वॉर से ज्यादा अचूक स्ट्रैटेजिक वार
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए बर्बर आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम देने के लिए 15 दिनों का समय लिया। इस दौरान दुनियाभर के सवाल भारत की सरकार और सेना पर उठते रहे, लेकिन...

ऑपरेशन सिंदूर के बाद नीति-रणनीति को प्राथमिकता
राजेश कसेरा,
वरिष्ठ पत्रकार
जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए बर्बर आतंकी हमले के बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर को अंजाम देने के लिए 15 दिनों का समय लिया। इस दौरान दुनियाभर के सवाल भारत की सरकार और सेना पर उठते रहे, लेकिन आतंक और आतंक के आकाओं को मिट्टी में मिलाने का काम ठोस नीति और रणनीति को तैयार करने के बाद 7 और 8 मई की आधी रात को पूरा किया गया। इससे पहले भारत की सरकार ने डिप्लोमैटिक स्ट्राइक यानी कूटनीतिक प्रहार पर प्राथमिकता के साथ काम किया और सीजफायर के बाद भी आज तक उसे जारी रखा। आगे भी भारत सरकार के स्पष्ट संकेत दिख रहे हैं कि वह पाकिस्तान, तुर्किए, चीन, बांग्लादेश और यहां तक की अमेरिका को भी डिप्लोमैटिक स्ट्राइक के जरिए ही कड़ा संदेश और जवाब देगा।
रूस और यूक्रेन में करीब सवा तीन साल से छिड़े युद्ध और इजराइल-हमास के बीच डेढ़ साल से अधिक समय से जारी संघर्ष के बाद दुनियाभर में जो हालात बने, उससे सबक लेते हुए भारत ने अपने दुश्मनों पर सीधे वार करने के बजाय कूटनीतिक तरीके से उनको घेरने की सटीक और कारगर योजना बनाई। इसका बड़ा असर पाकिस्तान को दुनिया में बेनकाब करने के लिए भेजे गए सांसदों के डेलिगेशन के रूप में सामने आया। भारत के इस कदम ने दुनिया को भी नई राह दिखाई कि सिर्फ हथियारों के दम पर युद्ध नहीं जीते जा सकते। दो देशों के बीच होने वाले युद्धों में तीसरा देश या अन्य देश केवल अपने हित भांपकर साथ या विरोध में खड़ा हो सकता है। जैसा अमेरिका बरसों से करता आया है। भारत-पाकिस्तान के बीच उपजे तनाव में भी अमेरिका ने अपना हित साधा। खुद को श्रेष्ठतम साबित करने की दौड़ में इस बार वह भी पीछे छूट गया और बेनकाब भी हो गया।
इसलिए डेलिगेशन डिप्लोमैसी दिखी असरकारी
भारत ने इसलिए डेलिगेशन डिप्लोमैसी का दांव खेला, क्योंकि संघर्ष के मोर्चे पर हमसे पिछड़ने के बावजूद पाकिस्तान ने दुनिया में अपनी जीत की झूठी खबर फैलाई। इसकी पुष्टि भारत के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने भी की। उन्होंने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान देश की सेना का 15 फीसदी समय झूठी और फर्जी खबरों का जवाब देने में लगा। इस कारण से भारत को यह कूटनीतिक कदम उठाना पड़ा। इसके तहत हमारे नेताओं ने विश्व समुदाय को बताया कि हमारी लड़ाई पाकिस्तान या कश्मीर पर नहीं, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ है। आतंकवाद वैश्विक समस्या है और दुनिया के कई देश अपने-अपने स्तरों पर इसका सामना कर रहे हैं। ऐसे में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरेपन से काम नहीं चलेगा। इस पर सुविधाजनक ढंग से कदम उठाने या पक्ष लेने से काम नहीं चलेगा। इसके विरुद्ध दुनिया को एकजुट होना होगा। विभिन्न देशों की प्रतिक्रिया से हमारे कूटनीतिक अभियान की सफलता का पता चल जाता है। जापान के विदेश मंत्री ने भारत के कदम का समर्थन करते हुए कहा कि आतंकवाद से कोई समझौता नहीं होना चाहिए और भारत को आत्मरक्षा का अधिकार है। उन्होंने यह तक कहा कि पाकिस्तान को जिम्मेदार देश बनाना पड़ेगा। ऐसे ही संयुक्त अरब अमीरात के मंत्री ने भारत के प्रति स्पष्ट समर्थन को दोहराते हुए कहा कि भारत और संयुक्त अरब अमीरात आतंकवाद से मिलकर लड़ेंगे तथा उनका देश भारत के साथ हमेशा खड़ा रहेगा।
