वैश्विक मंचों पर भारत की निर्णायक आवाज
राकेश गांधी,वरिष्ठ पत्रकार पाकिस्तान के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ कार्रवाई के बाद भारत ने जिस सजगता और रणनीतिक स्पष्टता के साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अपना पक्ष रखा, वह एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान...

राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
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पाकिस्तान के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ कार्रवाई के बाद भारत ने जिस सजगता और रणनीतिक स्पष्टता के साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अपना पक्ष रखा, वह एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है। इस मिशन की संवेदनशील पृष्ठभूमि और इसके राजनीतिक-सैन्य आयामों को विश्व के समक्ष स्पष्ट करने का कार्य भारतीय सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने न केवल कुशलतापूर्वक किया, बल्कि इस दौरान भारत की आतंकवाद के प्रति ज़ीरो टॉलरंस नीति को भी मजबूती से रेखांकित किया। यह प्रतिनिधिमंडल कोलंबिया, पनामा और बहरीन जैसे देशों के दौरे पर गया, जिसका नेतृत्व कांग्रेस सांसद डॉ. शशि थरूर ने किया। उनके साथ भाजपा के तेजस्वी सूर्या, शशांक मणि, मिलिंद देवड़ा और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी जैसे विभिन्न दलों के प्रतिनिधि भी सम्मिलित रहे। विदेश नीति में यह बहुदलीय एकजुटता अपने-आप में एक सशक्त संदेश था कि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत पूरी तरह एकमत है।
कोलंबिया में शशि थरूर का सधा हुआ उत्तर
कोलंबिया में जहां वहां की सरकार ने पाकिस्तान में मारे गए आतंकियों पर शोक जताया, वहां भारत की प्रतिक्रिया अत्यंत संतुलित और तर्कसंगत रही। डॉ. शशि थरूर ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा, “आतंकवादियों और उनकी कार्रवाई में मारे गए सैनिकों के बीच कोई नैतिक समता नहीं की जा सकती।” उन्होंने स्पष्ट किया कि ऑपरेशन सिंदूर एक आत्म रक्षात्मक कदम था, जिसे भारत ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में रहकर अंजाम दिया, और इसमें किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की आवश्यकता नहीं है। उनका यह वक्तव्य न केवल भारतीय पक्ष की संवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि भारत अपनी रक्षा को लेकर कितना जागरूक और आत्मनिर्भर है।
विदेशी प्रतिक्रिया : कोलंबिया के अधिकारियों ने थरूर के शांत और तर्कसम्मत स्पष्टीकरण को गंभीरता से लिया और यह स्पष्ट किया कि उनके बयान का उद्देश्य किसी पक्ष विशेष का समर्थन नहीं था। कोलंबिया के विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि उनकी सरकार आतंकवाद के किसी भी रूप की निंदा करती है।
बहरीन में ओवैसी का दो-टूक बयान
एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने बहरीन में बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा, “पाकिस्तान आतंकवादियों का पोषक है, न कि पीड़ित।” उन्होंने मुंबई, पुलवामा और पठानकोट जैसे हमलों का उल्लेख करते हुए यह रेखांकित किया कि भारत आतंकवाद का शिकार रहा है, और पाकिस्तान उसकी पनाहगाह। उनकी यह शैली भले ही आक्रामक कही जाए, लेकिन यह बात अंतरराष्ट्रीय जगत को साफ़ संकेत देती है कि भारत अब किसी भी स्तर पर नरमी बरतने को तैयार नहीं।
विदेशी प्रतिक्रिया: बहरीन के एक वरिष्ठ सांसद ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल की दृढ़ता की सराहना करते हुए कहा कि उनके देश को भी आतंकवाद के खतरों का अनुभव है और भारत के साथ सहयोग मजबूत किया जाएगा।
पनामा में भाजपा नेताओं की सजग कूटनीति
पनामा में भाजपा नेताओं—तेजस्वी सूर्या, शशांक मणि और मिलिंद देवड़ा ने संयम और दृढ़ता से पाकिस्तान के दोहरे मापदंडों की आलोचना की। उन्होंने आईएमएफ जैसे संस्थानों को चेताया कि आतंकवाद को पनाह देने वाले राष्ट्रों को वित्तीय सहायता देने से पहले उनके आतंकवादी नेटवर्क और समर्थन प्रणाली की समीक्षा आवश्यक है।
विदेशी प्रतिक्रिया: पनामा की संसद के सदस्यों ने भारतीय नेताओं की चिंता को साझा किया और कहा कि वैश्विक वित्तीय संस्थानों को अब अपनी नीति में ऐसे मुद्दों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
सलमान खुर्शीद और कनिमोई के सधे स्वर
