परमाणु छाते के पार एक भारतीय सूर्योदय
सटीकता के साथ किया गया सैन्य हस्तक्षेप, संयमित शक्ति प्रदर्शन और सीमित समय में ऑपरेशन की समाप्ति— यह सब इस ओर इशारा करता है कि अब भारत ‘सहने’ के युग से निकलकर ‘कहने और करने’ के युग में प्रवेश कर चुका...

विवेक श्रीवास्तव,
वरिष्ठ पत्रकार
“अब्र जितने भी थे छंटने लगे हैं फलक से,
ये कोई और ही सूरज है जो उग आया है।”
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ये सूरज केवल उजाला नहीं लाता, यह तेज़ देता है। ऐसा तेज़ जो आंखों को चौंधिया दे, मगर आत्मा को एक नई दृष्टि दे। ऑपरेशन सिंदूर उसी तेज़ का नाम है— भारत की सैन्य नीति, रणनीतिक आत्मविश्वास और वैश्विक भूमिका का वह ऐलान, जो न तो केवल शौर्य की कहानी है, न ही केवल तकनीक का उत्सव, बल्कि एक ऐसी विचारधारा है जो कहती है:
“अब भारत चुप नहीं रहेगा, अब भारत जवाब नहीं, पहल करेगा।”
परमाणु घमंड के विरुद्ध संयमित साहस
पाकिस्तान के केराना एयरबेस पर स्थित वह गुप्त न्यूक्लियर टनल— चीन के तकनीकी सहयोग से निर्मित— वर्षों से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए छाया संकट बना हुआ था। यहां छिपे आठ परमाणु वॉरहेड्स पाकिस्तान के तथाकथित “न्युक्लियर डिटरेंस” का आधार थे। यह वह छाता था जिसकी ओट में आतंकी भेजे जाते थे, सीमाएं लांघी जाती थीं, और अंतरराष्ट्रीय मंच पर घुड़की दी जाती थी।
लेकिन भारत ने इस बार इतिहास को नए सांचे में ढाला।
सटीकता के साथ किया गया सैन्य हस्तक्षेप, संयमित शक्ति प्रदर्शन और सीमित समय में ऑपरेशन की समाप्ति— यह सब इस ओर इशारा करता है कि अब भारत ‘सहने’ के युग से निकलकर ‘कहने और करने’ के युग में प्रवेश कर चुका है। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया— “अब परमाणु की धमकी नहीं चलेगी। भारत शांति चाहता है, लेकिन समर्पण नहीं करेगा।”
“वो जो कहते थे हमें छू भी नहीं सकते,
आज खुद धूल में मिल चुके हैं उनके मंसूबे।”
भारतीय सेना ने अद्वितीय संयोजन दिखाया— बिना किसी वॉरहेड को नुकसान पहुंचाए, केराना टनल की परिधि को निष्क्रिय कर दिया। यह कोई सामान्य सैन्य कार्रवाई नहीं थी— यह उस ‘डर की राजनीति’ का खात्मा था जिस पर पाकिस्तान दशकों से सवार था।
तकनीक की तलवार: तेजस, ब्रह्मोस और विश्वास
आज भारत ‘आयातक’ से ‘निर्यातक’ की कुर्सी पर बैठा है। तेजस लड़ाकू विमान— जिनका कभी विरोध हुआ था— अब दुनिया भर में मांगे जा रहे हैं। ब्रह्मोस मिसाइल— एक प्रतीक बन चुकी है ‘सटीक और स्वदेशी शक्ति’ का। आकाश मिसाइल से लेकर रक्षा प्रणाली तक, भारत अब सिर्फ़ ‘मेड इन इंडिया’ नहीं, ‘डिफेंड बाय इंडिया’ की पहचान बना रहा है। वंदे भारत एक्सप्रेस जैसे नागरिक उपक्रम हों या ड्रोन टेक्नोलॉजी, एआई आधारित सैन्य निगरानी हो या स्पेस-बेस्ड वॉरफेयर, हर मोर्चे पर भारत ने एक नई परिभाषा गढ़ दी है।
“अब तक जो गुनगुनाते थे किसी और का नाम,
अब वो भी पूछते हैं— ‘ये भारत है क्या?”
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यह बदलाव महसूस किया जा रहा है। रूस, अमेरिका, फ्रांस, इजरायल— सब भारत को अब न केवल एक सहयोगी, बल्कि एक संभावित शक्ति केंद्र मानने लगे हैं। जहां कभी भारत ‘मध्यस्थता’ की भीख मांगता था, आज वह साफ़ कहता है— “सीज़फायर हमारी शर्तों पर होगा, और कोई मध्यस्थ नहीं चाहिए।” डोनाल्ड ट्रम्प के हालिया बयानों से भले ही भ्रम फैला हो, लेकिन भारत ने स्पष्ट कर दिया— “अमेरिका केवल दर्शक रहा, निर्णायक नहीं। सीज़फायर पाकिस्तान की मांग थी, भारत की नहीं।”
नूर ख़ान एयरबेस: भ्रम का अंत
नूर ख़ान एयरबेस, जिसे पाकिस्तानी सामरिक विशेषज्ञ ‘अजेय’ मानते थे— भारत के हवाई हमले ने वहां की नींव हिला दी। यह केवल एक सैन्य पराजय नहीं थी, यह “मानसिक पराजय” थी।
“जिनकी परछाइयों से डरते थे वो,
अब अपने ही साए से कांप रहे हैं।”
यह इतिहास की वह घड़ी थी जब भारत ने एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के डिटरेंस को निष्क्रिय कर अपनी रणनीतिक सूझबूझ का परचम फहरा दिया।
जननायक का नेतृत्व, जनबल का संकल्प
प्रधानमंत्री का आदमपुर एयरबेस पहुंचना केवल एक ‘फोटो ऑप’ नहीं था— यह रणभूमि और राजनीति के बीच की खाई को पाटने का एक प्रतीक था। एक स्पष्ट संदेश— “भारत का नेतृत्व अब केवल कुर्सियों से नहीं, सरहदों से तय होगा।”
“जो दुश्मन को देख मुस्कुरा सके,
वो सिर्फ़ नेता नहीं, जननायक होता है।”
भारत: अब प्रतिक्रिया नहीं, रणनीति बनाता है
भारत अब वैश्विक राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभा रहा है। चाहे वह संयुक्त राष्ट्र हो, जी20, या ब्रिक्स— भारत अब केवल एक ‘भागीदार’ नहीं, एक ‘निर्धारक’ बन चुका है।
“अब तो नक़्शे बदलने लगे हैं मेज़ों पर,
भारत का नाम ऊंचा है सब जज़्बों पर।”
आत्मबल ही असली अस्त्र है
ऑपरेशन सिंदूर केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, यह विश्वास की घोषणा थी। एक ऐसा विश्वास जो कहता है— अब भारत को कमज़ोर समझने की भूल कोई न करे। अब भारत जवाब नहीं, शुरुआत करता है।
अब भारत चुप नहीं, तेज़ है।
“अब न तोपों से डर लगता है, न धमकियों से,
हमने अपने विश्वास से बड़ा कोई अस्त्र नहीं देखा।”
यह लेख केवल एक विजय गाथा नहीं, एक चेतावनी है — मित्रों को आश्वस्त करने वाली और शत्रुओं को भयभीत करने वाली। भारत अब शांति का पक्षधर है, पर चुपचाप सहने वाला नहीं।






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