“फैसला नहीं लेना ही सबसे बड़ा फैसला है!”
दिसंबर 2023 में प्रदेश की जनता ने बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी को सत्ता सौंपी। उम्मीदें थी कि “डबल इंजन” अब सिर्फ़ ट्रेन का नहीं, ट्रांसफॉर्मेशन का प्रतीक बनेगा। परंतु अफ़सोस, डेढ़ साल के इस...

राजस्थान में मौन नीतियों की बुलंद सरकार
विवेक श्रीवास्तव,
वरिष्ठ पत्रकार
“ज़ख्म देने को ही क्या अब मसीहा आए हैं,
वो जो चुप हैं… वो भी साजिश समझे जाते हैं!”
राजनीति में कई बार सबसे ख़तरनाक होता है कुछ ना करना। ना हां, ना ना— बस चुप्पी का आवरण और बेशर्म मौन! राजस्थान की मौजूदा सरकार पर यह बात एकदम सटीक बैठती है। दिसंबर 2023 में प्रदेश की जनता ने बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी को सत्ता सौंपी। उम्मीदें थी कि “डबल इंजन” अब सिर्फ़ ट्रेन का नहीं, ट्रांसफॉर्मेशन का प्रतीक बनेगा। परंतु अफ़सोस, डेढ़ साल के इस राजनीतिक अध्याय ने ये साबित कर दिया कि..
“कभी-कभी सबसे बड़ा फैसला… कोई फैसला न लेना भी होता है!”
भजनलाल शर्मा: ‘संगठन का सन्देश’ या ‘सत्ता का संदेह’?
भजनलाल शर्मा— एक सामान्य कार्यकर्ता, पहली बार विधायक बने और सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर। यह नाम अब राजस्थान में एक प्रतीक बन चुका है, या तो साहस का, या साज़िश का!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी ने इस नियुक्ति से कार्यकर्ताओं को यह संदेश दिया कि मेहनत और निष्ठा का फल बड़ा पद भी हो सकता है। लेकिन जब कुर्सी की गरिमा फैसलों से तय होती है, तब सवाल उठता है, क्या ये सरकार अब तक कोई निर्णायक निर्णय ले पाई है?
“हुकूमतें जब सन्नाटे से चलने लगें,
तो समझो गूंगे वक्त की गिरफ्त में है राज…”
इन्वेस्टमेंट समिट से लेकर ईआरसीपी तक: आधे वादे, अधूरी तैयारी
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने शुरुआत में जब इन्वेस्टमेंट समिट की घोषणा की, तो प्रतीत हुआ मानो अब प्रदेश आर्थिक छलांग लगाएगा। लेकिन जो समिट आधी-अधूरी तैयारी में हो, वो झांसे से ज्यादा कुछ नहीं बनती।
पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP) का शिलान्यास और यमुना जल समझौता केवल प्रेस रिलीज़ बनकर रह गए। ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि इन परियोजनाओं का धरातल पर पूरा होना इस कार्यकाल में लगभग असंभव है।
“वो वादों की दुनिया में उड़ते रहे,
ज़मीं देखी होती तो शायद सच समझते…”
विपक्ष में जिन मुद्दों पर गरजे थे, सत्ता में मौन क्यों?
कांग्रेस शासन के दौरान पेपर लीक, भ्रष्टाचार, और भर्ती घोटालों को लेकर जो आग भाजपा ने लगाई थी, अब उसी की राख में सत्ताधीश सोते मिलते हैं।
भ्रष्टाचार की जांच के नाम पर एक मंत्रिमंडलीय कमेटी बनी, जो कभी-कभार बैठक कर ‘इतिश्री’ कर लेती है। और सूत्रों की मानें तो जिन कामों पर भाजपा विपक्ष में रहते हुए प्रश्न उठा रही थी, उन्हीं पर इस सरकार ने 95% भुगतान पूरे कर दिए हैं।
“जो जाल बुने थे उन्होंने गुनाहगारों पर,
अब उन्हीं जालों में फंस गए खुदा के कारिंदे!”
भर्ती परीक्षाओं में बेहाल निर्णयहीनता: न RPSC सुधरा, न नीति
भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों पर सरकार का रवैया ऐसा रहा, मानो फैसले से डर लगता हो!
RPSC का चेयरमैन तत्कालीन DGP यूआर साहू को बनाया गया, जिनका डीजीपी का कार्यकाल भी कुछ खास नहीं रहा, चारों ओर बजरी माफिया ने आतंक मचाया। SI भर्ती में SOG ने फर्जी अभ्यर्थियों को पकड़ कर कर्तव्य निभाया, लेकिन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में वकील तक खड़ा नहीं किया।
नतीजा: मेहनत से पकड़े गए फर्जी थानेदार बेल पर बाहर निकल आए।
“जिन्हें ज़िम्मेदारी का ताज मिला,
उन्होंने खामोशी का कफ़न ओढ़ लिया!”
RAS परीक्षा और BJP संगठन का ‘सार्वजनिक तमाशा’
RAS परीक्षा में दो परीक्षाएं समानांतर एक साथ होने पर जब छात्रों ने आंदोलन छेड़ा, तो प्रदेश के दोनों डिप्टी CM और प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर परीक्षा आगे बढ़ाने की मांग की।
मदन राठौड़ ने छात्रों के बीच जाकर दो दिन में फैसला आने का भरोसा भी दिलाया… लेकिन सरकार ने प्रेस नोट जारी कर कह दिया:
“परीक्षा की तिथि यथावत रहेगी!”
यानि:
“संगठन बोले कुछ, सरकार बोले कुछ और…
असली सरकार चल किसके इशारे पर रही है?”
नेतृत्व का संकट या सत्ता की गूंगी बस्ती?
आज की भजनलाल सरकार में सबसे बड़ा संकट नेतृत्व नहीं, निर्णायकता का है।
सरकार हर मुद्दे पर निर्णय टालती है, बैठकों की खानापूर्ति करती है और ‘समीक्षा समिति’ के सहारे वक्त काटती है।
“सत्ता की सबसे ख़तरनाक भाषा है—
‘हम देखेंगे’, ‘हम विचार करेंगे’, ‘हम जांच करेंगे’…”
क्योंकि यही भाषा जनता के धैर्य की कब्र खोदती है।
तो क्या ये सरकार फैसला नहीं लेगी?
18 महीने बीत गए हैं…
ना भर्ती घोटाले पर निर्णायक एक्शन,
ना भ्रष्टाचार मामलों पर कोई मुकदमा,
ना वादों के किसी मोर्चे पर ठोस क़दम।
“यह मौन कोई साधना नहीं,
यह सरकार की सुन्न पड़ चुकी चेतना की निशानी है!”
और अगर यही चाल-चरित्र रहा, तो जनता भी आने वाले चुनावों में शायद यही कहेगी:
“हमने वोट दिया था परिवर्तन के लिए,
पर मिला हमें—
एक सरकार, जो बोलती नहीं… चलती नहीं…
सिर्फ़ टालती है!”
सरकार के नाम:
“ख़ामोशी को हुनर समझ बैठे हैं हुक्मरान,
मगर सन्नाटे में भी उठती है आवाज़ें… सुनो!”






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