बेतुके बयानों से बवाल
समझ में नहीं आ रहा कांग्रेस को क्या होता जा रहा है। कभी उसके नेता बिना सिर-पैर की बातों से बवाल खड़ा कर देते हैं तो कभी ऐसे ही बयानों की बदौलत कांग्रेस के हाथों में आती बाजी फिसलती नजर आती...

राजनीति में खुद को कमजोर क्यों साबित कर रही है कांग्रेस
सुरेश व्यास,
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
देश की ग्रांड ओल्ड पार्टी कांग्रेस पिछले डेढ़ दशक से ऐसी स्थिति में पहुंच गई है कि कांग्रेस के समर्थकों को भी लगने लगा है कि पार्टी आखिर करना क्या चाह रही है। देश में वर्ष 2014 में हुए नरेंद्र मोदी युग के उदय के बाद से पार्टी की चमक जैसे भाजपा के तेज में लुप्त होती जा रही है। भाजपा है कि उसने कांग्रेस की कमजोरी का पूरा फायदा उठाते हुए उसे ही टार्गेट कर रखा है और कांग्रेस लगातार मोदी और भाजपा की चालों में उलझती जा रही है। इसके चलते धीरे- धीरे लोग भी यह मानने लगे हैं कि लाख विफलताओं के बावजूद आज मोदी का विकल्प कोई नहीं है। लोग भले ही लुभावनी बातों पर भरोसा करना छोड़ चुके हैं, लेकिन इन्हें ये नजर नहीं आ रहा है कि आखिर विकल्प क्या है। कांग्रेस एक विकल्प हो सकती है, लेकिन खुद उसके नेता ऐसे काम कर रहे हैं कि भाजपा को बिना कुछ किए ही कांग्रेस पर लगातार बढ़त मिलती जा रही है।
ताजा मामला जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 निर्दोष लोगों पर आतंकी हमले और इसके बाद मोदी सरकार की ऑपरेशन सिंदूर के जरिए पाकिस्तान में स्थित आतंकी ठिकानों को नैस्तनाबूद करने की स्ट्राइक से जुड़ा है। जब हमला हुआ, तब इसकी टाइमिंग को लेकर देश और दुनिया में कई जगह सवाल उठे। कई लोगों ने इसे बिहार व अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश के रूप में भी देखा, लेकिन जब ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान पर प्रहार किया गया तो देश में राष्ट्रवाद का जज्बा उफान पर चला आया। चार दिन की सैन्य कार्यवाही के बाद मोदी सरकार फिर लोगों के निशाने पर आई, लेकिन कांग्रेस के नेताओं ने बेतुके बयान देकर भाजपा को हमलावर होने का मौका दे दिया।
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस आलाकमान इससे अनभिज्ञ है, लेकिन उस वक्त क्या किया जाए जब इसकी शुरुआत ही कांग्रेस के प्रभावशाली और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ही कर दी। पहले तो उन्होंने सर्वदलीय बैठक में पहलगाम हमले के पीछे सुरक्षा में चूक का सवाल उठाया और सरकार ने भी माना कि कहीं न कहीं तो चूक हुई है। इसके बाद सबकुछ ठीक चल रहा था। भारतीय सेनाओं के हाथ करारी मार खाया पाकिस्तान प्रोपेगेंडा युद्ध पर उतर आया था और अपने प्रमुख हवाई अड्डों को गड्ढों में तब्दील होता देखने के बाद भी कथित सीजफायर को अपनी जीत बताते हुए पीठ थपथपा रहा था। झूठ की सारी हदें पाकिस्तान ने पार कर दी और यहां तक कह दिया कि उसने भारत के राफेल विमान मार गिराए हैं। वायु रक्षा प्रणाली एस-400 को नैस्तनाबूद कर दिया है, लेकिन कहीं से भी इसके समर्थन में वो कोई सबूत पेश नहीं कर पाया।
उस दौर में भी भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार रक्षात्मक रूप में नजर आ रही थी। सिवाय पाकिस्तान को सबक सिखाए जाने की बातों के साथ सेना का मनोबल बढ़ाने वाली बातें हो रही थी। गैर भाजपाई दल ही नहीं, कांग्रेस भी सरकार के हर कदम के साथ थी, लेकिन जैसे ही अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर संदेश के जरिए भारत-पाकिस्तान में सीजफायर हो जाने का ऐलान किया, मोदी सरकार भी डिफेंसिव हो गई। कांग्रेस समेत कई दलों ने सवाल उठाए कि कहीं डोनाल्ड के दबाव में तो भारत ने हमले रोकने का फैसला नहीं किया। जबकि हकीकत यह है कि दस मई की सुबह बुरी तरह मार खाने के बाद पाकिस्तान ने पानी मांग लिया और खुद उसके डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशन्स (डीजीएमओ) ने भारत में अपने काउंटर पार्ट को फोन करके हमले रोकने का आग्रह किया।
