शब्दों के शिल्पी पंडित रामकरण आसोपा ने खंडित शिलालेख जोड़ इतिहास रच दिया
पंडित रामकरण आसोपा ने खंडित शिलालेखों को जोड़कर प्राचीन इतिहास की भूली-बिसरी कड़ियों को फिर से जीवंत कर दिया। उनके शब्द-साधन ने राजस्थान की ऐतिहासिक धरोहर को नया आयाम...

वे उस कारीगर की तरह थे, जो टूटी हुई माला के मोतियों को न केवल धागे में पिरोता है, बल्कि उनके मध्य की भूली हुई कथा को भी जोड़ देता है। मण्डोर के खंडित शिलालेखों को देखकर इतिहासकार जहाँ असहाय हो जाते, वहाँ पं. आसोपा की आँखें उनमें प्राचीन भारत की धड़कनें पहचान लेतीं।
1940 में जोधपुर के मण्डोर क्षेत्र से खंडित अवस्था में प्राप्त एक महत्वपूर्ण शिलालेख—जिसे इतिहास ने लगभग खो ही दिया था—उसके 84 टुकड़ों को पं. आसोपा ने न केवल पहचाना, वरन् उन्हें जोड़कर 73 पंक्तियों का अद्भुत इतिहास उद्घाटित कर दिया।
इस मण्डोर शिलालेख में 6वीं शती के मध्य में शासन करने वाले महाराज नरेश हरिचंद्र और उनके पुत्रों—राजा मानोरी व राजा महीराज की वंशावली का वर्णन है। यह न केवल प्रतिहारों की उत्पत्ति और पूर्ववर्ती इतिहास का प्रमाण बन गया, बल्कि राजस्थान की प्राचीन राजनीतिक-सांस्कृतिक धारा को भी स्पष्ट कर गया।
सर जॉन मार्शल जैसे विश्वप्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् ने भी इस खोज पर प्रशंसा की मुहर लगाई। यह वह समय था जब पं. आसोपा मात्र 15 रुपये मासिक वेतन पर कार्य कर रहे थे—पर उनका ज्ञान और श्रम करोड़ों के इतिहास को पुनर्जीवित कर रहा था।
उनकी विद्वता ने चुप पड़े पत्थरों को वाणी दी, और खोई हुई राजवंशों की पहचान को पुनः प्रतिष्ठित किया। इतिहास के इस मोती को नमन, जिसने भारत की सांस्कृतिक माला को फिर से चमका दिया।






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