नदी नीरे- चमक जाएगी तकदीरें?
भारत की नई जल रणनीति जल संसाधनों के प्रभावी प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन की अनिश्चितताओं से निपटने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह योजना न केवल कृषि और जल आपूर्ति के क्षेत्र में बदलाव लाएगी, बल्कि भारत...

नदियों को जोड़ने का भगीरथी प्रोजेक्ट बदल सकता है देश की सूरत
-दिनेश जोशी,
वरिष्ठ पत्रकार
भारत में छोटी-बड़ी लगभग 200 मुख्य नदियां हैं। इनमें जल प्रवाह के मानक पर गंगा देश की सबसे बड़ी नदी है, जबकि लंबाई के अनुसार सिन्धु नदी सबसे बड़ी है। इनके अलावा पूर्वोत्तर की ब्रह्मपुत्र को उसके पाट यानी सर्वाधिक चौड़ाई के कारण ‘नद’ कहा जाता है। इंडियन मायथोलॉजी में भी नदियों को पवित्रता का आधार मानकर उनके संगम की परिकल्पना की गई है। प्रयागराज में तीन नदियों गंगा, यमुना व सरस्वती के प्राकृतिक संगम को त्रिवेणी नाम से जाना जाता है। मगर साथ ही गोदावरी, नर्मदा, सिंधु और कावेरी के संगम का आह्वान किया गया है—
“गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥”
अर्थात्, “हे गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, सिंधु और कावेरी, इस जल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराओ।” ये नदियां भारत की पवित्रतम नदियां मानी गई हैं।
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राजस्थान टुडे, जुलाई 2025
एक तरफ बाढ़ तो दूसरी तरफ सूखा
भारत विविध भौगोलिक और जलवायु वाला देश है, जहां एक ओर बाढ़ की विभीषिका है तो दूसरी ओर सूखे की त्रासदी। वर्षा का असमान वितरण और जल संसाधनों की असंतुलित उपलब्धता ने कृषि, पेयजल, और जलविद्युत जैसे क्षेत्रों में भारी असंतुलन पैदा किया है। इसी असंतुलन को दूर करने के लिए “राष्ट्रीय नदी जोड़ परियोजना” की परिकल्पना की गई। यह भारत की अब तक की बड़ी महत्वाकांक्षी जल संसाधन परियोजना मानी जा रही है। हालांकि इस परियोजना की सैद्धांतिक परिकल्पना का काम पहले ही शुरू हो चुका था, मगर कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और उसके प्रत्युत्तर में भारतीय सेना के आपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के साथ सिंधु नदी जल समझौता निलम्बित करने के बाद तेजी से काम शुरू हुआ है।
क्या है राष्ट्रीय नदी जोड़ परियोजना?
नदी जोड़ परियोजना का मूल उद्देश्य भारत के जल प्रचुर क्षेत्रों (बाढ़ प्रभावित) से अल्प जल क्षेत्रों (सूखा प्रभावित) को जोड़कर जल का समुचित और संतुलित वितरण करना है। इसका आधार यह विचार है कि देश की नदियों को कृत्रिम नहरों और जल मार्गों द्वारा जोड़ा जाए, ताकि जल संचयन, सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जल की आवश्यकता को संतुलित रूप से पूरा किया जा सके।
परियोजना की पृष्ठभूमि
इस विचार की शुरुआत 1972 में की गई थी, जब तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री डॉ. के.एल. राव ने गंगा और कावेरी को जोड़ने का सुझाव दिया था। इसके बाद 1980 में केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना’ के अंतर्गत नदी जोड़ परियोजना का प्रस्ताव रखा। इसके बाद इस प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया और इसके लिए राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण को जिम्मेदारी सौंपी गई।
परियोजना की संरचना
राष्ट्रीय नदी जोड़ परियोजना को दो मुख्य घटकों में विभाजित किया गया है—
हिमालयीन घटक:
इसमें गंगा, ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों को आपस में जोड़ने की योजना है। इससे बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, जल विद्युत और जल यातायात को बढ़ावा मिलेगा।