दूसरे दलों से प्रतिनिधित्व करते हुए सलमान खुर्शीद (कांग्रेस) और कनिमोई (डीएमके) ने स्लोवेनिया और यूरोपीय प्रतिनिधियों के साथ मुलाकात में भारत की आतंकवाद विरोधी नीति को मानवीय और न्यायसंगत बताया। खुर्शीद ने कहा, “पीओके भारत का अभिन्न अंग है और ऑपरेशन सिंदूर इसका प्रतीक है कि भारत अब और सहन नहीं करेगा।” कनिमोई ने इस बात पर जोर दिया कि भारत किसी भी देश के नागरिकों के प्रति दुर्भावना नहीं रखता, लेकिन आतंक का समर्थन करने वालों के प्रति उसकी नीति कठोर है।
विदेशी प्रतिक्रिया: स्लोवेनिया के विदेश मामलों के उपमंत्री ने भारत के दृष्टिकोण को गंभीरता से सुना और कहा कि यूरोपीय संघ भी आतंकवाद के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता रहेगा।
डेनमार्क में एम.जे. अकबर की ऐतिहासिक अपील
पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार एम.जे. अकबर ने डेनमार्क में वहां के शीर्ष सांसदों, नीति-निर्माताओं और कूटनीतिक प्रतिनिधियों से भेंट की। अपनी बैठक में उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि और भारत की आतंकवाद-निरोधी नीति का सारगर्भित और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से परिचय दिया। अकबर ने कहा, “भारत न केवल एक राष्ट्र है, बल्कि एक सभ्यता है, जिसने हजारों वर्षों तक शांति, सहिष्णुता और न्याय को जीवन का आधार माना है। जब यह देश एक बार निर्णायक कदम उठाता है, तो वह महज जवाब नहीं देता, बल्कि एक सिद्धांत की रक्षा करता है। ऑपरेशन सिंदूर उसी सिद्धांत की अभिव्यक्ति है – जहां संप्रभुता, आत्मरक्षा और वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध नैतिक साहस का प्रदर्शन हुआ है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत आतंकवाद के खिलाफ युद्ध को धर्म, नस्ल या राष्ट्र से नहीं जोड़ता, बल्कि इसे मानवता के विरुद्ध अपराध मानता है। उन्होंने डेनमार्क से अपील की कि वह आतंकवाद के संदर्भ में “मौन” की बजाय “सिद्धांत आधारित स्पष्टता” अपनाए। पाकिस्तान को लेकर कहा, ‘पाकिस्तान सरकार के दो चेहरे हैं, उसकी जुबान दोहरी है, हम किससे बात करें। पाकिस्तान जहरीली जुबान में बात करता है और उससे बातचीत सिर्फ एक धोखा है।’
विदेशी प्रतिक्रिया: डेनमार्क की संसद के वरिष्ठ सदस्य मैड्स फुगलेडे ने कहा कि, “हम एम.जे. अकबर की ऐतिहासिक और मानवतावादी व्याख्या से प्रभावित हैं। डेनमार्क भारत को लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षक मानता है और आतंकवाद के खिलाफ उसकी लड़ाई को समर्थन देने के लिए इच्छुक है।” डेनिश विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने भी माना कि पीओके में आतंकवादी गतिविधियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समीक्षा आवश्यक है, और भारत की चिंताएं पूरी तरह वैध हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की घरेलू प्रतिक्रिया
जब विदेशी मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व हो रहा था, तब देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया कि ऑपरेशन सिंदूर किसी भी प्रकार की आक्रामकता नहीं, बल्कि आत्मरक्षा का उदाहरण है। राजनाथ सिंह ने चेतावनी देते हुए कहा, “पाकिस्तान अगर आतंकवादियों को संरक्षण देना बंद नहीं करता, तो उसे और अधिक गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।”
विदेशी प्रतिक्रिया: अमेरिका, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने भारत के आत्मरक्षात्मक अधिकार को मान्यता दी और पाकिस्तान से आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई करने की अपील की।
भारत की एकता और संप्रभुता का संदेश
ऑपरेशन सिंदूर के पश्चात विश्व मंचों पर भारतीय नेताओं की आवाज एक स्वर में गूंजी — भिन्न राजनीतिक दलों से होने के बावजूद उनके शब्दों में एक ही भाव था: भारत की संप्रभुता सर्वोपरि है, और आतंकवाद के प्रति उसकी नीति समझौताविहीन है। इस बहुपक्षीय प्रतिनिधित्व ने यह भी सिद्ध किया कि भारत की विदेश नीति अब केवल सरकार की नीति नहीं, बल्कि पूरे देश की सामूहिक आवाज बन चुकी है। ऐसे दौर में जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भ्रम और दोगली नीतियां आम हैं, भारत का यह स्पष्ट और एकजुट रुख न केवल प्रशंसनीय है, बल्कि अनुकरणीय भी।






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