राष्ट्र में फिर ‘महाराष्ट्र’
यदि एनसीपी के दोनों गुटों का विलय हो जाता है तो इसका न सिर्फ महाराष्ट्र, बल्कि देश की राजनीति पर भी साफ असर दिखेगा। कारण कि एक हुई एनसीपी भाजपानीत एनडीए का हिस्सा बनती है तो मोदी सरकार का बहुमत 300...

एनसीपी के शरद-अजित धड़ों में विलय की चर्चाओं से सियासी खलबली
सुरेश व्यास,
वरिष्ठ पत्रकार
राजनीति वैसे तो अनिश्चितता का खेल है। इसमें जो दिखता है वो होता नहीं और जो होता है, वो दिखता नहीं। देश के राजनीति में ऐसे कई किस्से भरे पड़े हैं। इस बार एक अजीब सी बात सामने आ रही है। पूरे मुल्क में जहां ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कहीं अमरीकी राष्ट्रपति की दखलंदाजी, कहीं सरकार की ओर से विदेशों को भेजे गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों को लेकर राजनीति हावी है, तो कहीं सत्ता और प्रतिपक्ष में ऑपरेशन सिंदूर को लेकर संसद का विशेष सत्र बुलाए जाने की मांग को लेकर सियायत गर्म है। हालांकि सरकार ने विशेष सत्र बुलाने से इनकार कर दिया है, लेकिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ‘नरेन्दर….सरेंडर’ वाले बयान की आंच अभी भी सुलग रही है।
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ऐसे में देश के अहम राज्य महाराष्ट्र की राजनीति में कुछ अलग ही पक रहा है। वहां सियासत के धुरंधर खिलाड़ी शरद पवार की बनाई पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के फिर एक होने, यानी शरद पवार और भाजपा को सहयोग दे रहे उनके भतीजे अजीत पवार के धड़ों के फिर एक होने की चर्चा ने असमंजस की स्थिति बना रखी है। यदि एनसीपी के दोनों गुटों का विलय हो जाता है तो इसका न सिर्फ महाराष्ट्र, बल्कि देश की राजनीति पर भी साफ असर दिखेगा। कारण कि एक हुई एनसीपी भाजपानीत एनडीए का हिस्सा बनती है तो मोदी सरकार का बहुमत 300 के पार पहुंच जाएगा और विपक्ष के इंडी गठबंधन में यह कदम ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है।
महाराष्ट्र की राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि आगामी 10 जून को एनसीपी का स्थापना दिवस है। इस दिन ऐसा कुछ हो सकता है। हाल के कुछ दृश्यों ने इसके संकेत दिए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है चाचा-भतीजा (शरद-अजीत) का चार दिन में दो बार एक ही मंच पर दिखाई देना। कभी शरद के लेफ्ट हैंड रहे भुजबल को एनसीपी कोटे से महाराष्ट्र की देवेंद्र फड़नवीस सरकार में अकेले काबिना मंत्री बनाए जाने और आने वाले दिनों में महाराष्ट्र में सहकारी संस्थाओं के चुनावों को लेकर दोनों धड़ों के एनसीपी नेताओं की बढ़ी हुई धड़कनों से भी सम्भावित विलय की बात को बल मिल रहा है। शरद पवार ने भी यह कहकर चर्चाओं को जिंदा रखा कि इस बारे में फैसला उनकी सांसद बेटी सुप्रिया सुले पर निर्भर करेगी। इधर, हाल ही बहुदलीय प्रतिनिधिमंडल की विदेश यात्रा के बाद लौटी सुप्रिया ने फिलहाल विलय की सम्भावनाओं को खारिज करते हुए कहा कि ऐसा कुछ नहीं है।
दो साल पहले बिखराव
