टेस्ट क्रिकेट के स्वर्णिम युग का पटाक्षेप
रोहित शर्मा व विराट कोहली की शैली में ज़मीन-आसमान का फर्क था। कोहली जहां जुनून से भरे, उर्जा से लबरेज और लगातार बैकफुट पर गेंदबाज़ों को दबाव में लाने वाले खिलाड़ी रहे, वहीं रोहित संयम, टाइमिंग और लय...

विराट व रोहित : तकनीक, जज्बा और जुनून के पर्याय
राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
Table Of Content
- विराट व रोहित : तकनीक, जज्बा और जुनून के पर्याय
- बना रहेगा कलात्मक बल्लेबाजी का महत्व
- विराट कोहली : टेस्ट क्रिकेट का जुनून और आक्रामक नेतृत्व
- ‘ड्रा’ की बजाय ‘जीत’ की नीति
- साहस व परिपक्वता की मिसाल
- रोहित शर्मा: संघर्षपूर्ण शुरुआत के बाद धमाकेदार पारियां
- टाइमिंग व संयम सबसे बड़ी ताकत
- रणनीतिक सोच वाले कप्तान
- धोनी की तरह सीरीज के बीच संन्यास लेना चाहते थे रोहित
- कोहली और रोहित: टीम की जीत सर्वोपरि
- भारतीय क्रिकेट पर असर
भारतीय क्रिकेट के दो ध्रुव, दो महारथी— विराट कोहली और रोहित शर्मा ने हाल ही में टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेकर उस स्वर्णिम युग का पटाक्षेप कर दिया, जिसमें भारत ने विश्व पटल पर न सिर्फ क्रिकेट की शैली बदली, बल्कि अपनी मानसिकता और आत्मविश्वास से पूरी दुनिया को चकित किया। सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और वी.वी.एस. लक्ष्मण जैसे दमदार खिलाड़ियों के बाद अब एक और पीढ़ी को ‘अलविदा’ कहने का वक्त आ गया है।
बना रहेगा कलात्मक बल्लेबाजी का महत्व
भारतीय क्रिकेट में टेस्ट क्रिकेट की बुनियाद बहुत गहरी रही है। विराट और रोहित ने इस बुनियाद को नए जमाने की ऊर्जा, आक्रामकता और तकनीकी परिपक्वता से सशक्त किया। यद्यपि दोनों खिलाड़ियों ने वनडे और टी20 में भी उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कीं, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में उनकी उपस्थिति ने यह सिद्ध किया कि तकनीक, मानसिक दृढ़ता और कलात्मक बल्लेबाजी का महत्व कभी खत्म नहीं होता।
विराट कोहली : टेस्ट क्रिकेट का जुनून और आक्रामक नेतृत्व
आंकड़ों की दृष्टि से
विराट कोहली ने अपने टेस्ट करियर में 113 टेस्ट मैच खेले, जिनमें उन्होंने 29 शतक और 29 अर्धशतक सहित 8848 रन बनाए। उनका औसत 49.15 का रहा, जो किसी भी मध्यक्रम बल्लेबाज के लिए उल्लेखनीय है। लेकिन विराट की खासियत केवल रन बनाना नहीं था, बल्कि मुश्किल हालात में टीम को नेतृत्व देना, जीत का मार्ग प्रशस्त करना और विपक्षी टीम को मानसिक रूप से चुनौती देना भी था।
‘ड्रा’ की बजाय ‘जीत’ की नीति
‘आक्रामक खेल’ के जरिए कोहली ने टेस्ट क्रिकेट को एक नई पहचान दी। उन्होंने टीम को ‘ड्रॉ’ के लिए खेलने की बजाय ‘जीतने’ के लिए तैयार किया। विदेशों में ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और दक्षिण अफ्रीका में सीरीज़ जीतने की भारत की जो हिम्मत दिखी, उसमें विराट का कप्तानी शैली महत्वपूर्ण रही। उनके नेतृत्व में भारत ने 68 टेस्ट में से 40 जीते, जो किसी भारतीय कप्तान द्वारा सर्वाधिक जीत है।
