इंतजार..
एक लघु कथा- संतोष जी के न आने से बड़ी दिक्कत हुई। मगर मुझे लगा ऐसी स्थिति में उनकी जगह किसी और को रखना भी ठीक नहीं, जबकि उनकी समधन काम मांगने आ गई थी। दो और औरतें भी चाह रही थीं कि उनकी जगह उनको काम...

डॉ. पद्मजा शर्मा,
वरिष्ठ साहित्यकार
मेरे पति डॉक्टर हैं। मैं कॉलेज में अध्यापन करती हूं। दो बच्चे हैं जो स्कूल जाते हैं।
दो साल से सहायिका के रूप में संतोष जी मेरे यहां काम कर रही हैं। पिछले साल संतोष जी की तनख्वाह बढ़ा दी थी। इस बार फिर वे बोली- मेरी तनख्वाह बढाई जाए। बाजार बहुत महंगा हो गया है।
मैंने उनकी तनख्वाह फिर बढ़ा दी, मगर वे अब भी संतुष्ट नहीं थी। मैंने कहा- संतोष जी, देखिए आप महीने में दस तो छुट्टी कर लेती हैं। कभी आधा दिन बाद चली जाती हैं। कभी समय पर आती नहीं। फिर भी मैं तनख्वाह बढ़ाती जा रही हूं, अब और नहीं बढ़ा सकती।
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संतोष जी मुझे धमकी देती हुई सी बोली- मैडम, अगले महीने आप कोई और सहायिका ढूंढ लें। मुझे आपके यहां काम नहीं करना।
मैंने कहा- अच्छा किया जो आपने बता दिया।
चार-पांच दिन बाद ही संतोष जी ने फिर छुट्टी ले ली। कहने लगी- बुखार आ रहा है।
मैंने कहा- कोई बात नहीं, जब ठीक हो जाओ आ जाना।
वे चार दिन नहीं आईं। मैंने उन्हें फोन किया- संतोष जी क्या बात है?
उनका बुझा- बुझा स्वर था- मैडम, बुखार उतर जाता है, फिर चढ़ जाता है और पेट में दर्द भी है।
मैंने कहा- एक बार यहां घर आ जाओ और डॉक्टर साहब को भी दिखा दो।
वह बोलीं- मैडम, आप तो कहती हैं वे चमड़ी के डॉक्टर हैं।
मैंने कहा- वे एमबीबीएस तो कर ही चुके। राय तो दे ही सकते हैं। हो सकता है आपकी बीमारी ही पकड़ में न आई हो डॉक्टर को। ऐसे में दवा लगेगी कैसे?
वे मेरे पास घर आ गई। मैंने इनको सारी बात बताई। इन्होंने कहा- बुखार के लिए दवा देता हूं, मगर इनको कहो पेट की सोनोग्राफी करवाएं। मुझे कुछ और बीमारी लगती है।
मैंने कहा- आप जांच के बारे में लिख दीजिए।
इन्होंने पर्चे पर लिख दिया।
मैंने कहा- संतोष जी चलिए, आपके साथ मैं जांच केंद्र चलती हूं।
हमने जांच करवाई। पता चला लीवर में रस्सी भरी है। उन्हें बड़े अस्पताल लेकर गई। वहां इलाज करवाया। पहले तो मवाद सूखने की दवा दी, फिर मवाद निकलवाना पड़ा।
अब संतोष जी दवा ले रही हैं। इस सबमें लगभग डेढ़ महीना लग गया। संतोष जी अपने घर पर ही हैं। इलाज ले रही हैं। बीच- बीच में मैं उनका हाल-चाल पूछ लेती। वे ठीक हो रही हैं।
संतोष जी के न आने से बड़ी दिक्कत हुई। मगर मुझे लगा ऐसी स्थिति में उनकी जगह किसी और को रखना भी ठीक नहीं, जबकि उनकी समधन काम मांगने आ गई थी। दो और औरतें भी चाह रही थीं कि उनकी जगह उनको काम पर रख लूं। संतोष जी की आर्थिक स्थिति कमजोर और ऊपर से बीमार। मुझे लगा उनसे बात करने के बाद ही अगला कदम उठाऊंगी।
आज अचानक संतोष जी का ही फोन आ गया। वे कह रही थीं- मैडम, आपका धन्यवाद। मैं आपके घर न आती, डॉक्टर साहब को न दिखाती तो जाने क्या गत होती मेरी। बड़े अस्पताल वाले डॉक्टर साहब आज कह रहे थे, अगर आप सोनोग्राफी न करवाती तो पता ही नहीं चलता बीमारी का। ये अंदर ही अंदर बढ़ती जाती और जाने किस रूप में बाहर आती। भगवान आपका भला करे।
मैंने कहा- संतोष जी आपकी किस्मत अच्छी थी। आपने मेरा कहना मानकर डॉक्टर साहब को दिखाया तो आप बच गई।
वे उदासी के साथ धीरे से बोली- मैडम, काम पर किसे रखा?
मैंने कहा- किसी को नहीं।
उन्होंने पूछा- फिर एक महीना कैसे निकाला?
मैंने कहा- निकाल दिया, जैसे- तैसे। अब रख लेंगे।
वे बोलीं- मैडम, मैं आज अस्पताल दिखाकर आई हूं डॉक्टर साहब को। उन्होंने सोनोग्राफी देखकर कहा है अब मैं काम पर आ सकती हूं। एक तारीख से मैं ही काम पर आ रही हूं।
मैंने कहा- मगर आपको तो काम छोड़ना ही था।
संतोष जी लगभग रोते हुए बोलीं- मैडम, कोई बावला ही होगा जो ऐसा घर छोड़ेगा, जहां उसे खाना, कपड़ा, इज्जत, इलाज और सही राय मिलती है। आप लोगों ने मेरी जान बचाई है। डॉक्टर साहब तो मेरे लिए भगवान हैं। आप मुझे नहीं रखना चाहेंगी तो भी मैं आपके यहीं काम करूंगी।
मैंने कहा- घर को आपका इंतजार है।
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