स्वतंत्रता व नैतिकता के बीच संतुलन जरूरी
सोनम की इस जघन्य घटना ने यह भी साबित किया है कि आज के दौर में विवाह जैसे पवित्र संबंध को कुछ लोग सिर्फ स्वार्थ और योजनाओं का जरिया बना रहे हैं। सोशल मीडिया, फ़िल्मों और भौतिकवादी जीवनशैली ने संबंधों...

हनीमून ट्रिप पर पति की हत्या : महिलाओं के बदलते स्वरूप की एक चिंताजनक तस्वीर
मधु बनर्जी,
पत्रकार व लेखिका
हाल ही में एक सनसनीखेज घटना में सोनम नामक महिला ने मेघालय के शिलांग में हनीमून ट्रिप के दौरान अपने पति की हत्या करा दी। ऐसा ही एक हत्याकांड महाराष्ट्र के सांगली जिले के कुपवाड़ में भी हुआ, जहां पत्नी राधिका ने शादी के 15 दिन बाद ही कुल्हाड़ी मार कर पति की हत्या कर दी। ऐसे मामले समाज में महिलाओं की बदलती मानसिकता और रिश्तों की गहराई से हो रही टूटन का संकेत है। जहां पहले महिलाएं सामाजिक दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियों और रिश्तों की मर्यादा में खुद को समर्पित मानती थीं, वहीं अब कुछ महिलाएं अपने अधिकारों की आड़ में आक्रामक और आत्मकेंद्रित भी होती जा रही हैं। यह बदलाव पूर्णतः नकारात्मक नहीं है, क्योंकि स्त्रियों का आत्मनिर्भर होना, अपनी बात कह पाने का साहस रखना जरूरी है, लेकिन जब यह स्वतंत्रता किसी की हत्या तक पहुंच जाए, तो यह आज़ादी नहीं, हिंसक प्रवृत्ति बन जाती है।
इस तरह की घटनाएं यह भी दर्शाती हैं कि रिश्तों में संवाद की कमी, असंतोष, लालच या अवैध संबंध जैसे कारण भी महिलाओं को अपराध की ओर धकेल सकते हैं। समाज में महिला सशक्तिकरण की सही परिभाषा अब और अधिक आवश्यक हो गई है, जहां ‘सशक्त’ का अर्थ ‘संवेदनशील और संतुलित’ हो, न कि ‘हिंसक और स्वार्थी’।
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राजस्थान टुडे, जुलाई 2025
सोनम की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम स्त्री स्वतंत्रता और नैतिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाना भूलते जा रहे हैं? यह वक्त है कि हम महिलाओं की भावनात्मक शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और रिश्तों की समझ को प्राथमिकता दें, ताकि ‘सशक्त महिला’ का मतलब केवल स्वतंत्रता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संवेदना से भी जुड़ा हो।
सोनम की इस जघन्य घटना ने यह भी साबित किया है कि आज के दौर में विवाह जैसे पवित्र संबंध को कुछ लोग सिर्फ स्वार्थ और योजनाओं का जरिया बना रहे हैं। सोशल मीडिया, फ़िल्मों और भौतिकवादी जीवनशैली ने संबंधों की गरिमा को प्रभावित किया है। महिलाएं अब सिर्फ सहनशीलता का प्रतीक नहीं, बल्कि निर्णायक भी बन रही हैं, लेकिन जब यह निर्णय क्रोध, लालच या बदले की भावना से लिया जाए तो वह अपराध बन जाता है। इसलिए आज की महिला को शक्ति के साथ-साथ संयम और मूल्य आधारित निर्णयों की भी आवश्यकता है, तभी समाज में संतुलन बना रह सकता है।
नारीवाद बनाम उग्रता
20वीं सदी की स्त्री जहां सहनशीलता, त्याग और समर्पण का पर्याय मानी जाती थी। वहीं 21वीं सदी की स्त्री अधिकारों की लड़ाई लड़ती हुई दिखाई देती है। यह बदलाव स्वागत योग्य है, लेकिन जब अधिकार, अहंकार में बदल जाएं, तब वह विनाशकारी हो जाते हैं। आज कुछ महिलाएं अपने व्यक्तिगत स्वार्थ, क्षणिक भावनाओं और बाहरी प्रभावों के चलते ऐसे निर्णय करने लगी हैं, जो अपराध की श्रेणी में आते हैं। स्त्री स्वतंत्रता का अर्थ यदि यह हो जाए कि अपने साथी को रास्ते से हटाकर एक नया जीवन शुरू किया जाए, तो यह न केवल मानवता के विरुद्ध है, बल्कि स्त्री सशक्तिकरण की अवधारणा के साथ भी धोखा है।
अपराध में महिलाओं की भागीदारी, आंकड़ों पर एक नजर : राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार:
2022 में कुल दर्ज आपराधिक मामलों में महिलाओं द्वारा किए गए अपराधों की संख्या 2.9 प्रतिशत रही।
इनमें से सबसे अधिक मामले घरेलू झगड़ों, संपत्ति विवाद, और अवैध संबंधों से जुड़े पाए गए।
2021 में कुल 1,22,955 महिलाएं अपराधों में लिप्त पाई गईं, जिनमें हत्या और हत्या की साजिश के मामले भी शामिल हैं।
