भारतीय छोड़ रहे, पश्चिम अपना रहा
संयुक्त परिवार का मतलब केवल साथ रहना ही नहीं है, बल्कि यह सामाजिक निवेश है, जहां पीढ़ियां साझा जिम्मेदारियों और मूल्यों से बंधी होती...

संयुक्त परिवार: संस्कारों की पाठशाला
मधुलिका सिंह,
पत्रकार व लेखिका
वेदों से लेकर रामायण-महाभारत तक और मुगल व ब्रिटिश काल से लेकर आज़ादी के बाद तक संयुक्त परिवार भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। भारत की परम्परा में संयुक्त परिवार न केवल सामाजिक ढांचा, बल्कि एक जीवंत मनोवैज्ञानिक व्यवस्था भी है, जहां हर पीढ़ी को उसका स्थान, उसकी भूमिका और उसका सहारा मिलता है। यहां दादा-दादी से कहानियां मिलती हैं, मां-बाप से अनुशासन और भाई-बहनों से सह-अस्तित्व। यह एक ऐसा इमोशनल इकोसिस्टम है, जिसमें हर व्यक्ति को सुरक्षा, संवाद और सरोकार मिलता है।
परिवार का औसत आकार घटा, 80 प्रतिशत परिवार एकल
पहले परिवारों में जमीन साझा होती थी, आजीविका खेती से जुड़ी थी, निर्णय सामूहिक होते थे। परिवार एक “आर्थिक इकाई” और “संस्कारशाला”, दोनों होता था। घर का हर सदस्य अपनी भूमिका बखूबी निभाता था, लेकिन इन दिनों भारत में तेजी से एकल परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) का चलन बढ़ा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2011 की जनगणना में भारत में 70 प्रतिशत परिवार एकल पाए गए। 2022 तक यह संख्या शहरी क्षेत्रों में 80 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। एक संयुक्त परिवार में औसतन 7 सदस्य हुआ करते थे तो अब न्यूक्लियर में सिर्फ 3 सदस्य रह गए हैं। जबकि भारत के संयुक्त परिवार के मॉडल को विदेशों में अपनाया जा रहा है।
पूरा अंक देखें-
राजस्थान टुडे, जुलाई 2025
विदेशियों को लुभा रहा
कभी न्यूक्लियर फैमिली मॉडल के उत्साही रहे पश्चिमी देश अब मल्टी जेनरेशनल लिविंग यानी संयुक्त परिवार की ओर लौट रहे हैं। कुछ प्रमुख उदाहरण:
अमेरिका : पीईडब्ल्यू रिसर्च सेंटर (2021) की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में 18 प्रतिशत लोग अब मल्टी-जनरेशन परिवारों में रहते हैं, जो 1971 में सिर्फ 7 प्रतिशत थे। कोविड महामारी के बाद, आर्थिक अस्थिरता और बुजुर्गों की देखभाल की ज़रूरतों ने संयुक्त परिवार को फिर से प्रासंगिक बना दिया है।
ब्रिटेन : इंग्लैंड में “ग्रेनी फ्लैट्स” यानी बुज़ुर्ग माता-पिता के लिए घर के हिस्से बनाए जाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। एकल माता-पिता और युवाओं के लिए परिवार में रहना एक लागत-प्रभावी समाधान बन गया है।
कनाडा : कनाडा में 2023 में मल्टी जेनरेशनल को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने टैक्स इंसेंटिव स्कीम शुरू की है।
जापान : जापान में “सेंडविच जेनरेशन” (जो माता-पिता और बच्चों दोनों की देखभाल करते हैं) अब 3-जेनरेशन हाउसहोल्ड मॉडल को फिर से अपना रही है, क्योंकि यह मानसिक और आर्थिक रूप से अधिक टिकाऊ है।
बच्चों के मानसिक विकास की नींव है संयुक्त परिवार
मनोचिकित्सक डॉ आरके शर्मा बताते हैं कि जब एक ही घर में परिवार के कई सदस्य साथ रहते हैं, तो बच्चों को न सिर्फ भावनात्मक सुरक्षा मिलती है, बल्कि वे सामाजिक रूप से भी मजबूत बनते हैं। इसके विपरीत आज के समय में न्यूक्लियर फैमिली (एकल परिवार) का चलन तेजी से बढ़ रहा है, वहीं संयुक्त परिवार बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और व्यावहारिक विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