पाकिस्तान पर निर्णायक हमलों के बाद भी कथित सीजफायर परोक्ष रूप से देश के सैन्य नेतृत्व को भी नागवार गुजरा होगा, लेकिन ये देश की सेनाओं का अनुशासन ही है कि वे सरकार के फैसले पर सवाल नहीं उठाते। फिर भी पूर्व सेना प्रमुख वीपी मलिक ने तो कह भी दिया कि एक दिन इंतजार और करना चाहिए था। इस स्थिति में कांग्रेस ने मोदी सरकार को घेरना का मौका गंवा दिया। कम से कम कांग्रेस सोची समझी रणनीति के तहत मोदी और भाजपा को ऑपरेशन सिंदूर का सियासी फायदा लेने से तो रोक ही सकती थी, लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के एक बयान पर सवाल उठाते हुए कह दिया कि पाकिस्तान को सैन्य कार्यवाही की सूचना पहले ही दे दी गई थी। राहुल ने यह भी पूछ लिया कि इससे वायुसेना को कितना नुकसान हुआ और हमारे कितने विमान दुश्मन ने मार गिराए? हालांकि विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि जयशंकर के बयान का गलत मतलब निकाला गया है, लेकिन कांग्रेस नेताओं ने विदेश मंत्री को जयचंद तक कह दिया और इस मुद्दे पर मोदी को घेरने की नाकाम कोशिश कर ली।
इधर, राहुल के बयान से भाजपा को हमलावर होने का मौका मिल गया और उसने बिना समय गंवाए कांग्रेस की राष्ट्रवाद पर कथित कमजोरी को लपक लिया। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने तो यह भी कह दिया कि आतंकी हाफिज सईद ने एक बार राहुल गांधी की तारीफ की थी और अब इसका कारण समझ में आने लगा है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परोक्ष रूप से कांग्रेस को निशाना बना रहे हैं। गुजरात के बाद बिहार और यूपी के दौरों में उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर को भुनाने की पूरी कोशिश करते हुए कांग्रेस को घेरने का मौका नहीं चूका।
कांग्रेस ने एक गलती और की। ऑपरेशन सिंदूर के बाद सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजकर दुनिया को पाकिस्तान ही हरकतों से अवगत करवाने की कोशिशों पर भी कांग्रेस ने परोक्ष रूप से सवाल उठा दिए। हालांकि उसने इस रणनीति का खुला विरोध तो नहीं किया, लेकिन प्रतिनिधिमंडलों में अपने नेताओं के नामों को लेकर की गई आपत्ति ने कांग्रेस की किरकिरी ही करवाई। केंद्र सरकार ने कांग्रेस सांसद शशि थरूर को नेतृत्व सौंपा तो कांग्रेस ने कहा, ‘हमने तो इनका नाम ही नहीं दिया था।’ मनीष तिवारी के नाम पर भी आपत्ति रही, लेकिन कांग्रेस ने यहां भी मौका गंवा दिया। दरअसल, विदेशी दौरों में विपक्षी नेताओं को भेजने की सरकार की नीति पर मोदी सरकार ने 2014 के बाद से ब्रेक लगा दिया था। अब जब मोदी सरकार पूर्ववर्ती सरकारों के रास्ते पर आई तो कांग्रेस शुगर कोटेड दवा के रूप में इसे भुना सकती थी। खैर, इतना ही नहीं, विदेशों में मोदी सरकार की ओर से पाकिस्तान को दिए गए जवाब को लेकर थरूर के बयान भी कांग्रेस नेताओं को रास नहीं आए और कांग्रेस के एक नेता ने तो थरूर को भाजपा को सुपर प्रवक्ता तक बता दिया। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने इस पर सवाल उठाया कि क्या कांग्रेस चाहती है कि उसके नेता विदेशों में जाकर अपने प्रधानमंत्री की खिलाफत करे? फिर भी इस मुद्दे पर बयानबाजी बढ़ने लगी तो कांग्रेस आलाकमान को डर सताया और ऐसे बयानों से बचने की नसीहत देनी पड़ी।
कांग्रेस ने सरकार की विदेश नीति पर भी सवाल उठाए। इस वक्त में ये भी उचित नहीं कहे जा सकते। जाहिर है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद मित्र देशों ने भी नपेतुले बयान देकर भारत का समर्थक कहलाने से गुरेज किया, लेकिन क्या कांग्रेस को इस वक्त इस पर सवाल उठाना चाहिए?
