ईरान- इस्रायल युद्ध – उतर गए कई नकाब!
पाकिस्तान सैन्य भाषा में जब ‘न्यूट्रल’ यानी खत्म कर दिया गया तो अमेरिका ने ईरान पर सीधा हमला करने का कदम उठाया। उसे भरोसा था कि चीन और रूस भले ही ईरान के दोस्त और व्यापारिक भागीदार हों, लेकिन वे हमले...

भले ही कोई हारा-जीता न हो, लेकिन पाकिस्तान का दोगलापन सामने आ गया
सुरेश व्यास,
वरिष्ठ पत्रकार
मध्य-पूर्व एशिया की बड़ी सामरिक ताकत के रूप में उभरे इस्रायल और तेल कुबेर ईरान के बीच अमरीकी इशारे पर लगभग बारह दिन चली जंग के बाद कथित अमरीकी दबाव से ही 24 जून को संशयपूर्ण युद्धविराम हो गया, लेकिन इस घटनाक्रम ने कई देशों के चेहरों से नकाब उतार दिए। ईरान से दोस्ती का दम भरने वाले रूस और चीन हो या फिर ईरान के अहसानों तले दबा पाकिस्तान। सामने आ गया कि संकट के वक्त किसने ईरान का साथ दिया। इसमें सबसे ज्यादा संदिग्ध भूमिका पाकिस्तान की रही, जिसके सैन्य प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने युद्ध के दौरान ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के न्यौते पर व्हाइट हाउस में मुर्ग-मुस्सलम उड़ाए और कुछ घंटों बाद ही पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर ट्रम्प को शांति का नोबेल पुरस्कार देने का प्रस्ताव कर दिया।
हालांकि मुनीर को दावत अमेरिका की चाल थी, ताकि पाकिस्तान युद्ध में ईरान का समर्थन नहीं करे, लेकिन इस चाल में जनरल मुनीर इतना आसानी से फंस जाएंगे, ये माना नहीं जा सकता। खैर पाकिस्तान के इस कदम का उसके घर में ही विरोध शुरू हो गया। पाकिस्तान की निर्वाचित शाहबाज शरीफ सरकार को जवाब देते नहीं बना। इसी दौरान अमेरिका ने लगभग 22 साल बाद किसी युद्ध में कूदते हुए ईरान पर हमला कर दिया। दुनिया के सबसे महंगे लड़ाकू विमान बी-2 बॉम्बर ने अमरीकी सैन्य अड्डे मिसौरी से उड़ान भरकर 18 घंटे तक लगातार सफर किया और 22 जून को ईरान के तीन शहरों फोर्डो, नेतांज व इस्फहान पर तीन हजार टन वजनी बंकर बस्टर जीयू बम गिराकर उसके परमाणु ठिकानों को नष्ट कर दिया। इसके अलावा अमरीकी पनडुब्बी से ईरान पर टॉमहॉक मिसाइलें भी दागी गई। इसके तुरंत बाद विमान वापस लौट गए और कुछ देर बाद ट्रम्प ने आधिकारिक रूस से ईरान पर हमले की पुष्टि कर दी। अमेरिका ने इससे पहले साल 2003 में ईराक पर हमला किया था। इसके बाद यह पहली बार हुआ है कि अमेरिका ने किसी विदेशी धरती पर आक्रामकता दिखाई।
अमेरिका ने यह कदम अचानक नहीं उठाया। इसकी पटकथा उसी दिन लिख दी गई थी, जिस दिन इस्रायल ने ईरान पर पहला वार किया था। इसके बाद ट्रम्प जब कनाडा से जी-7 देशों का शिखर सम्मेलन छोड़कर वाशिंगटन लौट गए, तभी दिखने लगा था कि इस्रायल-ईरान के युद्ध में अमेरिका भी सीधे तौर पर उतरने वाला है। इसके बाद से पेंटागन और व्हाइट हाउस ने कूटनीतिक प्रयास भी तेज कर दिए। पहले ट्रम्प ने जी-7 शिखर सम्मेलन में शामिल होने गए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से