परमाणु नीति का पाखंड बेनक़ाब
IAEA की निष्क्रियता और इस्राइल के परमाणु हथियारों पर चुप्पी ने उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए...

अपनी बात
दिनेश रामावत,
प्रधान सम्पादक, राजस्थान टुडे
पश्चिम एशिया एक बार फिर खौल रहा है। ईरान और इस्राइल के बीच चले हवाई हमलों और मिसाइल हमलों की तपिश अभी थमी भी नहीं थी कि ईरान ने ऐसा दांव चल दिया, जिसने वैश्विक कूटनीति के पाखंड को नंगा कर दिया। ईरान की संसद ने भारी बहुमत से अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के साथ सहयोग निलंबित करने का फैसला कर लिया। और मज़े की बात देखिए- न तो संयुक्त राष्ट्र कुछ बोला, न तथाकथित महाशक्तियां।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके ऐलान कर दिया था कि 30,000 पाउंड के बम गिराकर उन्होंने ईरान का परमाणु कार्यक्रम तबाह कर दिया है और अब ईरान दोबारा सिर नहीं उठा पाएगा। लेकिन अगले ही हफ्ते ईरानी संसद ने जो किया- उसने न सिर्फ ट्रंप के दावे की मिट्टी पलीद कर दी, बल्कि उस IAEA की औकात भी दिखा दी जो अपने आपको परमाणु अप्रसार की सबसे बड़ी निगरानी संस्था बताता है। यह सच है कि जब ईरान की परमाणु फैसिलिटी पर इस्राइली मिसाइलें बरस रही थीं, तब IAEA का मुखिया राफेल ग्रॉसी बस ‘गहरी चिंता’ जताने तक सिमट गए। क्या किसी ने उनसे पूछा कि जिस अप्रसार संधि (NPT) के तहत ईरान उनके निरीक्षण का हिस्सा था, उसी NPT की धज्जियां उड़ाते हुए जब इस्राइल ने हमले किए, तो आप मौन क्यों रहे? क्यों उस वक्त संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का कोई आपात सत्र नहीं बुलाया गया? क्यों अमेरिका ने इसे ‘सावधानीपूर्वक किया गया आत्मरक्षा कदम’ कहकर बचाव किया?
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राजस्थान टुडे, जुलाई 2025
दुनिया जानती है कि IAEA जैसी संस्थाएं आज भी अमेरिकी हितों की कठपुतली भर हैं। जिनका एकमात्र काम है- उन्हीं देशों के खिलाफ कार्रवाई करना, जो अमेरिकी नीति के विरोधी हों। वरना क्या कारण है कि इस्राइल, जो खुद 90 से ज्यादा परमाणु हथियार रखता है और NPT का सदस्य तक नहीं है, उसके खिलाफ IAEA कभी कोई कार्रवाई नहीं करता?
