बिहारी के दोहे और नावक के तीर: शब्दों के शस्त्र की गूंज
नावकतीर का तात्पर्य उस काल की एक विशेष प्रकार की बंदूक से है, जिसकी तीव्र और सूक्ष्म मारक क्षमता बिहारी की रचनाओं में प्रतीक रूप में झलकती...

नावक के तीर उस काल की एक विशेष प्रकार की छोटी बंदूक थी, जो आकार में भले ही छोटी होती थी, लेकिन उसकी मारक क्षमता अत्यंत तीव्र होती थी। यह नजदीकी युद्ध में प्रयोग की जाती थी।
प्रो. डॉ. कल्याणसिंह शेखावत बताते हैं कि यह “नावक के तीर” वास्तव में लोहे का धारदार तीर होता था, जिसे बंदूक की नाल के ऊपर फिट किया जाता था। जब बंदूक का स्ट्राइकर दबता, तो यह नुकीला तीर तेज़ी से निकलता और सीधे शत्रु के कलेजे में घुस जाता। इसका घाव इतना गहरा होता कि मृत्यु लगभग निश्चित मानी जाती थी।
बिहारी की प्रसिद्ध रचना ‘बिहारी सतसई’ के दोहों को इसी नावकतीर से उपमित किया गया है—
‘सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर,
देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गम्भीर।’
यह दोहा सिर्फ उपमा नहीं, बल्कि उस युग के एक प्रभावी अस्त्र का सजीव चित्रण है। बिहारी के दोहे शब्दों में छोटे, पर भाव और व्यंग्य में तीव्र होते हैं—जैसे यह नावकतीर, जो दिखने में साधारण पर असर में प्रचंड।
प्रो. शेखावत बताते हैं कि उन्होंने जयपुर के सिटी पैलेस के शस्त्रागार कक्ष में ऐसी नावकतीर वाली ऐतिहासिक बंदूक स्वयं देखी थी। दुर्भाग्य से उस समय मोबाइल कैमरे नहीं थे, इसलिए वे उसका चित्र नहीं ले सके।
इस रोचक उपमा पर साहित्यकार कन्हैयालाल सहल ने भी शोध किया था और इस ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संधि पर आलेख लिखा था।
यह प्रमाण दर्शाता है कि बिहारीलाल केवल भावप्रधान कवि नहीं थे, बल्कि वे अपने समय की तकनीक, अस्त्र-शस्त्र और समाज के गहरे जानकार भी थे। उनके दोहे केवल श्रृंगार और नीति तक सीमित नहीं, बल्कि उनमें उस युग की ऐतिहासिक गूंज भी साफ सुनाई देती है।
चित्र – काल्पनिक






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