दरअसल, एनसीपी पर कभी शरद पवार का एक छत्र राज रहा है, लेकिन जुलाई 2023 में भतीजे अजीत ने चाचा से बगावत कर ली और महाराष्ट्र में दो फाड़ हुई शिवसेना के एकनाथ शिंदे और भाजपा की सरकार में उनका गुट शामिल हो गया। इसके बाद से मौके-बमौके एनसीपी के दोनों धड़ों के एक होने की चर्चा उठती रही है, लेकिन इस बार महाराष्ट्र कॉ-ऑपरेटिव बैंक की संगोष्ठी में चाचा-भतीजे ने न सिर्फ मंच साझा किया, बल्कि कनबत्तियां भी हुई। इस कार्यक्रम में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गड़करी, मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस व उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे भी शामिल हुए। इससे विलय की चर्चाएं एकाएक तेज हो गई। इससे पहले रयत शिक्षण संस्था की आमसभा में चाचा-भतीजे ने साथ रहकर पहलगाम आतंकी हमले के पीड़ितों को श्रद्धांजलि अर्पित की थी।
विधायकों में हरारत
इससे एक दिन पहले ही शरद पवार गुट के एनसीपी विधायक उत्तम जानकर ने दोनों गुटों के विलय की वकालात करते हुए कहा था कि उनकी सोलापुर के चार विधायकों के साथ राज्य इकाई के मुखियाजयंत पाटिल से इस मुद्दे पर चर्चा हो चुकी है और पाटिल ने शरद पवार को हमारी भावनाओं से अवगत भी करवा दिया है। साथ ही उन्होंने विलय के बाद भाजपा गठबंधन में शामिल होने पर भी जोर दिया, ताकि जमीनी कार्यकर्ता एकजुट होकर काम करे और पार्टी को फिर मजबूती मिल सके।
नेतृत्व पर फंसी है बात
सियासी पंडितों के अनुसार विलय की बात में नेतृत्व का पेंच फंसा है। शरद अपनी बेटी सुप्रिया को कमान सौंपना चाहते हैं और अजित को यह मंजूर नहीं है। वे चाहते हैं कि चाचा शरद उन्हें पार्टी का उत्तराधिकारी घोषित करें। इसके अलावा विलय के बाद भाजपा और शिवसेना (शिंदे) के साथ रहने या न रहने को लेकर भी फंसी हुई है। अजित गुट को सत्ता में होने का सीधा फायदा मिल रहा है और इधर शरद गुट के विधायक बंटे हुए हैं कि भाजपा-शिवसेना सरकार का साथ दिया जाए या नहीं। ऐसे में राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी माने जाने वाले शरद पंवार भी कोई फैसला नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें अपने बेटी के सियासी भविष्य की चिंता सता रही है तो दिनोंदिन कमजोर होता जनाधार भी दुविधा में डाले हुए है।
देश की सियासत पर असर
एनसीपी के विलय को लेकर चाचा-भतीजा और भाई-बहन में क्या पक रहा है, यह साफ नहीं है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि यदि विलय हो गया तो महाराष्ट्र के साथ साथ देश की राजनीति पर भी इसके दूरगामी परिणाम होंगे। भाजपा और खासकर नरेंद्र मोदी भी इसे लेकर अंदरखाने लम्बे समय से दिलचस्पी है। मोदी की इच्छा केंद्र में और मजबूती के साथ शेष कार्यकाल में खेलने की है तो वे मानते हैं कि एनसीपी का एनडीए में मिलना विपक्ष की ताकत को केवल महाराष्ट्र ही नहीं, देश के अन्य हिस्सों में भी कमजोर करेगा। शायद, यही वजह रही कि हाल ही ऑपरेशन सिंदूर के बाद विदेशों में भेजे गए बहुदलीय प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व सौंपते हुए कांग्रेस के शशि थरूर के साथ साथ सुप्रिया सुले को भी विशेष अहमियत दी गई। मोदी सरकार चाहती है कि विलय हो जाए तो आठ सांसदों वाली एनसीपी (शरद) सरकार में शामिल हों और यदि न भी हो तो बाहर से समर्थन दे। इससे मोदी परोक्ष रूप से बिहार में नीतीश कुमार की ताकत कुछ कम करने में भी कामयाब हो सकते हैं। दूसरी ओर, शरद पवार की भी इच्छा है कि विलय हो जाए तो उनकी बेटी सुप्रिया को केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान मिलने से उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित कर दिया जाए और महाराष्ट्र में विरासत अजित सम्भाले।






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