सवाल यह है कि आखिर कांग्रेस और इसके नेता इतने नासमझ क्यों हो गए हैं कि जब ऑपरेशन सिंदूर के बाद लोगों के मन में राष्ट्रवाद की भावना हिलोरे मार रही है तो इस पर सवाल कैसे उठाए जा सकते हैं? कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के बयान मायने रखते हैं और वे ही कभी नुकसान का सवाल उठाए या पूरे ऑपरेशन को एक छोटा सा युद्ध कहे तो फिर जनता कांग्रेस को क्यों सुनेगी? वह तो मोदी की बातों पर ही ऐतबार करेगी।
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी जैसे राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ये कांग्रेस के भीतर चल रही वर्चस्व और वैचारिक लड़ाई का नतीजा है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के शशि थरूर, मनीष तिवारी और पूर्व में विदेश राज्यमंत्री रहे आनन्द शर्मा जैसे नेताओं ने ही विदेशों में केंद्र सरकार की कार्यवाही का समर्थन करते हुए पाकिस्तान की पोल खोली है। पहले भी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं का तत्कालीन सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ विदेशों में सफलता पूर्वक इस्तेमाल किया है। उस वक्त विपक्ष में रही भाजपा ने सवाल तो नहीं उठाए। अब कांग्रेस अपनी अंदरूनी कशमकश के कारण खुद न सिर्फ एक्सपोज हो रही है, बल्कि अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम भी कर रही है।
ख्यातनाम स्तम्भकार और विश्लेषक आनन्द कोचिकुडी के शब्दों में, ‘कांग्रेस में आज जो मतभेद है, वह सिर्फ़ राष्ट्रवाद या राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल तक सीमित नहीं है। यह एक बहुत बड़ा वैचारिक टकराव है।’ 2024 के चुनाव से पहले जाति जनगणना पर पार्टी अध्यक्ष खड़गे को लिखे आनंद शर्मा के पत्र को याद करें, जिसमें उन्होंने बताया था कि यह “पहचान की राजनीति का समर्थन या उसमें शामिल न होने” की उनकी नीति से ऐतिहासिक रूप से अलग है। शर्मा ने 1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी के आह्वान का हवाला दिया, “ न जात पर न पात पर, मुहर लगेगी हाथ पर”, और मंडल आयोग की रिपोर्ट पर राजीव गांधी के भाषण का, “अगर जाति को हमारे देश में जातिवाद को स्थापित करने के लिए परिभाषित किया जाता है तो हमें समस्या होगी…।”
दरअसल, कांग्रेस दो धड़ों में बंटी हुई दिख रही है। एक धड़ा राहुल गांधी के नेतृत्व के पीछे- पीछे चलने की हौड़ में है और दूसरा धड़ा जो साल 2020 में गांधी परिवार की नीतियों के सामने जी-23 के रूप में सामने आया था, व्यक्तिपूजा का विरोध करता है। जब जी-23 बना था, उस वक्त कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा था कि हम जी-23 हैं, जी हुजूर-23 नहीं। आज वही बात फिर सामने आने लगी है। कांग्रेस एक बार फिर जी-हुजूर थ्योरी वाले नेताओं के जाल में फंसती जा रही है और इसके चलते ही पिछले लोकसभा चुनावों से पहले बने प्रमुख विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ के अस्तित्व पर भी सवाल उठने लगे हैं।
पहले भी कांग्रेस चौकीदार चोर जैसे अभियानों से मार खा चुकी है, लेकिन पिछले चुनाव में जैसे ही कांग्रेस ने रुख बदला और मोदी विरोध के साथ आमजन से जुड़े मुद्दों की बात की तो जनता साथ आई और बरसों बाद कांग्रेस की लोकसभा में सीटें 93 तक पहुंची। उस वक्त उम्मीद की गई थी सशक्त विपक्ष मोदी को काबू में रखने में कामयाब होगा, लेकिन कांग्रेस फिर अडानी-अम्बानी के रास्ते पर आ गई और संसद में भी उसे मोदी सरकार पर अंकुश लगाने में कामयाबी नहीं मिल सकी। ताज्जुब तो इस बात का है कि कई ठोकरें खाने के बाद भी कांग्रेस सम्भल नहीं रही और बेतुके बयानों से अपनी स्थिति खुद कमजोर करती जा रही है।






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