बेनकाब हुए दोस्ती का दंभ भरने वाले
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले के बाद भारत कूटनीतिक रूप से बहुत बदल गया। खासकर ऑपरेशन सिंदूर की सफलता ने तो भारत को इतने कड़वे अनुभव दिए कि यह स्पष्ट हो गया कि घर के अंदर और...

सीख: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत को मिला कूटनीतिक अनुभव, कौन साथ और कौन नहीं, स्पष्ट रूप से आया सामने
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- सीख: ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत को मिला कूटनीतिक अनुभव, कौन साथ और कौन नहीं, स्पष्ट रूप से आया सामने
- दुनिया को पता पाकिस्तान दोषी, फिर भी चुप हैं
- भारत ने दुनिया को बताई अपनी नीति-रणनीति
- ज्ञान और सीख : कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं, केवल स्थायी हित
- रूस और ऑस्ट्रेलिया भी नहीं निभा पाए सच्ची दोस्ती
- भारत को खला रूस का बदलता रवैया
- इतिहास गवाह, भारत कभी किसी का मोहताज नहीं रहा
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत के कंधे को सहला कर दर्द बांटने वाले दुनिया के शक्तिशाली और समृद्ध देशों ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद चुप्पी साध ली। किसी ने भारत की इस सख्त कार्रवाई पर कोई टिप्पणी नहीं की। भारत ने 7 मई की कार्रवाई के बारे में दुनिया को बताया तो सब हैरान रह गए। किसी ने उम्मीद तक नहीं की थी कि भारत 26 मासूम लोगों की निर्मम हत्या का इस कदर जवाब देगा। आतंक और आतंकियों को पालने वाले पाकिस्तान को घर में घुसकर मारेगा। आतंकियों के नौ ठिकानों को नेस्तनाबूद कर देगा। भारत अपनी संसद पर वर्ष 2001 में हुए कायराना हमले से लेकर 2025 की पहलगाम त्रासदी तक इस खौफनाक रूप से अपना बदला चुकाएगा, इसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की होगी। तभी तो देश की दो जाबांज महिला अफसरों कर्नल सौफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बारे में देश और विश्व को विस्तृत जानकारी दी तो ये स्पष्ट हो गया कि 15 दिन एक्शन के रिएक्शन में क्यों लगे?
यही कारण है कि भारत की कड़ी कार्रवाई से लेकर आज तक सच्चे और अच्छे दोस्तों की खामोशी कई सवाल खड़े कर रही है? खासकर उस वक्त जब अमेरिका से लेकर यूरोपीय देश और ग्लोबल साउथ तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारत का दोस्त होने के दावे करते हैं। ऑपरेशन सिंदूर ने समय रहते भारत को कड़वा सबक सिखाया कि संकट की घड़ी में कौन आपके साथ था और कौन नहीं? ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अमेरिका से लेकर फ्रांस, ब्रिटेन, रूस या जापान तक जिनके साथ भारत के अच्छे संबंध रहे, उन्होंने चुप्पी साध ली। बस राहत की बात यही रही कि उन्होंने आतंक के खिलाफ भारत के ऑपरेशन का विरोध नहीं किया। इसे ही सबसे बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। पहलगाम आतंकी हमले और ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत युद्ध, कूटनीति और नैरेटिव तय करने में अकेला दिखा। ऐसे में ये अनुभव भी हो गया कि दुनिया में दमदार तरीके से आगे बढ़ने का एक ही रास्ता है और भारत को मजबूत आर्थिक और सैन्य शक्ति बनना ही होगा।
दुनिया को पता पाकिस्तान दोषी, फिर भी चुप हैं