खाड़ी के देश भी भारत के साथ हुए
खाड़ी देशों का आतंकवाद पर भारत को मौन या स्पष्ट समर्थन पाकिस्तान के लिए तमाचे की तरह है। वहीं इटली ने द्विपक्षीय सहयोग की पेशकश की तो इंडनेशिया ने अपना समर्थन दिया। दक्षिण अफ्रीका ने आतंकवाद पर भारत की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी की सराहना की, जबकि फ्रांस ने इस लड़ाई में भारत के साथ एकजुटता की बात दोहराई। सिएरा लियोन पहला देश था, जिसकी संसद ने पहलगाम आतंकी हमले में जान गंवाने वालों की स्मृति में मौन रखा। भारत के कूटनीतिक अभियान की सफलता को कोलंबिया के उदाहरण से बेहतर समझा जा सकता है। कोलंबिया ने पहले भारतीय कार्रवाई में मारे गए पाकिस्तानी आतंकवादियों के प्रति संवेदना जताई थी, लेकिन शशि थरूर ने कोलंबिया की उस टिप्पणी की निंदा की, तब उस देश ने तत्काल पाकिस्तान के बारे में अपना बयान वापस ले लिया।
कामयाब रहा भारत का मिशन
विश्व समुदाय को भारत यह समझाने में सफल रहा कि उसको आत्मरक्षा का अधिकार है। पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई सोच-समझ कर की गई और उसको सख्त संदेश देने में भारत सफल रहा। जिन देशों में हमारा प्रतिनिधिमंडल गया, वहां भारतीय समुदाय के लोग बड़ी संख्या में हैं। इन सबसे संवाद का भी कूटनीतिक स्तर पर अनुकूल और प्रभावी असर दिखा। कई देशों में तो भारतीय मूल के लोग सांसद और सरकार में मंत्री तक हैं। इससे भी आतंकवाद के खिलाफ भारत के सख्त रूख को समर्थन मिला।
इस लड़ाई को लंबे लड़ना होगा, अवसरों पर नहीं
आतंकवाद के खिलाफ अपनी नीतियों के बारे में बताने का कार्यक्रम अचानक और कभी-कभी नहीं, बल्कि लगातार होना चाहिए। तभी भारत दुनिया को बेहतर तरीके से सच बता सकेगा। सूचना के इस युग में महत्व सच का नहीं, बल्कि परसेप्शन यानी धारणा का है। इस जंग में पाकिस्तान तो झूठा नैरेटिव फैलाकर अपनी मंशा में कामयाब हो जाता। चीन भी झूठा नैरेटिव गढ़ने का उस्ताद है। तुर्किये भी यही करता है। ऐसे में झूठी धारणाओं के खिलाफ भारत को सतत अभियान चलाना होगा। कूटनीतिक अभियान के अलावा तुर्किये और चीन के बहिष्कार का जो अभियान शुरू किया, उसे और आगे ले जाना होगा, जिससे कि दुनिया को पता चल सके कि ये लड़ाई वहां की सरकार या नेताओं की नहीं, देश की है। हमारे खिलाफ आतंकवाद के पक्ष में खुलेआम खड़े होने वाले देशों के साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहिए। उन्हें अपने देश में लाभ कमाने का अवसर नहीं देना चाहिए। एडीबी, एफएटीएफ और आईएमएफ जैसी विश्व संस्थाओं को भी दुनिया का समर्थन लेकर भारत को पाकिस्तान की असलियत बताने पर बड़ा काम करना होगा। उनको कहना होगा कि आतंकवाद के प्रायोजक को आर्थिक मदद की नहीं, बल्कि सख्त दंड देने की जरूरत है। आतंकवाद के खिलाफ यह लड़ाई लंबे समय तक और कई मोर्चों पर लड़नी होगी।






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