2023 की रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि दंपत्ति झगड़ों और तलाक के मामलों में महिलाओं द्वारा हिंसात्मक कदम उठाने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
ये आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि महिलाओं द्वारा किए जा रहे अपराधों को अब महज “भावनात्मक प्रतिक्रिया” कह कर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
संबंधों पर सोशल मीडिया का प्रभाव
आज के युग में सोशल मीडिया, वेब सीरिज और फिल्मों ने रिश्तों की परिभाषा को बहुत हद तक प्रभावित किया है। हर दिन सोशल मीडिया पर “परफेक्ट कपल” बनने की होड़, आभासी रिश्तों की गहराई को भ्रम बना देती है। वास्तविक जीवन में जब इन आदर्शों की पूर्ति नहीं हो पाती, तब असंतोष, अविश्वास और क्रोध जन्म लेता है। साथ ही, कुछ महिलाएं आज “इंस्टेंट फ्रीडम” चाहती हैं, जिसमें कोई बंधन न हो, कोई उत्तरदायित्व न हो। ऐसे में विवाह जैसे पवित्र संबंध भी “व्यावसायिक समझौते” का रूप ले लेते हैं, जहां अगर लाभ नहीं मिला तो साथी को हटाने में संकोच नहीं किया जाता।
सही मायनों में महिला सशक्तिकरण
वर्तमान में महिला सशक्तिकरण की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन इसका अर्थ क्या है? क्या केवल आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय करने की क्षमता ही सशक्तिकरण है? या फिर इसमें भावनात्मक समझ, सामाजिक उत्तरदायित्व और आत्मनियंत्रण भी शामिल होना चाहिए?
सशक्त स्त्री वह है जो अपने निर्णयों में संतुलन रखे, जो संवाद में विश्वास करे, जो सह-अस्तित्व की भावना रखे। यदि किसी संबंध में मतभेद हो, तो उसका समाधान हिंसा नहीं, संवाद और विधिक प्रक्रिया से किया जाए।
मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक शिक्षा समय की जरूरत
आज की तेज़ भागती दुनिया में भावनात्मक शिक्षा लगभग समाप्त हो चुकी है। स्कूल और कॉलेज सिर्फ अकादमिक ज्ञान दे रहे हैं, जबकि रिश्तों की समझ, क्रोध प्रबंधन, और मानसिक स्वास्थ्य पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं में डिप्रेशन, तनाव, और इमोशनल आउटबर्स्ट की घटनाएं बढ़ रही हैं। 2022 की ‘इंडियन जर्नल ऑफ साइकाइट्री’ की रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं में रिलेशनशिप बेस्ड एंगर और गिल्ट डिसऑर्डर में 22 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।
इसका सीधा संबंध रिश्तों में बढ़ते अपराध से है। ऐसे में जरूरी है कि हम स्कूल स्तर पर ही “लाइफ स्किल्स”, “रीलेशनशिप मैनेजमेंट” और “मेंटल हेल्थ अवेयरनेस” जैसे विषयों को शामिल करें।
कानून और समाज दोनों को चाहिए नई दृष्टि
वर्तमान कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने हैं, लेकिन कुछ मामलों में इनका दुरुपयोग भी होता है। इसलिए कानून व्यवस्था में निष्पक्षता और महिला अपराधों पर भी गंभीर दृष्टिकोण आवश्यक है। साथ ही, समाज को भी महिलाओं को केवल देवी या पीड़िता की नजर से देखना बंद करना होगा। उन्हें इंसान की तरह देखना होगा, जिसमें अच्छाइयां भी हैं, कमियां भी। तभी हम उनके अपराधों को भी उसी गंभीरता से देख पाएंगे, जैसे पुरुषों के अपराध को।
शक्ति के साथ चाहिए संयम
सोनम की घटना कोई एक दिन की कहानी नहीं, बल्कि समाज में लंबे समय से उपज रहे एक जटिल मानसिक परिवर्तनों का परिणाम है। यह उस स्त्री की तस्वीर है जो अब निर्णय करने में सक्षम है, लेकिन निर्णयों में संयम और विवेक की कमी उसे अपराध के रास्ते पर ले जा रही है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि सशक्त स्त्री वह नहीं जो सबकुछ तोड़ दे, बल्कि वह है जो रिश्तों को जोड़ने का साहस रखे। शक्ति के साथ जब तक मूल्य, संवेदना और संयम नहीं जुड़े होंगे, तब तक महिला सशक्तिकरण अधूरा रहेगा।
इसलिए आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम स्त्रियों को न केवल स्वतंत्र बनाएं, बल्कि उन्हें संतुलित, संवेदनशील और विवेकशील भी बनाएं, ताकि वे अपने अधिकारों का सही अर्थ समझ सकें और समाज को बेहतर दिशा में ले जा सकें।






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