बीते 40 वर्षों की बात करें तो पाकिस्तान की ओर से किए गए आतंकी हमलों में 20 हजार से ज्यादा भारतीयों ने अपनी जान गवाईं। दुनिया में कहीं पर भी बड़े आतंकी हमले हुए तो उनका सीधा कनेक्शन पाकिस्तान के साथ निकला। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी अपने संबोधन में अमेरिका और ब्रिटेन में हुए हमलों के बारे में बताया था। इन हमलों के मास्टरमाइंड भी पाकिस्तान में मिले थे। भारत बरसों से संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ दुनिया के शक्तिशाली देशों को पाकिस्तान की करतूतों के बारे में बताता रहा। सबको पता है कि पाकिस्तान आतंक और आतंकियों को पाल रहा है। आतंकियों के सबसे ज्यादा प्रतिबंधित संगठन उसके मुल्क में पल रहे हैं। वहां की सरकार और सेना का उनको प्रश्रय है। इसके बावजूद किसी देश ने पाकिस्तान पर कड़ी कार्रवाई करने का काम नहीं किया। उल्टे भारत को सवालों के घेरे में खड़ा किया। यही कारण रहा कि इस बार भारत ने एक और कूटनीतिक रणनीति के तहत दुनिया के 33 देशों में अपने 51 प्रतिनिधियों को सबूतों के साथ भेजा। इन 33 देशों का चयन काफी सोच-समझकर किया गया। इन देशों में 15 देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के स्थायी या अस्थायी सदस्य हैं। पांच अन्य देश जल्द ही सदस्य बनने वाले हैं। बाकी देशों को इसलिए चुना गया, क्योंकि उनकी आवाज वैश्विक मंच पर दम रखती हैं। ये देश भारत के आतंकवाद विरोधी रूख को समझने और समर्थन देने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। भारत इन दौरों के जरिए दुनिया को बताना चाहता है कि वह आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर अडिग है। सिंधु जल संधि को निलंबित करने का फैसला भी तब तक लागू रहेगा, जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता।
भारत ने दुनिया को बताई अपनी नीति-रणनीति
ऑपरेशन सिंदूर पर संघर्ष विराम के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कई बड़ी बातें कहीं। पहला यह कि खून और पानी साथ नहीं बहेगा। उन्होंने कहा कि टेरर और ट्रेड साथ नहीं चलेगा। आतंक फैलाने वाले देशों के साथ भारत न तो कारोबार करेगा और न उन्हें कोई विशेष दर्जा देगा। भारत की इस बदली नीति की वजह है बढ़ती आर्थिक ताकत। भारत की स्वदेशी हथियार तकनीक, चाहे वह आकाश मिसाइल हो या रूस के सहयोग से विकसित ब्रह्मोस, उन्होंने अपनी अचूक मारक क्षमता दिखाई है। एक तरफ देश आर्थिक तौर पर समृद्ध हो रहा है तो दूसरी तरफ सैन्य क्षमता भी बढ़ रही है। शांति के लिए मजबूत आर्थिक और सैन्य ताकत जरूरी है। आर्थिक और सामरिक ताकत की वजह से ही भारत अपनी नीति बदल रहा है। भारत की अब तक की नीति रही कि वह किसी दूसरे देश के मामले में न हस्तक्षेप करेगा और न किसी दूसरे देश का हस्तक्षेप मंजूर करेगा। ऑपरेशन सिंदूर इस नीति में बदलाव का वाहक बनकर आया। पहले भारत आतंक के खिलाफ विदेशी धरती पर कार्रवाई के लिए विदेशी ताकतों पर निर्भर रहता था। ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारत ने दिखाया कि वह अपनी जनता की रक्षा के लिए किसी की मंजूरी का इंतजार नहीं करेगा। भारत ने यह संदेश भी दिया कि आतंकी और उसके मास्टरमाइंड कहीं छिप नहीं सकते। भारत उन्हें खोज निकालेगा और उन्हें किए की सख्त सजा देगा। भारत ने यह भी दिखाया कि अगर पाकिस्तान आतंकी कार्रवाई के खिलाफ जवाबी हमला करेगा तो उसे करारा जवाब दिया जाएगा। आजादी के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर बड़ा मुद्दा रहा है। पाकिस्तान हरसंभव मंचों, अंतरराष्ट्रीय बिरादरी आदि के सामने कश्मीर राग अलापता रहा। इसके जरिए जरूरी सहयोग और संसाधन हासिल करता रहा। दोनों देशों के बीच कश्मीर का नैरेटिव सदैव हावी रहा। लेकिन मौजूदा दौर में हालात बदल गए हैं। कश्मीर की बजाय आतंक बड़ा नैरेटिव बनकर उभर गया। राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि पाकिस्तान से सिर्फ आतंक और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर पर बात होगी। भारत की नई और बदली नीति का ही ये स्पष्ट संकेत है।