प्रायद्वीपीय घटक:
यह भारत के दक्षिणी भागों की नदियों जैसे गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी आदि को आपस में जोड़ने की योजना है। इसका उद्देश्य दक्षिण भारत में सूखे की स्थिति को कम करना है।
कुल मिलाकर परियोजना में 35 लिंक प्रस्तावित हैं– जिसमें 14 हिमालयी और 21 प्रायद्वीपीय लिंक हैं। इसमें लगभग 14,900 किलोमीटर लंबी नहरें और 3,000 मिलियन क्यूबिक फीट जल हस्तांतरण की योजना है।
केंद्रीय लिंक – केन-बेतवा परियोजना
भारत की पहली और सबसे प्रमुख नदी जोड़ परियोजना है केन-बेतवा लिंक परियोजना, जो बुंदेलखंड क्षेत्र की जल समस्या का समाधान करने के लिए उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश की केन और बेतवा नदियों को जोड़ने का कार्य है।
मुख्य तथ्य:
लागत: लगभग 45,000 करोड़
लाभान्वित क्षेत्र: उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के जलसंकटग्रस्त क्षेत्र
उद्देश्य: सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, बाढ़ नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण
यह परियोजना 2021 में केंद्र सरकार द्वारा मंज़ूर की गई और इसके लिए विशेष निधि और स्वीकृति दी गई है।
परियोजना के लाभ :
सिंचाई का विस्तार: लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर नई सिंचाई सुविधा
पेयजल आपूर्ति: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में करोड़ों लोगों को सुरक्षित पेयजल
बाढ़ और सूखा नियंत्रण: बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों से जल का ट्रांसफर सूखा ग्रस्त क्षेत्रों में कर असंतुलन पर अंकुश
जल विद्युत उत्पादन: अनुमानित 34,000 मेगावाट तक जलविद्युत उत्पादन संभव
जल यातायात में वृद्धि: नदियों को जोड़ने से अंतर्देशीय जल परिवहन में तीव्रता, एक सस्ता और पर्यावरण-सम्मत माध्यम
चुनौतियां और आलोचनाएं
हालांकि यह परियोजना एक नजर में लाभकारी प्रतीत होती है, फिर भी इसके समक्ष अनेक व्यावहारिक, पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियां हैं।
पर्यावरणीय प्रभाव: बड़ी मात्रा में वन क्षेत्र डूबने की आशंका, जिससे जैव विविधता पर खतरा
पुनर्वास समस्या: विस्थापित लाखों लोगों के पुनर्वास और आजीविका की चिंता
राज्यों के बीच विवाद: जल बंटवारे को लेकर विभिन्न राज्यों के बीच राजनीतिक और प्रशासनिक संघर्ष
आर्थिक व्यय: लाखों करोड़ रुपए की परियोजना के लिए दीर्घकालिक वित्तीय योजना जरूरी
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: वर्षा के अस्थिर पैटर्न से जलस्रोतों की अनिश्चितता बढ़ी, जिससे परियोजना के स्थायित्व पर प्रश्नचिह्न
एक युगांतकारी विचार, जो बदल सकता है तकदीर
राष्ट्रीय नदी जोड़ परियोजना एक युगांतकारी विचार है, जो जल संबंधी समस्याओं को दीर्घकालिक रूप से हल करने की क्षमता रखता है। यह देश के खेत खलिहानों, उपज और परिवहन की तस्वीर बदल सकता है। किंतु इसे सतत विकास, पर्यावरणीय संतुलन और समाज कल्याण के साथ समन्वय में लागू करना आवश्यक होगा। जल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि संवेदनशील सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तत्व भी है।
यदि इस परियोजना को समुचित योजना, पर्यावरणीय विवेक और सामाजिक सहभागिता के साथ लागू किया जा सका, तो यह न केवल भारत की जल नीति में एक क्रांति ला सकती है, बल्कि सतत विकास के वैश्विक मॉडल के रूप में भी भारत की तकदीर बदल सकती है।
‘आपरेशन सिंदूर’ ने सुझाया ‘जल दस्तूर!’