साहस व परिपक्वता की मिसाल
विराट ने अपने क्रिकेट जीवन में कई उतार- चढ़ाव देखे। वर्ष 2014 में इंग्लैंड दौरे पर विराट के फॉर्म पर सवाल उठे, लेकिन उसी वर्ष ऑस्ट्रेलिया में उन्होंने चार टेस्ट में चार शतक जड़कर आलोचकों को जवाब दे दिया। 2018 में इंग्लैंड में 593 रन बनाना उनकी परिपक्वता की मिसाल था। कोहली की बैटिंग तकनीक के दो रूप दिखते हैं— शुरुआत में हाथ खोलते विराट, और बाद के वर्षों में धैर्य और चयनित आक्रामकता के साथ खेलने वाले विराट। उन्होंने अपनी शैली को समय के साथ ढाला और तकनीक में निरंतर सुधार किया।
रोहित शर्मा: संघर्षपूर्ण शुरुआत के बाद धमाकेदार पारियां
रोहित शर्मा ने वर्ष 2013 में वेस्टइंडीज के खिलाफ टेस्ट डेब्यू में दो शतक जड़े, लेकिन उसके बाद उनका टेस्ट करियर संघर्षपूर्ण रहा। मध्यम क्रम में खेलते हुए वे कई बार बाहर हुए, लेकिन 2019 में जब उन्हें टेस्ट ओपनर बनाया गया, तब जाकर असली यानि धमाकेदार रोहित उभर कर सामने आए। रोहित तनाव रहित खेल पसंद करते हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे टेस्ट खेल रहे हैं या एक दिवसीय क्रिकेट। वे सभी में एक ही तरह का अपना स्वाभाविक खेल खेलना पसंद करते हैं।
टाइमिंग व संयम सबसे बड़ी ताकत
रोहित ने 56 टेस्ट में 4137 रन बनाए, जिनमें 12 शतक और 16 अर्धशतक शामिल हैं। उनका औसत 45.22 रहा— जो कि एक ओपनर के तौर पर अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। विशेषकर उपमहाद्वीप के बाहर। टेस्ट क्रिकेट में रोहित की सबसे बड़ी ताकत रही— उनकी टाइमिंग और संयम। उन्होंने स्पिन के ख़िलाफ़ अद्वितीय महारत दिखाई, और सीमिंग पिचों पर अपने फुटवर्क में उल्लेखनीय सुधार किया।
वर्ष 2021 में इंग्लैंड दौरे पर लॉर्ड्स में 83 और ओवल में 127 रन की पारी उनकी परिपक्व बल्लेबाजी का प्रतीक है। यह वो शृंखला थी, जिसने साबित किया कि रोहित अब केवल लिमिटेड ओवर स्पेशलिस्ट नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद टेस्ट ओपनर भी हैं।
रणनीतिक सोच वाले कप्तान
जब विराट कोहली ने कप्तानी छोड़ी, तब रोहित ने टीम को संभाला। वह उतने आक्रामक नहीं थे, लेकिन बेहद रणनीतिक सोच वाले कप्तान साबित हुए। उनके नेतृत्व में भारत ने वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल तक का सफर तय किया।
धोनी की तरह सीरीज के बीच संन्यास लेना चाहते थे रोहित
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार रोहित शर्मा इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज में कप्तान के तौर पर खेलना चाहते थे और महेन्द्र सिंह धोनी की तरह सीरीज के बीच में टेस्ट से सम्मानपूर्वक विदाई चाहते थे। धोनी ने 2014 में आस्ट्रेलिया में टेस्ट सीरीज के दौरान संन्यास लिया था। हालांकि चयनकर्ताओं ने रोहित को इंग्लैंड सीरीज में खेलने का आफर दिया था, लेकिन कप्तान के तौर पर नहीं। बीसीसीआई व चयनकर्ताओं के रुख को देखते हुए रोहित शर्मा ने तत्काल ही टेस्ट क्रिकेट से संन्यास का फैसला कर लिया।