टेलीफोन पर लगभग 35 मिनट तक बात की। उन्हें कनाडा से लौटते वक्त वाशिंगटन आने का निमंत्रण भी दिया, लेकिन मोदी ने पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों का हवाला देते हुए इसे विनम्रतापूर्वक टाल दिया। यह ट्रम्प और अमरीकी कूटनीति का एक अहम पड़ाव था। मोदी से बातचीत के तुरंत बाद ट्रम्प ने अमरीकी यात्रा पर गए जनरल असीम मुनीर को दावत पर बुला लिया। इस दौरान क्या बात हुई, इसका खुलासा न तो व्हाइट हाउस ने किया और न ही पाकिस्तान ने, मगर इसे लेकर जरूर चर्चा हो गई कि ये दावत भी इस्रायल-ईरान युद्ध से जुड़ा एक कूटनीतिक कदम ही है। ऐसा इसलिए भी माना गया कि युद्ध शुरू होते ही ईरान ने पाकिस्तान पर अपना दोस्त होने का भरोसा किया और कह भी दिया कि जरूरत पड़ी तो पाकिस्तान उसे परमाणु हथियार भी दे सकता है, लेकिन अमरीकी चाल ने एक ही दावत में उसका यह भ्रम इस खबर के साथ तोड़ दिया कि पाकिस्तान ने अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प को शांति का नोबेल पुरस्कार देने का प्रस्ताव किया है।
इसके बाद पाकिस्तान सैन्य भाषा में जब ‘न्यूट्रल’ यानी खत्म कर दिया गया तो अमेरिका ने ईरान पर सीधा हमला करने का कदम उठाया। उसे भरोसा था कि चीन और रूस भले ही ईरान के दोस्त और व्यापारिक भागीदार हों, लेकिन वे हमले की निंदा के अलावा कुछ नहीं करेंगे। पाकिस्तान को अपने पक्ष में मिला लेना ही ट्रम्प की सबसे बड़ी जीत थी। हालांकि पाकिस्तान ने फौरी तौर पर ही सही, लेकिन ईरान पर अमरीकी हमले की निंदा की और इसे अन्तरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करार दिया, लेकिन मुनीर के अमरीकी कब्जे में होने से अमेरिका की सेहत पर इसका ज्यादा असर दिखाई नहीं दिया।
अमेरिका हमला करके घर भी लौट गया। ईरान-इस्रायल लड़ते रहे। एक दूसरे पर प्रक्षेपास्त्र दागते रहे। इस्रायल को भी अपने प्रमुख शहरों तेल अवीब और हाइफा के अलावा अन्य स्थानों पर ईरानी हमलों की तबाही ने सहमाया। दुनिया भर में खौफ का पर्याय बना उसका रक्षा कवच गोल्डन डोम भी जैसे धाराशायी हो गया। एक बार तो स्थिति ये हो गई थी उसके पास दुश्मन के हमलों की पहचान करने वाली इंटरसेप्टर मिसाइलों का भी टोटा पड़ गया। इस्रायल को शायद पहली बार अहसास हुआ कि कोई उसका मुकाबला कर सकता है। इधर, ईरान ने लगभग चौबीस घंटे तक अमरीकी कार्रवाई का कोई जवाब नहीं दिया और इसके बाद उसने जब कुवैत स्थित अमरीकी सैन्य अड्डे समेत खाड़ी के तीन स्थानों पर मिसाइलें दागी तो लगा कि अब तीसरे विश्व युद्ध का खतरा बढ़ने वाला है। इसके अगले दिन ही ट्रम्प फिर सोशल मीडिया साइट एक्स पर नमूदार हुए और ऐलान कर दिया कि इस्रायल-ईरान लड़ाई रोकने पर सहमत हो गए हैं। अब कोई एक दूसरे पर हमला नहीं करेगा, लेकिन ईरान ने इसके बाद भी इस्रायल पर मिसाइल हमला कर दिया तो इस्रायल ने ईरान के हवाई ठिकानों को निशान बना लिया। इससे कई घंटे तक संशय बना रहा कि क्या वाकई युद्धविराम हो गया है?