पाक की बदहाली बनेगी राजस्थान की खुशहाली
पहलगाम हमले के बाद भारत की तरफ से उठाए गए कदम पाकिस्तान पर भारी पड़ रहे हैं। पड़ोसी देश पहले ‘आपरेशन सिंदूर’ और उसी कड़ी में सिंधु जल संधि को निलंबित करने के बाद घुटनों पर आ गया है। भारत ने साफ कर दिया है कि सिंधु नदी के जल का उपयोग वह अपने नागरिकों के लिए समुचित ढंग से करेगा। भारत की कार्रवाई के बाद पाकिस्तान के बांधों में लगातार घटते जलस्तर के कारण खरीफ सीजन में उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। आने वाले वर्षों में यह स्थिति और भी बदतर होती जाएगी, क्योंकि भारत सिंधु नदी प्रणाली पर कई प्रोजेक्ट पर काम करने जा रहा है।
भारत अब सिंधु नदी प्रणाली के जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करने की दिशा में एक ठोस योजना पर कार्य कर रहा है। इसके तहत अंतर-बेसिन जल हस्तांतरण के माध्यम से जम्मू-कश्मीर से लेकर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान तक पानी को पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए लगभग 113 किलोमीटर लंबी एक विशेष नहर का निर्माण प्रस्तावित है, जो अतिरिक्त जल को दक्षिण दिशा में मोड़ेगी।
राजस्थान तक पहुंचेगा सिंधु जल
हाल ही गृहमंत्री अमित शाह ने भी घोषणा की है कि अगले तीन वर्षों में सिंधु नदी का जल नहरों के माध्यम से श्रीगंगानगर (राजस्थान) तक पहुंचाया जाएगा। इससे पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में कृषि उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
नदी जोड़ने की दीर्घकालिक रणनीति
भारत सिंधु जल संधि के तहत अपने अधिकार के पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चेनाब) के जल का पूर्ण उपयोग चाहता है। इसके लिए चेनाब से रावी, ब्यास और सतलुज तक जल को स्थानांतरित करने की एक वृहद योजना पर काम किया जा रहा है। इससे पाकिस्तान को बहने वाले अतिरिक्त पानी को रोका जा सकेगा। यह नहर प्रणाली 13 मुख्य बिंदुओं पर मौजूदा नहर नेटवर्क से जुड़ी होगी और अंततः इंदिरा गांधी नहर से होकर राजस्थान के सूखा प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचेगी।
रणबीर नहर और अन्य परियोजनाएं
इस योजना में रणबीर नहर की लंबाई को भी दोगुना (60 से 120 किलोमीटर) करने का प्रस्ताव है, ताकि चेनाब से अधिक जल लिया जा सके। साथ ही, प्रताप नहर के पूर्ण उपयोग के लिए व्यवहार्यता रिपोर्ट पर कार्य चल रहा है। इसके अलावा, कठुआ जिले की उझ बहुउद्देशीय परियोजना को फिर से शुरू करने की योजना बनाई गई है, जो जलविद्युत, सिंचाई और पीने के पानी की आवश्यकताओं को पूरा करेगी।
उझ से रावी-ब्यास जल स्थानांतरण
उझ नदी, जो रावी की सहायक नदी है, अब एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसके पानी को सुरंगों के माध्यम से ब्यास बेसिन में पहुंचाया जाएगा, जिससे भारत पूर्वी नदियों के जल का पूरा लाभ उठा सकेगा। यह पहले पाकिस्तान में बहने वाले अतिरिक्त जल को भारत के भीतर रोकने की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है।
जलविद्युत परियोजनाओं से समन्वय
भारत सरकार इस योजना को जलविद्युत परियोजनाओं और मौजूदा जल संरचनाओं के साथ समन्वय से लागू कर रही है। चेनाब नदी पर बगलिहार और सलाल जैसे ‘रन ऑफ द रिवर’ जलविद्युत संयंत्रों के जलाशयों की नियमित सफाई और डीसिल्टिंग के साथ-साथ दीर्घकालिक योजनाएं भी बनाई जा रही हैं। इन योजनाओं में पाकल दुल (1000 मेगावाट), रतले (850 मेगावाट), किरू (624 मेगावाट) और क्वार (540 मेगावाट) जैसे जलविद्युत परियोजनाओं को तेज़ी से विकसित करना शामिल है।






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