श्रीमती बोहरा की आत्मकथा “मैं न थकी, न हारी” का लोकार्पण
उनकी आत्मकथा “मैं न थकी, न हारी” केवल संस्मरणों की श्रृंखला नहीं, बल्कि उस नारी चेतना का दस्तावेज़ है जिसने व्यक्तिगत पीड़ा को समाज के कल्याण का रास्ता बना...

श्रीमती सुशीला बोहरा— जोधपुर की उस मिट्टी की हैं, जो तपती है तो सोना बनाती है। उनका जीवन, आत्मबल, शिक्षा और समाजसेवा की त्रिवेणी है। वे एक प्रेरणास्रोत हैं— उन सभी के लिए जो जीवन की कठिनाइयों में भी उम्मीद का दीप जलाए रखना चाहते हैं।
उनकी आत्मकथा “मैं न थकी, न हारी” केवल संस्मरणों की शृंखला नहीं, बल्कि उस नारी चेतना का दस्तावेज़ है जिसने व्यक्तिगत पीड़ा को समाज के कल्याण का रास्ता बना दिया। यह पुस्तक हमें बताती है कि यदि इच्छाशक्ति अडिग हो, तो एक अकेली स्त्री भी सामाजिक बदलाव की मशाल बन सकती है।
सुशीला जी ने मात्र 21 वर्ष की उम्र में अपने पति को खो दिया, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय जीवन को फिर से गढ़ा। शिक्षा पूरी की, 1965 में व्याख्याता बनीं, और आगे चलकर राजस्थान सरकार के महिला विकास कार्यक्रम में परियोजना निदेशक के रूप में उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने महिलाओं, दृष्टिबाधितों, मूक-बधिरों, और मानसिक रूप से विकलांग लोगों के लिए सेवा को अपना जीवन-व्रत बनाया।
“मैं न थकी, न हारी” उनके जीवन की उन अनकही कहानियों को सामने लाती है, जो आंसू, साहस और सेवा के मिलन से जन्मी हैं। यह पुस्तक केवल आत्मकथा नहीं— यह आत्मा की यात्रा है।
जोधपुर में हाल ही में इस प्रेरणादायी आत्मकथा का भव्य लोकार्पण समारोह आयोजित हुआ, जिसने शहर के साहित्यिक और सामाजिक परिवेश में एक नई ऊर्जा भर दी। इस गरिमामय अवसर पर केंद्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति संदीप मेहता, राज्यसभा सांसद राजेंद्र गहलोत, तथा जोधपुर शहर विधायक अतुल भंसाली जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों की उपस्थिति ने समारोह को गौरवमयी बना दिया।
कार्यक्रम में सुशीला जी के जीवन पर आधारित एक भावनात्मक डॉक्यूमेंट्री प्रदर्शित की गई, जिसे दर्शकों ने “आत्मा को छूने वाला” बताया। उनके पोते-पोतियों द्वारा साझा किए गए संस्मरणों ने आयोजन को पारिवारिक ऊष्मा से भर दिया।
आख़िर में, जब स्वयं श्रीमती सुशीला बोहरा ने मंच से कहा— “मेरे जीवन की सबसे बड़ी कमाई सम्मान नहीं… सेवा है।”— तो यह पंक्ति सिर्फ़ एक वाक्य नहीं रही, बल्कि पूरे आयोजन की आत्मा बन गई। जोधपुरवासियों के लिए यह केवल एक पुस्तक विमोचन नहीं, बल्कि जीवन से मिलने वाला एक सच्चा सबक था — कि जिनमें जज़्बा हो, वो कभी न थकते हैं, न हारते हैं।






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