक्षा दी थी—एक ने अंग्रेज़ी में, एक ने संस्कृत में—और अब भारत की नई मिट्टी में राष्ट्र निर्माण के यज्ञ में आहुति दे रहे थे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाएं उनके वैचारिक साधना स्थल बने, जहाँ दोनों शिक्षक गुरु से स्वयंसेवक और फिर राष्ट्रधर्मी बने। यह जोधपुर ही था जहाँ आडवाणी ने न केवल खुद को फिर से खड़ा किया, बल्कि राष्ट्रहित के लिए जीवन समर्पित करने की ठान ली। भरतपुर, कोटा, बूंदी होते हुए वे राष्ट्रीय राजनीति के उस शिखर तक पहुंचे, जहाँ से देश की दिशा निर्धारित होती है।
और फिर, जब दशकों बाद—सितंबर 2005 में—आडवाणी जोधपुर लौटे, तो यह केवल एक यात्रा नहीं थी; यह ‘विरासत के संग पुनः मिलन’ जैसा था। उन्होंने पंडित दवे की संस्कृत काव्य कृति ‘ब्रह्म रसायन’ का लोकार्पण किया—जैसे अपने शिक्षक को एक भावभीनी श्रद्धांजलि दी हो। पंडित दवे की दोहिती, साध्वी प्रीति प्रियवंदा आज भी उन्हें ‘नानाजी’ कहती हैं—जो रिश्ता केवल खून का नहीं, आत्मा का है।
2024 में जब भारत सरकार ने लालकृष्ण आडवाणी को ‘भारत रत्न’ से अलंकृत करने की घोषणा की, तो यह सम्मान न केवल उनके राजनीतिक योगदान का, बल्कि उन मूल्यों और संघर्षों का भी था, जिनकी जड़ें जोधपुर की उसी लाल मिट्टी में पनपी थीं।
जोधपुर—जहाँ आडवाणी ने विस्थापन को अवसर में बदला, जहाँ एक शिक्षक से भारत के उपप्रधानमंत्री तक का बीज अंकुरित हुआ—वह शहर अब स्वयं गौरव से भर उठा है। यह शहर उनकी यात्रा का प्रथम सोपान था, और भारत रत्न की उपाधि उसकी परिणति। इस प्रकार, जोधपुर न केवल एक भूगोल है, बल्कि वह अध्यात्मिक स्थल है जहाँ एक विस्थापित युवक से लेकर राष्ट्र रत्न बनने की कथा लिखी गई।






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