ज्ञान और सीख : कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं, केवल स्थायी हित
भारत की पाकिस्तान पर की गई कड़ी सैन्य कार्रवाई का किसी बड़ी शक्ति चाहे अमेरिका हो, रूस हो, ऑस्ट्रेलिया हो या क्वाड का एक और सदस्य जापान, किसी ने खुलकर समर्थन नहीं किया। इन देशों की दूरी ने यही ज्ञान और सीख भारत को दी कि किसी भी राष्ट्र का कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता, केवल उनके स्थायी हित होते हैं। दुनिया में भारत की बढ़ती ताकत, साख और आत्मनिर्भर बनने की सोच से मित्र और शत्रु दोनों ही नाराज दिखे।
रूस और ऑस्ट्रेलिया भी नहीं निभा पाए सच्ची दोस्ती
पहलगाम में हुए नृशंस आतंकी हमले के बाद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की और 26 पर्यटकों की क्रूर हत्या की निंदा की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हमले के दोषियों को न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए। लेकिन जैसे ही भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, उन पर हमले शुरू किए और इसके बाद पाकिस्तान ने भारत पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले किए तो उनका कोई बयान नहीं आया। इसी तरह से ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज ने भी पहलगाम हमले के बाद प्रधानमंत्री मोदी से बात की थी। उन्होंने दुनिया को झकझोर देने वाली बेतुकी हिंसा के लिए अपनी संवेदनाओं का इजहार किया और दोषियों को जवाबदेह ठहराए जाने की अपील भी। लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने भी पाकिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान समर्थन नहीं दिखाया।
भारत को खला रूस का बदलता रवैया
भारत में सालों से यही कहानी सुनाई जाती रही कि 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में रूस ने किस तरह से मदद की थी। भारतीय जनमानस के मन में रूस की दोस्ती इतनी गहराई से बसी कि ये लोक कथाओं का हिस्सा बन गईं। भारत के लोग हर हाल में रूस पर भरोसा करते हैं, जबकि शायद कोई भारतीय होगा जो अमेरिका पर आंख मूंदकर भरोसा करने की सलाह देगा। वह भी तब जब अमेरिका ने पिछले कुछ सालों में टेक्नोलॉजी और डिफेंस सेक्टर में भारत की जबरदस्त मदद की। लेकिन पाकिस्तान के साथ संघर्ष में रूस की चुप्पी सबको खली। इन हालात में भारत को बहुध्रुवीय कूटनीति अपनानी होगी। फ्रांस, अमेरिका, जापान और इजरायल जैसे देशों के साथ साझेदारी को और गहराई देनी होगी, जिससे कि चीन और पाकिस्तान के खिलाफ मजबूत सुरक्षा तंत्र विकसित किया जा सके। रूस के साथ संबंध बनाए रखें, लेकिन उस पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहें। भारत को यह समझना होगा कि विश्व राजनीति भावनाओं से नहीं, बल्कि हितों से संचालित होती है।
इतिहास गवाह, भारत कभी किसी का मोहताज नहीं रहा
इतिहास गवाह है कि भारत ने अकेले 1971 की लड़ाई में अमेरिका के समर्थन के बावजूद पाकिस्तान को हराया था। 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका समेत यूरोप देशों ने प्रतिबंध लगा दिए, फिर भी भारत डटा रहा। भारत ने अपने दम पर ही 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 में पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक किए। वह भी बिना वैश्विक समर्थन की उम्मीद किए। 2025 में भी दुनिया के समर्थन के बिना पाकिस्तान को घुटनों पर ला दिया। इन अनुभवों से सीख लेकर भारत को अपनी डिफेंस ताकत को और मजबूत करना होगा। अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा। एक ताकत के तौर पर विश्व में उभरना होगा, ताकि भविष्य में किसी के समर्थन का मोहताज तक नहीं होना पड़े।






No Comment! Be the first one.