ईरान ने इसी दोहरे मापदंड के खिलाफ विद्रोह किया है। और उसका यह कदम उन तमाम देशों के लिए मिसाल है, जो अब तक पश्चिमी दबाव में झुकते आए हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने जिस बेशर्मी से दुनिया के सामने ईरान का परमाणु कार्यक्रम तबाह कर देने का दावा किया, वह इतिहास में एक और अमेरिकी झूठ के तौर पर दर्ज होगा। 2003 में इराक पर हमला करते हुए भी यही झूठ बोला गया था कि सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के हथियार हैं। फिर पूरी दुनिया ने देखा- न हथियार मिले, न सबूत। मगर इराक को खंडहर बना दिया गया। अब वही खेल ईरान के साथ खेला जा रहा है। ट्रंप ने दावा किया कि बम गिराकर परमाणु साइट्स को नष्ट कर दिया गया। जबकि अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट ने खुद कहा कि नुकसान सीमित है और ईरान का परमाणु कार्यक्रम अब भी चालू है।
सवाल ये है कि अगर खुफिया एजेंसियां सच्चाई बता सकती हैं, तो वही सच्चाई जनता के सामने क्यों नहीं रखी जाती? क्यों युद्धोन्माद फैलाकर पश्चिम एशिया को बार-बार युद्ध की आग में झोंका जाता है? क्योंकि अमेरिका के सैन्य-औद्योगिक तंत्र को हथियार बेचने और क्षेत्रीय अस्थिरता बनाए रखने की आदत है। ईरान ने अब साफ कर दिया है कि जब तक उसकी परमाणु फैसिलिटी की सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जाएगी, वह IAEA को न डेटा देगा, न कैमरे लगाने देगा। यही नहीं, संसद में कई सांसदों ने यहां तक कह दिया है कि अगर स्थिति ऐसी ही रही तो ईरान NPT से भी बाहर निकल सकता है।
यह वही एनपीटी है, जिससे उत्तर कोरिया पहले ही बाहर निकलकर खुलेआम परमाणु हथियार बना चुका है। और अमेरिका उसे रोक नहीं सका। अब ईरान का ये संकेत पश्चिमी दुनिया के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है। क्योंकि अगर ईरान NPT छोड़ता है, तो पश्चिम एशिया में परमाणु होड़ की शुरुआत हो जाएगी। सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र जैसे देश भी यही रास्ता चुन सकते हैं। चीन और रूस ने भले ही अभी तक सार्वजनिक बयान न दिया हो, मगर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनका रुख जगजाहिर है। दोनों पहले भी IAEA के निर्णयों में ईरान का बचाव कर चुके हैं। संभव है, ईरान के इस फैसले को वे बैकडोर डिप्लोमेसी के ज़रिए समर्थन दे रहे हों। अगर यह ध्रुवीकरण और मजबूत होता है, तो अमेरिका-इस्राइल और पश्चिमी देशों का दबदबा टूटेगा। एक नया ‘ईस्टर्न ब्लॉक’ उभर सकता है, जिसमें ईरान, चीन, रूस और कई मध्य एशियाई देश शामिल हो सकते हैं। और उस ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा हथियार होगा- ‘पश्चिमी पाखंड की पोल खोलना’।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इस्राइल और अमेरिका खुलेआम ईरान को दोबारा हमले की धमकी दे रहे हैं। नेतन्याहू ने तो साफ कहा है कि जरूरत पड़ी तो इस्राइल फिर से हमला करेगा। ट्रंप ने भी अपनी स्वीकृति दे दी। यदि ऐसा हुआ, तो परमाणु फैसिलिटी पर हमला NPT की अंतरात्मा पर आखिरी कील साबित होगा। फिर किसी को रोकना संभव नहीं रहेगा। ईरान यदि NPT छोड़ता है, तो परमाणु हथियारों का नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो जाएगा। और जब परमाणु हथियार अनियंत्रित हाथों में पहुंचें- तो मानवता का विनाश सुनिश्चित है।
अब और नहीं : दुनिया को यह समझना होगा कि परमाणु सुरक्षा, IAEA की मुनादी और अमेरिकी पाखंड पर नहीं टिक सकती। ईरान ने जो किया, वह भले ही नियमों के खिलाफ हो, मगर उसकी पृष्ठभूमि में जिस हद तक अन्याय और पक्षपात हुआ, उसकी अनदेखी भी अब नहीं की जा सकती।
यदि विश्व समुदाय अब भी चुप बैठा रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब हर क्षेत्रीय शक्ति अपनी परमाणु ताकत बनाएगी, और तब न IAEA बचेगा, न NPT। फिर एक दिन ऐसा भी आएगा, जब दुनिया युद्ध की आग में जल उठेगी और उन मलबों पर बस यही सवाल लिखा होगा- ‘कहाँ है वह वैश्विक व्यवस्था, जिसने इंसाफ करने का वादा किया था?’






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