कोहली और रोहित: टीम की जीत सर्वोपरि
रोहित शर्मा व विराट कोहली की शैली में ज़मीन-आसमान का फर्क था। कोहली जहां जुनून से भरे, उर्जा से लबरेज और लगातार बैकफुट पर गेंदबाज़ों को दबाव में लाने वाले खिलाड़ी रहे, वहीं रोहित संयम, टाइमिंग और लय से खेल को नियंत्रित करने वाले बल्लेबाज़ रहे। पर दोनों में एक बात समान रही— टीम को आगे रखने की भावना। ये वो खिलाड़ी थे, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत रनों से अधिक टीम की जीत को महत्व दिया।
भारतीय क्रिकेट पर असर
‘ड्रॉ’ की बजाए ‘जीत’ की सोच की ओर अग्रसर
इन दोनों ने भारतीय क्रिकेट को पुरानी ‘टेस्ट ड्रॉ’ कराने की सोच से निकालकर ‘टेस्ट जीतने’ वाली सोच की ओर अग्रसर किया। चाहे वह ऑस्ट्रेलिया में ऐतिहासिक शृंखला जीत हो, या इंग्लैंड में चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में जूझना— रोहित और विराट दोनों ही इसका प्रमुख चेहरा रहे।
आने वाली पीढ़ी के लिए मिसाल
श्रेयस अय्यर, शुभमन गिल, यशस्वी जायसवाल जैसे युवा खिलाड़ियों ने इन्हीं की छाया में क्रिकेट सीखा है। विराट और रोहित का फोकस केवल रन बनाना नहीं था, बल्कि ड्रेसिंग रूम में अनुशासन, फिटनेस और पेशेवर संस्कृति को बढ़ावा देना था।
क्या टेस्ट क्रिकेट को झटका लगेगा?
यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि रोहित और विराट की विदाई से टेस्ट क्रिकेट कमजोर होगा। सुनील गावस्कर, दिलीप वैंगसरकर, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, सौरव गांगुली की विदाई पर भी कुछ ऐसा ही लगा था, लेकिन फिर विराट, रोहित, धोनी, जडेजा जैसे खिलाड़ियों ने भारत की ताकत को बनाए रखा। हां, यह निश्चित है कि उनके जैसा अनुभव, निरंतरता और प्रभाव जल्दी नहीं मिलता। अब जिम्मेदारी युवा खिलाड़ियों और कोचिंग स्टाफ पर है कि वे इस विरासत को संभालें और आगे बढ़ाएं।
एक युग का समापन, नए युग का आगाज
विराट कोहली और रोहित शर्मा ने टेस्ट क्रिकेट को न सिर्फ जीवित रखा, बल्कि उसे एक नई चेतना और लोकप्रियता भी दी। आज जब वे इस मंच से विदा ले रहे हैं, तो उनके आंकड़े, रिकॉर्ड्स और शॉट्स तो दर्ज हैं, पर जो चीज़ सबसे ज़्यादा याद रहेगी, वह है उनकी भावना — भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट को सर्वोच्च मानने की भावना। अब जब वे टेस्ट व्हाइट जर्सी से विदा ले चुके हैं, तो भारतीय क्रिकेट को इस विरासत की रक्षा और विकास की ज़िम्मेदारी लेनी होगी। आने वाले समय में जब कोई युवा खिलाड़ी पहली बार टेस्ट कैप पहनेगा, तो उसे यह मालूम होना चाहिए कि वह जिनके नक्श-ए-कदम पर चल रहा है, वे विराट और रोहित जैसे महारथी रहे हैं— जिन्होंने ‘टेस्ट’ को गर्व से जिया और भारत को जीतना सिखाया।






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