दवा, न कीमो… सिर्फ रोशनी से कैंसर का इलाज!
भारत में हर साल 15 लाख से ज्यादा नए कैंसर मरीज सामने आते हैं और दुर्भाग्यवश, उनमें से 70% इलाज शुरू होने से पहले ही गंभीर अवस्था में पहुंच जाते...

✍️ राकेश गांधी,
वरिष्ठ पत्रकार
विज्ञान ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि ‘प्रकाश’ सिर्फ अंधकार को ही नहीं मिटाता, बल्कि मृत्यु से भी लोहा ले सकता है। अमेरिका की राइस यूनिवर्सिटी और उसके सहयोगी संस्थानों ने हाल ही में एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसमें निकट-अवरक्त प्रकाश (Near-Infrared Light) की मदद से कैंसर कोशिकाएं नष्ट की जा सकती हैं और वह भी बिना कीमोथेरेपी, रेडिएशन या सर्जरी के।
कैसे काम करती है ‘मॉलिक्यूलर जैकहैमरिंग’ तकनीक?
इस प्रक्रिया में एमिनोसाइनिन नामक डाई अणुओं को कैंसर कोशिकाओं से जोड़ा जाता है। जैसे ही उन पर विशेष प्रकार का प्रकाश डाला जाता है, ये अणु तीव्र कम्पन करने लगते हैं और इतने शक्तिशाली हो जाते हैं कि कैंसर कोशिका की झिल्ली को फाड़ देते हैं, जैसे कोई सूक्ष्म हथौड़ा उसे भीतर से तोड़ रहा हो। वैज्ञानिकों ने इस क्रिया को नाम दिया है— ‘मॉलिक्यूलर जैकहैमरिंग’।
प्रयोगशाला में यह तकनीक 99 प्रतिशत कैंसर कोशिकाएं नष्ट कर चुकी है और चूहों पर परीक्षणों में आधे से अधिक मामलों में कैंसर पूरी तरह समाप्त हो गया, वो भी बिना किसी दवा, सर्जरी या कीमोथेरेपी के।
ये भी पढ़ें-
एक तिहाई आबादी पर ‘रईसी तोंद’ का संकट – राजस्थान टुडे
हर साल एक करोड़ लोगों की जान ले रहा है कैंसर
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार, हर वर्ष दुनियाभर में करीब एक करोड़ लोग कैंसर से मरते हैं, जिनमें से 9 लाख से अधिक मौतें अकेले भारत में होती हैं। भारत में हर साल 15 लाख से ज्यादा नए कैंसर मरीज सामने आते हैं और दुर्भाग्यवश, उनमें से 70% इलाज शुरू होने से पहले ही गंभीर अवस्था में पहुंच जाते हैं।
कैंसर के कारण सबको पता हैं, फिर रोकथाम क्यों नहीं?
बीड़ी, सिगरेट, गुटखा जैसे तंबाकू उत्पाद भारत में कैंसर से होने वाली मौतों के 35 से 40 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। शराब का अत्यधिक सेवन मुख और यकृत कैंसर को बढ़ा रहा है। इसके अलावा फास्ट फूड, प्रोसेस्ड भोजन, वायु प्रदूषण, कीटनाशकों से युक्त अनाज, माइक्रोप्लास्टिक और रसायनयुक्त सौंदर्य प्रसाधनों का उपयोग भी गंभीर खतरे हैं।
सरकारें जानती हैं, फिर भी क्यों चुप हैं?
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR), एम्स जैसे संस्थान वर्षों से इन खतरों को लेकर चेतावनी देते आ रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद:
– तंबाकू उत्पाद आसानी से उपलब्ध हैं
– शराब को “राजस्व का स्रोत” बताकर लाइसेंस बढ़ाए जा रहे हैं
– फास्ट फूड कंपनियों के विज्ञापन बच्चों के कार्टून चैनलों तक पर दिखते हैं
ये सही है कि इनसे सरकारों को हजारों करोड़ रुपए का कर राजस्व मिलता होगा, लेकिन यह कैसा कर है जो जनता के स्वास्थ्य को गिरवी रखकर वसूला जा रहा है?
रोकथाम के बिना कोई उपचार पूरी तरह सफल नहीं
‘प्रकाश आधारित कैंसर उपचार’ एक बेहद आशाजनक उपलब्धि है। लेकिन जब तक तंबाकू, शराब और रसायनजन्य प्रदूषण समाज में जड़ों की तरह जमे रहेंगे, तब तक यह किरण सिर्फ कुछ सौभाग्यशाली लोगों तक ही पहुंचेगी। यह तकनीक अभी प्रयोगशाला और चूहे जैसे प्रारंभिक परीक्षणों की अवस्था में है, लेकिन वैज्ञानिक इसे मानव परीक्षणों के लिए तैयार कर रहे हैं। अगर सब कुछ अनुकूल रहा, तो आने वाले वर्षों में यह तकनीक कैंसर चिकित्सा की मुख्यधारा बन सकती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषताएं होंगी, कम लागत, कम दर्द और तेज़ असर।
भारत क्या करे? समाधान की दिशा में तीन ठोस कदम
भारत जैसे देश को चाहिए कि:
– इस तकनीक से जुड़े अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों और संस्थानों से साझेदारी करे
– कोविड-19 वैक्सीन की तरह इसका स्थानीय संस्करण विकसित करे
– तंबाकू, शराब, रसायनयुक्त खाद्य और सौंदर्य प्रसाधनों पर नीति-स्तर पर सख्त रोक लगाए
– केवल इलाज ही नहीं, जनजागरूकता, स्क्रीनिंग, जीवनशैली सुधार और प्राथमिक रोकथाम को भी समान प्राथमिकता दी जाए।
यह सिर्फ तकनीक नहीं, समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है
यह नई तकनीक चिकित्सा क्षेत्र में क्रांतिकारी हो सकती है, लेकिन यह केवल डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं है। यह एक नीतिगत, नैतिक और सामाजिक चुनौती भी है। वैज्ञानिकों ने अपने हिस्से की ‘प्रकाश’ भेज दी है। अब ज़िम्मेदारी हमारी है। क्या हम आंखें खोलेंगे या अंधकार से समझौता कर लेंगे? कैंसर से लड़ाई सिर्फ अस्पतालों की नहीं- यह रसोई, दफ्तर, नीति, विज्ञापन और समाज की भी है। कहीं ऐसा न हो कि विज्ञान ‘प्रकाश’ दे और समाज अपनी ‘आंखें’ बंद कर ले।






No Comment! Be the first one.