एक बच्चे की परवरिश केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार की सामूहिक भागीदारी से उसका समग्र विकास होता है। जब परिवार में बुज़ुर्ग, चाचा-चाची, भाई-बहन जैसे सदस्य साथ रहते हैं, तो बच्चे को विविध अनुभव और सीखने के अनेक अवसर मिलते हैं।
संयुक्त परिवार के फायदे
बुज़ुर्गों का साथ : दादा-दादी, नाना-नानी जैसे अनुभवशील सदस्य बच्चों को जीवन मूल्यों, अनुशासन और परम्पराओं से जोड़ते हैं। माता-पिता की व्यस्तता के दौरान अन्य सदस्य बच्चों का ध्यान रखते हैं, जिससे बच्चों की देखभाल में कोई कमी नहीं आती।
सामाजिक कौशल : संयुक्त परिवार में रहकर बच्चे सहयोग, सहनशीलता, बांटने की भावना और संवाद कौशल सीखते हैं। जब माता-पिता व्यस्त होते हैं, तो दादा-दादी या अन्य सदस्य बच्चों के साथ खेलने, बात करने और समय बिताने के लिए उपलब्ध रहते हैं।
भावनात्मक सहारा : डर, तनाव या अकेलेपन की स्थिति में बच्चों को परिवार का भावनात्मक सहारा मिलता है। हर सदस्य का दृष्टिकोण, कहानी और व्यवहार बच्चों के लिए एक नया सीखने का अवसर बनता है।
एकल परिवार के संभावित नुकसान
अकेलापन : एकल परिवार में बच्चे प्रायः अकेलापन महसूस करते हैं, जिससे आत्मविश्वास में कमी आ सकती है।
भावनात्मक असंतुलन : सहयोग की कमी से बच्चों में चिड़चिड़ापन, ग़ुस्सा और तनाव की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
अभिभावकों पर दबाव: बच्चों की संपूर्ण देखभाल केवल माता-पिता पर निर्भर होने से उनमें थकान और तनाव का स्तर बढ़ सकता है।
एकल परिवार की मजबूरी :
1. शहरीकरण और रोजगार की तलाश
– नौकरी, शिक्षा और बेहतर जीवनशैली के लिए युवा वर्ग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहा है, जहां छोटे घरों में केवल पति-पत्नी और बच्चे रह सकते हैं।
2. महंगाई और खर्चों का दबाव
– बढ़ती मंहगाई, शिक्षा व स्वास्थ्य की लागत ने युवा दंपत्तियों को स्वतंत्र होने पर विवश किया है। संयुक्त खर्च अब “बोझ” लगने लगा है।
3. महिलाओं की आत्मनिर्भरता और शिक्षित वर्ग का उदय
– अब महिलाएं भी नौकरी करने लगी हैं, फैसले भी लेने लगी हैं। इससे पारम्परिक पितृसत्तात्मक ढांचे में दरार आई है।
4. व्यक्तिवाद की सोच और निजी स्वतंत्रता
– आज का युवा स्वतंत्र निर्णय लेना चाहता है, कैसे जीना है, क्या खाना है, कैसे बच्चों की परवरिश करनी है। संयुक्त परिवार में ये विकल्प सीमित रहते हैं।
5. पीढ़ी दर पीढ़ी वैचारिक मतभेद
– आज की पीढ़ी तकनीक, विचार, जीवनशैली तेज़ी से बदल रही है। इससे दो पीढ़ियों के बीच टकराव, अलग रहने की मानसिकता को जन्म देता है।
आज भी जरूरी हैं संयुक्त परिवार
– संयुक्त परिवार केवल साथ रहना नहीं है, यह एक सामाजिक निवेश है, जिसमें पीढ़ियां साझा अनुभवों, जिम्मेदारियों और मूल्यों से बंधी होती हैं। आज के दौर में, जबकि दुनिया मानसिक थकावट, अकेलेपन और तनाव की गिरफ्त में है, संयुक्त परिवार एक ऐसा सामाजिक समाधान बनकर उभरते हैं, जो न केवल भावनात्मक सुरक्षा देते हैं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और सांस्कृतिक निरंतरता भी सुनिश्चित करते हैं। संयुक्त परिवार कोई पिछड़ी सोच नहीं, बल्कि एक फ्यूचर रेडी मॉडल है। जहां पश्चिम अब इसे दोबारा खोज रहा है, वहीं भारत में इसे छोड़ना विडंबना है। यह न केवल सामाजिक-आर्थिक ढांचे को मजबूत करता है, बल्कि एक स्थायी जीवनशैली का मार्ग भी प्रशस्त करता है।






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