परिवर्तन व प्रेरणा का माध्यम है साहित्य
श्रीनाथ मोदी एक ऐसे दीपक थे, जिनकी लौ केवल बच्चों की आंखों में चमक नहीं भरती थी, वह समाज की जड़ताओं को भी पिघलाने की हिम्मत रखती थी। वे केवल शब्दों के जादूगर नहीं थे, वे समाज के विवेक के जागरणकर्ता...

शब्दों का दीप: ‘किताब घर’ से समाज सुधार तक श्रीनाथ मोदी की यात्रा
बलवंत राज मेहता,
वरिष्ठ पत्रकार
श्रीनाथ मोदी एक ऐसे दीपक थे, जिनकी लौ केवल बच्चों की आंखों में चमक नहीं भरती थी, वह समाज की जड़ताओं को भी पिघलाने की हिम्मत रखती थी। वे केवल शब्दों के जादूगर नहीं थे, वे समाज के विवेक के जागरणकर्ता थे। 20 जून को उनकी 120वीं जयंती हमें याद दिलाती है कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि परिवर्तन और प्रेरणा का माध्यम होता है और श्रीनाथ मोदी इसके सबसे सुंदर उदाहरण थे।
बीसवीं सदी के प्रारंभ में, जब देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और समाज कुरीतियों से त्रस्त, तब एक युवक ने जोधपुर की गलियों में हारमोनियम लेकर बच्चों को गीत सुनाने, कहानियां सुनाने और समाज को जगाने की पहल की। वह युवक सिर्फ लेखक नहीं था, बल्कि वह एक मिशन था। श्रीनाथ मोदी ने बच्चों के लिए कहानियां लिखीं, कविताएं रचीं, व्यंग्य और संवादों से समाज को झकझोरा, और साथ ही शिक्षक के रूप में ज्ञान का दीप हर घर तक पहुंचाया।
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मूल्यों की पाठशाला थी उनकी कहानियां
जोधपुर की सांस्कृतिक फिजा में बाल साहित्य के क्षेत्र में जो प्रकाश उन्होंने फैलाया, उसकी मिसाल आज भी दी जाती है। जब बालकों के लिए गुणवत्तापूर्ण, नैतिक शिक्षा देने वाले साहित्य का अभाव था, तब उन्होंने यहां ‘किताब घर’ की स्थापना की। यह सिर्फ एक प्रकाशन संस्था नहीं थी, यह एक आंदोलन था— बचपन को दिशा देने का, किताबों को मित्र बनाने का, और अक्षरों से संस्कार रचने का। उनकी कहानियां केवल मनोरंजन नहीं थीं, वे मूल्यों की पाठशाला थीं। उनके पात्र हंसते भी थे, सोचते भी थे, और बच्चे उनके साथ जीवन जीना सीखते थे।
लेकिन मोदी जी की भूमिका केवल बाल साहित्यकार तक सीमित नहीं थी। वे एक सजग और निर्भीक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने मृत्यु भोज, बाल विवाह, जात-पांत और अंधविश्वास जैसी रूढ़ियों पर सीधा प्रहार किया। एक ओर वे बच्चों को हंसाते थे, तो दूसरी ओर बड़े-बूढ़ों को समाज के प्रश्नों से जूझने की प्रेरणा देते थे। उनके लिखे नाटक गांव-गांव में खेले गए, जहां वे इन कुप्रथाओं के खिलाफ सहज भाषा में संदेश देते थे। उन्होंने ग्राम सुधार को अपनी लेखनी और रंगमंच दोनों से गहरे जोड़ा। जब लोग चुप रहते थे, तब मोदी जी हारमोनियम लेकर मोहल्लों में निकलते और गीतों के माध्यम से जनजागरण करते। यही कारण है कि उन्हें सिर्फ लेखक नहीं, समाज-शिल्पी कहना अधिक उपयुक्त है।
‘मैं शिक्षा देता हूं, सलामी नहीं’
