गुजरात के दो आकाश… जो कभी लौटे नहीं
गुजरात ने अपने दो पुत्रों को बादलों के रास्ते विदा किया, मगर वापस न ला सका।

आकाश की छाती फाड़कर उड़ान भरना… ये हौसलों का काम होता है।
पर जब वही आकाश दो बार चुपचाप निगल जाए— एक बार युद्ध की आग में और दूसरी बार त्रासदी की लपटों में। तब समझ आता है कि गुजरात ने अपने दो पुत्रों को बादलों के रास्ते विदा किया, मगर वापस न ला सका।
1965 का साल…
बलवंतराय मेहता, गुजरात के दूसरे मुख्यमंत्री, पंचायती राज के जनक, देश के लोकतांत्रिक स्वप्न की आत्मा।
जब पाकिस्तान से युद्ध चल रहा था, तब वो शांति का संदेश लेकर कच्छ की सीमाओं तक निकले थे।
पर मेघों से बरसात नहीं, गोलियां बरसीं।
एक पाकिस्तानी विमान ने उनकी उड़ान को आग में बदल दिया।
देश ने एक नेता नहीं, एक युग खोया था।
“जो जले वो दीया था, जो बुझा वो दिशा थी।”
और अब 12 जून 2025…
फिर एक उड़ान, फिर एक मुख्यमंत्री…
विजय रूपाणी, पूर्व मुख्यमंत्री, एक पिता, एक नागरिक— अपनी बेटी से मिलने निकले थे।
पर समय ने फिर वही पृष्ठ खोला।
हवाई जहाज़ फिर गिरा— इस बार अहमदाबाद के एक हॉस्टल की छत पर।
और रूपाणी जी भी अब उन्हीं बादलों के साए में अमर हो गए, जहां मेहता जी पहले से मौजूद थे।
इतिहास में बहुत कम जगहें हैं जहां राजनीति और पितृत्व, सेवा और स्नेह, आकाश और अग्नि— एक साथ मिलते हैं।
गुजरात का आकाश ऐसी ही दो कहानियों का साक्षी है।
एक ने युद्ध की लपटों में प्राण दिए…
दूसरे ने दुर्घटना की विभीषिका में।
“जिसे जाना होता है, उसे रास्ता नहीं रोकता — सिर्फ उड़ान बदल जाती है।”
गुजरात अब एक बार फिर मौन है।
न वो 1965 की गर्जना सुनाई दे रही है,
न आज की आग बुझी है।
बस एक ही गूंज बाकी है:
वो जो आकाश से गए,
अब वहीं सितारे बनकर देख रहे हैं —
हमारी धरती की बेचैनी,
हमारे दुःख की ऊंचाई।






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