इस दौरान ट्रम्प ने चौधराहट भी दिखाई और इस्रायल को अपने विमानों को वापस बुलाने और ईरान पर एक भी बम नहीं गिराने की चेतावनी तक दे दी। उन्हें लगा कि कोई उनकी सुन ही नहीं रहा है तो उन्होंने अश्लील भाषा का इस्तेमाल करते हुए कह दिया कि समझ में नहीं आ रहा ईरान और इस्रायल कर क्या रहे हैं? खैर, लड़ाई रुक गई और अमरीकी कांग्रेस से इसके लिए ट्रम्प को शांति का नोबल पुरस्कार देने के प्रस्ताव की अपुष्ट खबरें भी आना शुरू हो गई।
कौन जीता, कौन हारा
अब सवाल ये है कि इस लड़ाई में जीता कौन? अमेरिका, इस्रायल या ईरान? अमेरिका इस बात से खुद को विजयी माना रहा है कि उसने ईरान को झुका दिया। इस्रायल इस बात से खुश है कि ईरान की परमाणु ताकत खत्म हो गई और ईरान में इस बात का जश्न है कि वह दुनिया के सुपर पॉवर अमेरिका के सामने झुका नहीं, परमाणु सामग्री बचा ली और तख्तापलट की कोशिशें भी नाकाम हो गई। तीनों के अपने अपने दावे हैं, लेकिन दुनिया इसमें कुछ और ही देख रही है कि अब आगे क्या होगा।
निगलते बन रहा न उगलते
युद्ध के नतीजे चाहें कुछ भी रहे हों, लेकिन इसमें चीन-रूस के अलावा पाकिस्तान पूरी तरह बेनकाब हो गया। खुद के इस्लामी राष्ट्र होने का दम भरने वाला पाकिस्तान एक प्रमुख इस्लामी मुल्क ईरान से आ रही जश्न की तस्वीरों को देखकर भी नहीं कह सकता कि वह यूहदियों के सरपरस्त अमेरिका और इस्रायल से लोहा लेने वाले ईरान की इस खुशी में शरीक है। खास बात यह है कि कथित सीजफायर के बाद से न पाकिस्तान प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ नजर आ रहे हैं और न ही सैन्य प्रमुख जनरल मुनीर।
उल्टा पड़ा आपदा में अवसर का कदम
कारण साफ है कि इस्रायल-ईरान युद्ध शुरू होने से पहले शरीफ और मुनीर में अमेरिका के तलवे चाटने की हौड़ सी मची थी। दावा तो ये भी है कि मुनीर को दावत के दौरान ही ट्रम्प ने बता दिया था कि अमेरिका ईरान पर हमला करने वाला है, लेकिन पक्का पिट्ठू बनने के चक्कर में पाकिस्तान ने चुप रहकर अपने पारम्परिक दोस्त ईरान के साथ भी धोखा कर दिया। आपको याद ही होगा कि पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ईरान ने पाकिस्तान से ही दोस्ती निभाई थी और जब उस पर संकट आया तो उसे पाकिस्तान से पूरी उम्मीद थी।
अब हो रही नींद हराम
सीजफायर के बाद अब पाकिस्तान अससमंजस में है। पाकिस्तानी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि अब वे ईरान को क्या लेकर मुंह दिखाएंगे? वे ईरान से दुश्मनी लेने की स्थिति में तो हैं नहीं और ऐसे में फिर पाकिस्तान पर कोई संकट आ गया तो वे किसे ताकेंगे? इसके अलावा प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से ईरान के बदला लेने की आशंका से भी पाकिस्तान सहमा हुआ है। पाकिस्तान की सीमा ईरान से सीधे सटती है। ऐसे में उसे विध्वंशक कार्रवाई का डर भी सता रहा है। यही कारण है कि पाकिस्तान को आनन-फानन में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक भी बुलानी पड़ गई। दूसरी तरफ, पाकिस्तान सरकार को जनता के आक्रोश और विपक्षी नेताओं के तीखे सवालों का सामना भी करना पड़ रहा है, लेकिन नकाब चेहरे से एक बार सरक जाता है तो असलियत सामने आ ही जाती है और यही असलियत अब पाकिस्तान को इधर कुआं-उधर खाई की ओर धकेल रही है। कारण कि बलूचिस्तान का आंदोलन भी अब और अधिक जोर पकड़ेगा। इधर भारत, उधर अफगानिस्तान और अब ईरान से छत्तीस का आंकड़ा पाकिस्तान के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की नींद हराम किए हुए है।
सेना-सरकार में भी तनातनी
खबर तो यह भी है कि सीजफायर के बाद से पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व में भी तनातनी बढ़ रही है। सेना प्रमुख मुनीर मौन हैं तो सरकार अब बढ़ते जनाक्रोश के चलते डैमेज कंट्रोल करना चाह रही है। यह पाकिस्तान के सैन्य प्रशासन के गले नहीं उतर रहा। आने वाले दिनों में इसका भी कोई न कोई असर दिखाई देने वाला है।
इसलिए टला सत्ता परिवर्तन
इस्रायल-ईरान युद्ध में अमरीकी एंट्री और इसके साथ ही अमेरिका में शरण ले रहे ईरान के निर्वासित राजघराने के वारिस की ‘मेक ईरान ग्रेट अगैन’ कॉल से संकेत मिल रहे थे कि अमेरिका ईरान की कट्टरपंथी सरकार को उखाड़ फैंकने में भी मददगार साबित हो सकता है, लेकिन इसमें भी पाकिस्तान ही आड़े आया। ट्रम्प से मुलाकात के दौरान मुनीर ने आशंका जताई कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो गया तो उसके ईरान से सटे बलूचिस्तान प्रांत के लड़ाके इसका फायदा उठाएंगे। कारण कि बलूचिस्तान में सशस्त्र हमले लगातार तेज होते जा रहे हैं। दूसरी तरफ बलूच आंदोलनकारियों को समर्थन दे रहे ईरानी कट्टकपंथी ग्रुप जैश-अल-अदल ने भी इस्रायल-ईरान युद्ध को फायदे का मौका बताया था।






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