शिक्षक के रूप में भी उनका दृष्टिकोण बिल्कुल विशिष्ट था। वे विद्यार्थियों को मोम समझते थे और स्वयं को उस दीये के रूप में प्रस्तुत करते थे, जो उन्हें आकार देने के लिए स्वयं को जलाता है। उनके पढ़ाने का तरीका अनुभवपरक और प्रेरणात्मक था। वे मानते थे कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री या परीक्षा में अच्छे अंक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और व्यक्तिगत विवेक की वृद्धि होनी चाहिए। यही कारण था कि उन्होंने स्वयं बच्चों के लिए अंकगणित की सरल और सृजनात्मक पुस्तकें लिखीं, जो आज तक अप्रकाशित हैं। इन पुस्तकों में उन्होंने न केवल सूत्र दिए, बल्कि सोचने की शैली भी सिखाई। उनकी निर्भीकता का परिचय उस समय मिला, जब एक अंग्रेज अफसर ए.पी. काक्स ने स्कूल निरीक्षण के दौरान उनसे खड़े होकर सलामी देने को कहा। श्रीनाथ मोदी ने विनम्र पर दृढ़ स्वर में उत्तर दिया— “मैं शिक्षा देता हूं, सलामी नहीं।” यह कथन मात्र शब्द नहीं थे, यह उस युग में स्वाभिमान की मशाल थी, जिसने शिक्षकों की गरिमा को परिभाषित किया।
उनकी प्रतिभा और लेखनी इतनी तीव्र थी कि ब्रिटिश हुकूमत तक भयभीत हो उठी। उनकी कुछ कृतियां, विशेषकर व्यंग्य-नाटक, जिनमें शासन, समाज और सामंती सोच की आलोचना थी, कभी प्रकाशित नहीं हो सकीं। यह पीड़ा उनके भीतर थी। वे जानते थे कि उनकी रचनाएं समाज को दिशा दे सकती हैं, पर सत्ता को असहज करती थीं। फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी, उन्होंने लेखनी को रोका नहीं, भले ही वह पाठकों तक पूरी तरह नहीं पहुंच सकी। उनकी अप्रकाशित रचनाएं आज भी हमारी सांस्कृतिक धरोहर की अमूल्य निधि हैं, जो आने वाले शोधकर्ताओं के लिए पथप्रदर्शक बनेंगी।
श्रीनाथ मोदी की कल्पना और रचना-शक्ति ने सिर्फ कागज पर नहीं, समाज की नसों में संवेदना और चेतना प्रवाहित की। उन्होंने बसंत पुस्तक मेला जैसे आयोजनों के माध्यम से साहित्य को त्योहार बना दिया। वह पुस्तक मेला केवल किताबों की बिक्री का आयोजन नहीं था, वह विचारों का उत्सव था, बच्चों की कल्पनाओं का रंगमंच था। उस मेले में जब श्रीनाथ मोदी की पुस्तकें सजतीं, तो बच्चों की आंखों में चमक और मन में उत्सुकता भर जाती।
राह दिखाती शब्दों की विरासत
उनकी जीवन यात्रा एक लंबा आंदोलन थी, बिना किसी पद, पुरस्कार या प्रचार के। आज, जब हम उनकी 120वीं जयंती पर उन्हें स्मरण कर रहे हैं, यह केवल किसी साहित्यकार की पुण्यतिथि नहीं है, यह आत्मचिंतन का अवसर है। हम सबको यह सोचने का समय है कि क्या हम उस दीपक की लौ को आगे बढ़ा पा रहे हैं? श्रीनाथ मोदी जोधपुर की साहित्यिक और सामाजिक चेतना में वैसा ही स्थान रखते हैं, जैसा मरुधरा में कोई मीठा, शीतल कुआं— दुर्लभ, किंतु जीवनदायी। वे अपने पीछे शब्दों की जो विरासत छोड़ गए हैं, वह आज भी हमें राह दिखाती है। हमें जरूरत है उस शब्द-दीप को फिर से जलाने की, उस साहसिक लेखनी को फिर से पढ़ने की, और उस प्रेरक व्यक्तित्व को नई पीढ़ी से परिचित कराने की।
यह जयंती सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं है— यह एक जिम्मेदारी है, कि श्रीनाथ मोदी के स्वप्नों का समाज हम रच सकें, जहां हर बच्चा पढ़े, समझे और समाज को बदलने का साहस रखे। यही उनकी सच्ची स्मृति होगी, यही होगा एक शब्द-दीप को यथार्थ की ज्योति में बदलना।






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