कट्टर नक्सली से अभिनेता बनने का सफर
यह बहुत ही कम लोगों को ज्ञात है कि मिथुन फ़िल्म उद्योग में प्रवेश करने से पहले एक कट्टर नक्सली थे, लेकिन उनके परिवार को कठिनाई का सामना तब करना पड़ा जब उनके एकमात्र भाई की मौत दुर्घटनावश बिजली के...

भारत से लेकर रूस तक है दीवानगी मिथुन की
– सुधांशु टाक,
लेखक, समीक्षक
बात सन् 1982 की है। मिथुन चक्रवर्ती की ‘डिस्को डांसर’ भारत में प्रदर्शित होने के बाद रूस में रिलीज हुई। इस फिल्म पर न रूसी समाजवाद का असर था और न इसे किसी प्रगतिशील विचारधारा के निर्देशक-लेखक का सान्निध्य प्राप्त था। यह तो बस बप्पी लहरी के कुछ चुराए हुए विदेशी गीतों के हिंदी संस्करणों और मिथुन के डांस मूव्ज की वजह से 80 के दशक में हिंदुस्तानी पॉप कल्चर का हिस्सा बनी थी।
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राजस्थान टुडे, जुलाई 2025
रूस के कल्चर का भी हिस्सा, ‘डिस्को डांसर’ इसी वजह से बनी। रूसी समाजवाद और राज कपूर वाले दौर से बाहर आ चुका रूसी युवा 80 के दशक में पलायनवादी सिनेमा में मनोरंजन ढूंढने लगा था और आशावादी बातों से ज्यादा उसे पश्चिम का भौतिकवाद पसंद आने लगा था। इसी वजह से जिस मॉस्को फिल्म फेस्टिवल में एक जमाने में ‘दो बीघा जमीन’ जैसी यथार्थवादी फिल्में प्रशंसा पाती थीं, वहां पर ‘डिस्को डांसर’ ने हाउसफुल होने के कीर्तिमान रचे। रूसियों ने इसके निर्देशक बी सुभाष और मिथुन चक्रवर्ती के लिए फिल्म खत्म होने के बाद खड़े होकर तालियां बजाईं।
मिथुन के लिए हिन्दी सीखने लगे रूसी
इस फिल्म के बाद मिथुन चक्रवर्ती को राज कपूर की ही तरह सारा रूस जानने लगा। उन्हें वहां के एयरपोर्ट व सड़कों पर देखकर लोग दौड़े चले आते और जिस तरह आज जस्टिन बीबर के प्रशंसकों को ‘बीलिबर्स’ कहा जाता है, 80 के दशक के रूस में मिथुन चक्रवर्ती के फैन्स को ‘मिथुनिस्ट’ कहा जाता था। रूसी युवा सिर्फ उनके लिए हिंदी सीखते थे और इसलिए पैसे बचाते थे कि एक दिन वे इंडिया आकर अपने पसंदीदा सुपरस्टार से मिल सकें। बाद में दिए अपने साक्षात्कारों में खुद मिथुन भी कहा करते कि मिथुनिज्म रूस में एक धर्म बन गया था और उनके प्रशंसकों में 70 फीसदी केवल लड़कियां हुआ करती थीं।
यह तथ्य आश्चर्यचकित करने वाला जरूर है, लेकिन आज भी जब मिथुन उम्र के सातवें दशक में हैं, उनको लेकर रूस में दीवानगी कम नहीं हुई है। 80 के दशक की उन युवा लड़कियों की बेटियां आज मिथुन की फैन हैं। एक लेगेसी मां से बेटी को मिली और भाषा, संस्कार व समय की बंदिशों की परवाह नहीं हुई।
मार्शल आर्ट के जानकार है मिथुन
मिथुन चक्रवर्ती का जन्म 16 जून, 1950 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ और कोलकाता के ही विख्यात स्कॉटिश चर्च कॉलेज से उन्होंने रसायन विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की। उसके बाद वे भारतीय फ़िल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे से जुड़े और वहीं से स्नातक भी किया। यह बहुत ही कम लोगों को ज्ञात है कि मिथुन फ़िल्म उद्योग में प्रवेश करने से पहले एक कट्टर नक्सली थे, लेकिन उनके परिवार को कठिनाई का सामना तब करना पड़ा जब उनके एकमात्र भाई की मौत दुर्घटनावश बिजली के करंट लगने से हो गई। इसके बाद मिथुन अपने परिवार में लौट आये और नक्सली आन्दोलन से खुद को अलग कर लिया, हालांकि ऐसा करने के कारण नक्सलियों से उनके जीवन को खतरा उत्पन्न हो सकता था, क्योंकि नक्सलवाद को वन-वे रोड माना जाता रहा। