भारत ने संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर से किया इनकार
पहलगाम हमले को नजरअंदाज करने वाले संयुक्त बयान पर भारत ने हस्ताक्षर न करके न सिर्फ़ अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया, बल्कि चीन पाक गठजोड़ की मंशा पर भी सवाल खड़े कर...

शंघाई में रक्षा मंत्रियों की बैठक : पहलगाम हमले को नजरअंदाज करने पर जताई नाराजगी
राजस्थान टुडे- न्यूज डेस्क
पहलगाम हमले को नजरअंदाज करने वाले संयुक्त बयान पर भारत ने हस्ताक्षर न करके न सिर्फ़ अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया, बल्कि चीन-पाक गठजोड़ की मंशा पर भी सवाल खड़े कर दिए। कूटनीति के मंचों पर अक्सर औपचारिकता और सहमति की भाषा बोली जाती है, लेकिन कभी कभी चुप्पी भी अपनी एक सशक्त भाषा बन जाती है। कुछ ऐसा ही हुआ जब भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की रक्षा मंत्रियों की बैठक में संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया। इसका कारण था, उस बयान में 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले का कोई उल्लेख न होना। यह कोई साधारण आपत्ति नहीं थी, बल्कि भारत की आतंकवाद विरोधी नीति की रीढ़ को दर्शाने वाला ऐतिहासिक फैसला था।
जब सहमति खामोशी बन जाए
एससीओ की रक्षा मंत्रियों की बैठक में आमतौर पर सदस्य देश एक संयुक्त बयान पर सहमत होते हैं, जिसमें क्षेत्रीय सुरक्षा, शांति और आतंकवाद विरोधी प्रयासों का उल्लेख होता है। इस बार भी एक मसौदा तैयार किया गया, जिसमें पाकिस्तान के बलूचिस्तान में आतंकी गतिविधियों की निंदा की गई, लेकिन भारत में हाल ही में हुए आतंकी हमलों, विशेषतः पहलगाम की घटना को अनदेखा किया गया।
भारत ने इस पर आपत्ति जताई और दस्तावेज़ में संतुलित और निष्पक्ष आतंकवाद विरोधी दृष्टिकोण की मांग की। लेकिन जब बाकी सदस्य देश- विशेषकर चीन और पाकिस्तान इसके लिए तैयार नहीं हुए, तो भारत ने साफ शब्दों में उस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया।
स्पष्ट है भारत का संदेश
राजनाथ सिंह ने बैठक में दो टूक कहा, “आतंकवाद को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। इसका विरोध सार्वभौमिक होना चाहिए, न कि सुविधाजनक।”
यह वक्तव्य सिर्फ एससीओ के लिए नहीं था, बल्कि वैश्विक कूटनीति को एक स्पष्ट संदेश था—भारत अब मंच पर उपस्थिति भर से संतुष्ट नहीं, वह अपनी आवाज़ और नीतियों के सम्मान की मांग करता है।
चीन-पाक गठजोड़ का कूटनीतिक जाल
यह भी ध्यान देने योग्य है कि एससीओ में चीन और पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। ऐसे में आतंकवाद जैसे मुद्दों पर दोहरा रवैया अपनाना कोई नई बात नहीं। पाकिस्तान बार बार आतंक को “रणनीतिक उपकरण” की तरह इस्तेमाल करता आया है, जबकि चीन अक्सर पाकिस्तान की ढाल बनकर खड़ा रहता है।
बलूचिस्तान का उल्लेख करना और पहलगाम को नजरअंदाज करना, इसी रणनीति का हिस्सा था— दूसरों की पीड़ा दिखाना, अपनी जिम्मेदारी से बचना।
चुप्पी से बनी गूंज
भारत के इनकार के चलते एससीओ के इतिहास में यह दुर्लभ मौका रहा, जब कोई संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका। यह कूटनीति की भाषा में बड़ा संकेत है कि भारत अब ‘सम्मेलन के नाम पर समझौता’ नहीं करेगा।
यह घटना बताती है कि भारत सिर्फ उपस्थिति नहीं चाहता, बल्कि सार्थक भागीदारी चाहता है—जिसमें उसकी सुरक्षा चिंताओं को बराबरी से सुना और सम्मानित किया जाए।
भारत का यह रुख साहसिक और आवश्यक था। यह उस देश की नीति का प्रतिबिंब है जो वैश्विक मंचों पर सिर्फ भागीदार नहीं, दिशा-निर्धारक बनना चाहता है। आतंकवाद के मुद्दे पर स्पष्ट असहमति दर्ज कर भारत ने यह भी दिखा दिया कि कूटनीति में भी सिद्धांतों का स्थान सर्वोपरि होता है। यदि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं वास्तव में प्रभावी बनना चाहती हैं, तो उन्हें भारत जैसे राष्ट्रों की आवाज़ को अनदेखा करना बंद करना होगा, जो न सिर्फ़ अपने लिए, बल्कि एक निष्पक्ष, सुरक्षित और आतंक-मुक्त विश्व व्यवस्था के लिए खड़े होते हैं।
“एससीओ की मूल भावना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई थी। एक देश ने आतंकवाद का उल्लेख रोकने पर आपत्ति जताई और यह देश हम अनुमान लगा सकते हैं, यानि पाकिस्तान था। इसमें कोई संशोधन न मिल पाने के कारण भारत ने दस्तावेज़ को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब संगठन का उद्देश्य ही आतंकवाद से लड़ना है, ऐसे में उस मुख्य उद्देश्य को पुष्टि करने वाला उल्लेख नहीं होना साफ तौर पर अस्वीकार्य था। अगर आतंक से लड़ना हमारा साझा लक्ष्य है, तो हमें हर घटना का उल्लेख करना चाहिए।”
– एस जयशंकर, विदेश मंत्री






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