शकुन संकतों के मर्मज्ञ थे मारवाड के राव मालदेव
मध्यकालीन मारवाड़ का जीवन केवल तलवार और युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि वह एक ऐसा समाज भी था जो प्रकृति से संवाद करता था। राव मालदेव राठौड़, जिन्होंने 1531 से 1562 ईस्वी तक मारवाड़ पर शासन किया, केवल...

जिस प्रकार कोई किसान बादलों की चाल देखकर अनुमान लगाता है कि बारिश कब होगी, उसी तरह मालदेव शकुनों के संकेत देखकर निर्णय लिया करते थे — चाहे वह युद्ध छेड़ने का समय हो या किसी नई योजना की शुरुआत। यही कारण है कि उन्होंने “शकुनाशास्त्र” जैसा ग्रंथ रचा, जिसमें उन्होंने बताया कि किस तिथि, किस पक्षी, किस पशु या किस दिशा के संकेत का क्या अर्थ है। ये शकुन कभी पक्षियों की उड़ान से मिलते थे, कभी किसी पर्व विशेष पर दिखाई देने वाली घटनाओं से, और कभी-कभी गणना से प्राप्त अंकों द्वारा — जिन्हें “पासा केवली” कहा जाता था।
इन शकुनों का समाज में गहरा प्रभाव था। आमजन से लेकर शासक तक, हर कोई शुभ कार्य से पहले अच्छे शकुनों की प्रतीक्षा करता। हर वार के शकुनों का भी विवरण मिलता है, जिसे “सात वार विचार” जैसे ग्रंथों में संरक्षित किया गया।
मालदेव के युद्ध भी केवल तलवार से नहीं जीते गए — उन्होंने सही समय, सही संकेतों और सही दिशा का चयन कर अपनी विजय पक्की की। बीकानेर, सिवाना, फलोदी, बिलाड़ा जैसे क्षेत्रों की विजय में कहीं न कहीं शकुनों की भूमिका रही। यह विश्वास केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन चुका था।
इस प्रकार, शकुन मारवाड़ की सामाजिक चेतना का आईना था। वह केवल भविष्य की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि अतीत की अनुभूति और अनुभव का संचित ज्ञान था। यही कारण है कि आज भी मारवाड़ की ग्रामीण जनता शकुनों को पूर्वजों का आशीर्वाद मानती है, और उन्हें ज़िंदगी के निर्णयों में स्थान देती है।






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