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ और जीवन में उन्हें एक आइकोनिक दर्जा प्रदान करने में प्रमुख कारण बना। यह बात भी कम लोग ही जानते हैं कि उन्होंने मार्शल आर्ट में महारत हासिल की है। मिथुन ने भारतीय अभिनेत्री योगिता बाली से शादी की और वे तीन बेटे और एक बेटी के पिता हैं। ज्येष्ठ पुत्र, मिमो चक्रवर्ती; जिन्होंने 2008 में बॉलीवुड फ़िल्म ‘जिमी’ से अपने अभिनय जीवन की शुरुआत की। उनका दूसरा बेटा, रिमो चक्रवर्ती जिसने फ़िल्म ‘फिर कभी’ में छोटे मिथुन की भूमिका में अभिनय किया। मिथुन के अन्य दो बच्चे नमाशी चक्रवर्ती और दिशानी चक्रवर्ती हैं।
डिस्को शर्ट की धूम
मिथुन के टाइम में एक डिस्को शर्ट भी काफी लोकप्रिय हुआ था। पूरे देश में सरस्वती और दुर्गा की मूर्ति स्थापना के लिए निकलने वाली टोलियों में ये डिस्को शर्ट खूब दिखते थे। रिक्शे पर लाउडस्पीकर से करकराती हुई आवाज़ को चिरता हुआ डिस्को डांसर का गाना और सर पर पट्टी बांधे मोहल्ले के नौजवान आयोजक अबीर-गुलाल से नहाये हुए डांस करते थे। अमिताभ बच्चन की जादुई छवि के बीच मिथुन दा एक ब्रेक की तरह आए और अपने स्टाइल से छा गए।
अपने अभिनय से जीता सबका दिल
1993 में बांग्ला फिल्म तहादेर कथा के लिए फिर से सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 1996-में फिल्म स्वामी विवेकानंद के लिए मिथुन दा को सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इस अवार्ड की जूरी के सदस्य रहे ऋषिकेश मुखर्जी ने यहां तक कहा था कि “रामकृष्ण परंहंस का अभिनय मिथुन के अलावा और कोई इतना बेहतर नहीं कर सकता था। यदि कोई करता तो स्वयं भगवान ही कर सकते थे।”
फिल्मफेयर अवार्ड में भी इनके साथ भेदभाव हुआ। फिल्म मुजरिम, प्रेम प्रतिज्ञा, प्यारी बहना, प्यार झुकता नहीं आदि में अपने अभिनय से सबका दिल जीता, लेकिन मुख्य अभिनेता का फिल्मफेयर का एक भी अवार्ड नहीं मिला। लेकिन मिथुन चक्रवर्ती के फिल्मी जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पल आया 8 अक्टूबर 2024 को। इस दिन डांसिंग सुपरस्टार मिथुन चक्रवर्ती को सिनेमा जगत के सबसे प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। दिल्ली के विज्ञान भवन में 70वां राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मिथुन दा को वर्ष 2022 के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से मिथुन दा को सम्मानित किया।
सामाजिक कार्यों में भी अग्रणी
सामाजिक कार्य में मिथुन दा बहुत अग्रणी रहे हैं। कई स्कूल, मेडिकल कॉलेज, डायग्नोसिस्ट लेबोरेट्री एंड रिसर्चर सेंटर, इंजीनियरिंग कालेज में ग़रीब छात्रों के लिए वे छात्रवृत्ति योजना चला रहे हैं। मिथुन चक्रवर्ती ने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी। वह हमेशा हिम्मत के साथ संघर्ष करते रहे हैं और आज इसी संघर्ष, सरल स्वभाव के कारण उन्हें दुनिया सलाम करती है। मिथुन के साथ जिन्होंने बुरा बर्ताव किया था, स्टार बनने के बाद मिथुन ने कभी बदले की भावना नहीं रखी। उलट उनके साथ गहरी दोस्ती हो गई।
आज के युवा/अभिनेता, अभिनेत्री ज़रा से अवसाद के कारण आत्महत्या कर लेते हैं। हमें और सभी संघर्षशील लोगों को मिथुन चक्रवर्ती के जीवन संघर्ष से सबक और प्रेरणा लेनी चाहिए। बीते 16 जून को मिथुन चक्रवर्ती का जन्मदिन था। उनको हार्दिक बधाई। शुभकामनाएं।






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